
Do not consume that which will poison you, even if it appears attractive. Now that is spirituality.



Acharya Prashant: “He who claims liberation as his own, as an attainment of a person is neither enlightened nor a seeker. He suffers his own misery.”



Acharya Prashant: By looking at one Vivekanand, you start imagining, or dreaming, or expecting that all youth can be like Vivekanand. And in this lies your ingratitude and disrespect towards Vivekanand. You do not know what kind of an impossibility a Vivekanand is. You do not appreciate him, so you

Speaker: Ashish says, “Whatever was once important to me now seems insignificant. I wonder whether there is anything worth doing. The feeling has made me lethargic. Or is that just another trick of the mind?”

Speaker: You see we are outrageously arrogant when it comes to small things, we are so fond of claiming that which we do not have, but we are absurdly humble when it comes to claiming that which we really have. You don’t have a large house but you would not



Question: Given that all our relationships seem to be arising purely out of a sense of imagined need, is it possible to have any other kind of relationship?
Acharya Prashant Ji:

Questioner (Q) Pranam, Acharya Ji.

Questioner (Q): We have just read about the Saints or people who are meditative and who stay in meditation for years or days. In what kind of state they are? Like, they are neither in joy or sorrow or...


तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषूदासीनता च


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को नमन, सर मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करना चाहूँगी कि आपने जो कुछ सिखाया है वो बहुत अमूल्य है और सर मैं बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ, आपकी समर्पित प्रशंसक हूँ और सर मैं, जीवन में आपने जो कुछ सिखाया है वो पहले किसी ने बताया होता तो

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। बचपन से यही शिक्षा दी जाती है कि पढ़ाई कर लो, अच्छे नंबर लाओगे तो अच्छे बच्चे कहलाओगे या फिर आगे चलकर अच्छी नौकरी मिलेगी तो समाज में प्रतिष्ठा मिलेगी। तो इन सब में जो एक निष्कामता की जो चीज़ है, वो कहीं-न-कहीं कम ही रहती

प्रश्नकर्ता: पिछले बीस-चालीस साल से ऐसा क्यों हो रहा है कि लोगों को राम पसंद आने बहुत कम हो गए हैं? तो आम जनमानस को ख़ासतौर पर जो नई पीढ़ी है उसे तो नहीं ही पसंद आते राम, इधर पिछले बीस-चालीस साल के कुछ प्रसिद्ध गुरुओं ने भी राम का

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल आपने सत्संग में आत्म-प्रेम के विषय में कहा था, कैसे मन यह जानते हुए, यह देखते हुए कि उसमें सारी गन्दगी मौजूद है, बहुत विकार मौजूद हैं, खुद को प्रेम कर सकता है। यह रास्ता बहुत कठिन मालूम होता है, जब भी आत्म-प्रेम,

आचार्य प्रशांत: ये बड़ा रूमानी सपना रहता है कि, "हम सन्यासी हो जाएँगे, और जैसे बुद्ध के चेले थे, बोलेंगे, 'भिक्षाम देहि', और द्वार से सुंदरी प्रकट होगी पात्र लेकर के, दाल-चावल, और हमारी अंजुली में डाल देगी और हम बिल्कुल नयन नीचे करे, मुक्त पुरुष की तरह खड़े रहेंगे।"

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी अभी आपने जो बताया, आपके पास आने से पहले, जो भी समझा, जो भी पढ़ा था तो उसमें ये था कि कामना की पूर्ति करते-करते मुक्ति तक पहुँच जाएँगे। लेकिन जब आप, आपके प्रकाश में ये पता चला कि कामना की पूर्ति ये जानकर कि हो नहीं…

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बुद्ध या कृष्णमूर्ति को मोक्ष आसानी से क्यों प्राप्त हो गया?

प्रश्नकर्ता: भगवान बुद्ध महल छोड़कर जंगल क्यों गये?

प्रश्नकर्ता: आप कहते रहते हैं कि जिसको जिसमें सहजता हो और सुविधा हो वो वैसे कपड़े पहने। आप ये भी कहते हैं कि ऋषियों को, मुनियों को स्वेच्छापूर्वक वस्त्र धारण करने का अधिकार है, उन्हें कुछ पहनना हो तो पहनें, न पहनना हो तो ना पहनें।



योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।।
जो पुरुष अंतरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक २४…

आचार्य प्रशांत: आलोक जी कह रहे है कि आचार्य जी अब कुछ उल्टा होने लगा है। दुनिया महत्वपूर्ण लगने लगी है। मौत का क्यों सोचूं, जीवन भी तो अच्छा ही लगने लगा। आत्मा को खोजने की ज़रूरत ज़रा कम हो गई है, क्योंकि शरीर भी तो बढ़िया चीज़ है। पेड़,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बुद्ध पुरुषों ने जो बताया है समाज को, वह बहुत सरल है, लेकिन फिर भी इतना झूठ, इतना ड्रामा क्यों?


मन मते माया तजि, यूँ करे निकस बहार।
लागी रही जानी नहीं, भटकी भयो खुआर।।
संत कबीर

Anyone can bring me gifts; give me someone who can take away

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा नाम प्रशांत है। मैं आपसे मिलने नहीं आना चाहता था। पर आया हूँ। मेरा सवाल यही है।

आप मिटै पिउ मिले,पिउ में रहा समाय ।
अकथ कहानी प्रेम की,कहें तो को पतियाय ।।
~ संत कबीर

आचार्य प्रशांत: परम त्याग नहीं, परम प्राप्ति। ये सिर्फ शब्दों की बात नहीं है। ये पूरा-पूरा दृष्टि का ही अंतर है। सत्य आपके समक्ष आएगा ही नहीं अगर आप पाने की भाषा में बात नहीं करेंगे। अगर आपकी संतोष की वही धारणा है, जो आमतौर पर चली आ रही है,

We all have our moments, our episodes of failures. We all let ourselves down at some time or the other. What to do then? Rule number one – do not go down tamely. If there is an inner conflict, and you know which side should win, fight hard to ensure that the right side prevails. Rule number two – keep fighting till your victory and keep fighting in your defeat. Even in defeat, remain a winner.
Why is it that what you call the ‘spiritual path’ must be equated with leaving something? Do you find any renunciation in existence? Do you find anything in existence that is bent upon giving up something, or dropping something? If life were meant for dropping, then that whom you call as ‘God’ should have first of all dropped the universe. When he is running the universe, not dropping it, in spite of the world being as silly, as pointless and as rotten as it is, then why must you think of leaving all the desires behind, and going to the spiritual life, leaving all material behind, and doing something else?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत पहले से देख रहा हूँ। इमैजिनेशन (कल्पनाएँ करने) की आदत है। अब यहाँ तीन महीने से हूँ तो इसे और गहराई से देखने के लिए मिला। बहुत ज़्यादा गहराई तक है यह।
मैं सही-सही बताऊँ तो कोई मुझसे बात करता है तो मुझे उसकी आधी बात…
It's not the object of renunciation or attachment that matters, but the idea you hold of it. Suffering lies not in giving up the object but in letting go of its idea. The mind lives in narratives. Once the narratives are gone, the attachment is gone. Then, renunciation becomes celebration, for what you’re dropping is not precious but your misery itself.
You have got it right. It is just another trick of the mind.
Now, let’s…
आचार्य प्रशांत: कर्मसंन्यास और कर्मयोग क्या हैं? दोनों में अन्तर क्या है? आमतौर पर हम जिसे कर्म कहते हैं; वो कैसे होता है? वो ऐसे होता है कि जैविक रूप से और सामाजिक रूप से मन संस्कारित रहता है। फ़िज़िकल, सोशल दोनों तरह के संस्कार। तो मन में पहले…
Acharya Prashant (AP): (Reads question) Mohit Sharma from the USA, “Pranam Acharya Ji, I am paying attention to what and how I do. I have observed four states of mind. Is it natural to observe this? Are these all the same or different? And by doing it, will I go…
Q: Yes, Yes, I went to one nightclub. I video-called Anmol Sir from there. One Saturday I went.
AP: What did you do there?
Q: I was just sitting, and had one orange juice,…
Acharya Prashant (AP): See, anybody, who quits life to stay in…
“He who cherishes desires and his mind dwells with his longings is by his desires born again wherever they lead him but the man who has won all his desires and has found his soul for him, even here in this world vanish away all desires.” ~Mundaka Upanishad
Questioner (Q):…
In the Lord whole-hearted, single-minded devotion and all else that are contrary to it, complete indifference.
This is the nature of renunciation.
~ Narad Bhakti Sutra: 9
Questioner: How is this sutra relevant in daily life?
Acharya Prashant: The man whose mind…
प्रश्नकर्ता: पूज्य गुरुजी, सत्य की पुकार पर किसी दिशा में चल पड़ना एक चीज़ है और किसी जगह से भागकर भगोड़ा हो जाना, दूसरी चीज़ है। इन दोनों में अन्तर कैसे करूँ?
आचार्य प्रशांत: अन्तर बहुत साफ़ है भानु। भगोड़ा भागता ही नहीं, भगोड़ा मात्र स्थान परिवर्तित करता है। भगोड़ा…
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…
प्रश्नकर्ता मन में एक विचार भी आता है कि ये पलायनवाद तो नहीं होगा। जैसे एक बार मैं ओशो को सुन रहा था तो उन्होंने भी कहा था कि बुद्ध ने कुछ छोड़ा तो वो राजा थे इसलिए छोड़ा। उन्होंने भोगा था, फिर छोड़ा। तुमने कुछ भी अर्जित नहीं किया…
वजाइया वाजा पउण नउ दुआरे परगट कीए दसवा गुपतु रखाइआ।। ~ नितनेम (अनंदु साहिब)
आचार्य प्रशांत: ‘आनन्द साहिब’ से है कि उसने शरीर के वाद्य यन्त्र में साँस फूँकी और नौ द्वार खोल दिये लेकिन दसवें को छुपाकर रखा। दसवाँ द्वार कौनसा है? कौनसा हो सकता है दसवाँ द्वार? मन…
अचार्य प्रशांत: ये प्रश्न पूछकर के कि क्या कुछ लोगों को ज़्यादा आसानी से उपलब्ध हो जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपनेआप को यह सांत्वना देना चाहती हो कि जीवन तुम्हारे लिए अत्यधिक…
बहुत सारे पुराने ऋषि…
प्रश्नकर्ता: ब्रह्मचर्य और विवाह में क्या सम्बन्ध है? जो भी जितने भी ब्रह्मचारी लोग हुए हैं, उनके जीवन को पढ़ते हुए बड़ा आनन्द आता है। मतलब जो ब्रह्मचर्य के नियम पर चले हैं। जैसे– स्वामी दयानन्द हो गए, महात्मा बुद्ध हो गए, भगवान महावीर हो गए या स्वामी विवेकानन्द हो…
प्रश्नकर्ता : मैंने एक कहानी सुनी कि महात्मा बुद्ध ध्यानावस्था में बैठे थे, उसी समय कोई व्यक्ति आता है और बार-बार बुद्ध पर थूकता है और बुद्ध पोंछते जाते हैं, बिना उस व्यक्ति से रुष्ट हुए। ऐसे ही विवेकानन्द के बारे में है कि कोई उनपर थूकता है, तो वे…
आप जिस वजह से करते हो,…
श्री भगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।
अनुवाद: हे महाबाहो, निश्चय ही मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, परंतु हे कुंतीपुत्र अर्जुन यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है।
~ श्रीमद् भगवद्गीता (अध्याय ६, श्लोक ३५)
आचार्य प्रशांत:…
माया के नाम पर लोग क्या तजते हैं? ये खाऊंगा नहीं, ये पहनूंगा…
एनीवन कैन ब्रिंग मी गिफ्ट्स; गिव मी समवन हू कैन टेक अवे
रूमी
वक्ता: मुझे ‘दे’ तो कोई भी सकता है, चाहिए कोई ऐसा जो मुझे ‘खाली’ कर दे। गिफ्ट्स शब्द का उपयोग है — भेंट, उपहार।…
मिले नहीं हो, मिले हुए थे।
प्र: नहीं समझा।
आचार्य: कभी…
True God is the Truth right now in your heart. That is true godliness, true bhagavatta. The problem is that people want to avoid the real living Truth in their heart. Therefore, they come up with stories that place an imaginary God somewhere up in the skies. God is wonderful, but the stories and the imaginations about God are all very disrespectful towards God. When there is love for God, God is held very close to the chest, and that God is called Truth. That God is the very purpose of philosophy and the very origin.

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।

धर्मग्रंथों को जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उनके मूल संदेश को समझना आवश्यक है। श्रुति का केंद्र जाति, लिंग या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अहंकार और उससे मुक्ति है। पारंपरिक व्याख्या से अलग समझ को पुनर्व्याख्या मानकर खारिज करना उचित नहीं। वास्तविक अध्यात्म बाहरी पहचान नहीं, अपनी नीयत, भ्रम और कपट को ईमानदारी से देखने तथा आत्मबोध की ओर बढ़ने का आग्रह करता है।

वेदांत को केवल इसलिए सही या श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता कि वह किसी विशेष परंपरा से आता है। विज्ञान जहाँ भौतिक जगत की वस्तुनिष्ठ जाँच करता है, वहीं अद्वैत वेदांत सीधे मनुष्य के ‘मैं’, उसके दुख, बंधन और मुक्ति की पड़ताल करता है। इसकी कसौटी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, बल्कि अपने जीवन में इसकी सच्चाई को देख पाना है। किसी दर्शन को मान लेना नहीं, बल्कि उससे स्वयं को मुक्त करना ही उसका वास्तविक उद्देश्य है।

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।

Knowledge alone cannot transform life; it can become another object of the ego. True knowledge is self-knowledge—a mirror that exposes and destroys false ideas about oneself. Ravana may have been knowledgeable, but without self-knowledge, knowledge can become a tool for exploitation. Wisdom is not something to acquire; it is innate. Self-knowledge is the process of unbecoming unwise by clearing away the nonsense we have gathered.

Questioning pseudo-science and superstition is the first step toward genuine freedom. Beliefs such as *Vastu, Kundli,* and *Muhurat* should not be accepted merely because they have been followed traditionally. Fear and attachment to privileges often prevent people from questioning authority. A truth-seeker must be willing to challenge age, status, and authority. Human progress has come through curiosity, inquiry, experimentation, and reason—not through blind obedience.