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कचरे से मोह छोड़ना है वैराग्य; निरंतर सफाई है अभ्यास || आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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श्री भगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।

अनुवाद: हे महाबाहो, निश्चय ही मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, परंतु हे कुंतीपुत्र अर्जुन यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है।

~ श्रीमद् भगवद्गीता (अध्याय ६, श्लोक ३५)

आचार्य प्रशांत: तो प्रश्न ये है कि, "मन परिस्थितियों से विलग कैसे रह सकता है? आँखें खुलेंगी तो विश्व ही तो भाषित होगा। इसका अभ्यास कैसे किया जा सकता है?"

कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन से कि “हे महाबाहो, मन कठिनता से वश में होने वाला है, परंतु अभ्यास और वैराग्य से ये वश में आ जाता है।”

अभ्यास और वैराग्य, इनसे किधर को इशारा है? वो अर्थ नहीं है, जो हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में होता है। हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में अभ्यास मात्र दोहराव का नाम है।

आध्यात्मिकता में अभ्यास का अर्थ होता है ध्यान में रहना, सतत जागरण।

और अगर सतत जागरण नहीं है, तो अभ्यास से सिर्फ़ मन पर और परतें चढ़ेंगी क्योंकि मन तो बनता ही है आदत से, प्रक्रियाओं से, दिनचर्याओं से। जो कुछ भी बार-बार हो रहा होगा, मन उसी से भर जाता है। तो निश्चित रूप से कृष्ण अर्जुन को यह सलाह नहीं दे रहे हैं कि किन्हीं विधियों का पालन करो, किन्हीं प्रक्रियाओं का अभ्यास करो तो उससे मन वश में आ जाएगा।

आत्मा के जगत में अभ्यास का एक ही अर्थ होता है – ‘आत्मा में रहने का अभ्यास’ और आत्मा में रहने का अभ्यास है ही यही कि मन में जो कुछ चल रहा है, मन में तो दोहराव ही चल रहा है लगातार, उसको बहुत महत्त्व नहीं दिया, उससे ज़रा दो कदम पीछे खड़े रहने की हिम्मत दिखाई। यही अभ्यास है।

आध्यात्मिकता की भाषा पॉजिटिव , विधायक भाषा नहीं होती है, वो आपको कुछ करने की सलाह कभी नहीं देती है। इस बात को बिलकुल ठीक-ठीक समझ लेना बहुत ज़रूरी है। वहाँ ये आपसे कभी ना कहा जाएगा कि कुछ करें, और आपको लग रहा है कि कुछ करने के लिए कहा जा रहा है, तो आपको भ्रम हो रहा है। ‘करते’ तो हम निरंतर रहते ही हैं, आध्यात्मिकता का अर्थ होता है उस ‘करने’, उस ‘दोहराव’ पर साफ़, तेज़, सूक्ष्म दृष्टि डालना।

फिर कह रहा हूँ आपसे, कुछ नया करने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि ‘करने’ से तो जीवन भरा ही हुआ है न। अब आप उसमें एक नियम, एक अभ्यास और जोड़ दें, तो उससे कुछ ना हो जाएगा। दस कामों की फ़ेहरिस्त में एक ग्यारहवाँ जोड़ने से क्या हो जाएगा? सूची और लंबी होगी, यही होगा और कुछ नहीं। जिसके सर पर दस किलो का बोझ हो, वो कहे कि, "बताईए मैं क्या और उठाऊँ कि मेरा बोझ कम हो जाए?" तो प्रश्न कुछ बुद्धिमत्ता पूर्ण नहीं है। कुछ और उठाने से बोझ कम नहीं हो जाएगा।

जीवन भरा ही हुआ है ‘करने’ से, कर ही तो रहे हो लगातार। शरीर कर्म में उद्यत है, और मन विचार में उद्यत है। तो अगर बहुत सूक्ष्म नहीं देख सकते तो शरीर को देख लो। अपनी काया को देखना ही बहुत आगे तक ले जाता है। अपने चेहरे, मोहरे, भाव-भंगिमाओं को देखो, देखो अपने हाथों को कि वो क्या करते रहते हैं, देखो अपनी ज़ुबान को कि क्या बोलती रहती है, देखो अपने क़दमों को कि किधर को जाते रहते हैं।

हम बैठ कर आईने में अपनी शक़्ल को भी तो नहीं देखते। आपाधापी कुछ ऐसी है कि चुपचाप बैठ कर के ये देख भी नहीं पाते कि ये आँखें कैसी हैं और क्या कह रही हैं। माथे की शिकन को भी कहाँ पढ़ते हैं। अपने कर्मों को देखो, अपने विचारों को देखो, कर्मों और विचारों से जीवन यूँ ही भरा हुआ है। उन्हीं को देख लो, कोई नया कर्म नहीं करना है।

और याद रहे, ‘देखना’ कोई नया कर्म नहीं कहलाता। ध्यान किसी नए कर्म का नाम नहीं है तो इसलिए जो लोग ये कहते हैं, कि, "अब हम ज़रा ध्यान करेंगे", वो मूलतः भ्रम में हैं। ध्यान किया नहीं जाता। जो लोग कहते हैं कि, "ये अब हमारा योग का समय है", वो भी बड़े भ्रम में हैं। योग किया नहीं जाता। समय-बद्ध नहीं होता।

अभ्यास का अर्थ अर्जुन के लिए मात्र इतना है, कि "अर्जुन, पूरी गहराई से सुन कि मैं क्या कह रहा हूँ। और तू तभी मुझे सुन पाएगा जब तू वो सब भुला जो तेरे मन में लगातार चल रहा है, और उस भुलाने का नाम ‘वैराग्य’ है।"

कृष्ण कहते हैं अभ्यास और वैराग्य। अभ्यास का अर्थ है – ‘उस केंद्र से लगातार जुड़े रहना जिस केंद्र के परितः ये पूरी लीला चल रही है’। लीला से सम्प्रक्त नहीं हो जाना। केंद्र से जुड़े रहना, यही अभ्यास है। और लीला से हटे रहने का नाम ‘वैराग्य’ है। लीला से हटे रहने का अर्थ ये नहीं है कि लीला जब चल रही हो, तब भाग गए। लीला को लीला जानना ही वैराग्य है। जाने हुए हो, बाकी उसमें तुम्हें शामिल तो होना ही पड़ेगा। शरीर यदि है, और जिस हद तक तुम शरीर हो, उस हद तक लीला से तुम्हारी कोई भिन्नता नहीं हो सकती। शरीर का अर्थ ही है कि इस पूरे खेल में अब तुम पात्र हो, अब तुम बचकर नहीं भाग सकते। और बचकर भागने का ख्याल यही बताता है कि तुम खेल को समझे ही नहीं। तुम उतनी ही बड़ी मूर्खता कर रहे हो जितनी उस अभिनेता की होती है, जो नाटक के बीच से अपने पात्र, अपने चरित्र को छोड़ कर के भाग जाए।

ऐसों का कोई समर्थन तो नहीं करेंगे न आप। कि चल रहा था कोई नाटक और एक अभिनेता भाग गया। क्यों? उसका तर्क ये था कि, "मैं समझ गया हूँ कि ये नाटक है, नकली है। और जो नकली है, मैं उसका अंग कैसे बन सकता हूँ? मैं तो मात्र सत्य के पास जाऊँगा।" तो नाटक छोड़ कर के वो जा कर मंदिर में बैठ गया है। ये नहीं समझ में आ रहा उसको कि मंदिर में एक दूसरा नाटक चल रहा है। भागोगे कहाँ? शरीर ले कर के जहाँ भी जाओगे, वहाँ नाटक ही तो चल रहा है। हरदम तुम अभिनेता ही हो। मंच पर भी, और मंदिर में भी। भागने से क्या मिलेगा?

अभ्यास का अर्थ समझ रहे हो? कुछ करना नहीं, जो हो रहा है, उसी के प्रति जाग्रत रहना। जब ये वचन कहे जा रहे हैं, तब क्या हो रहा है? कि कृष्ण अर्जुन से कुछ कह रहे हैं। तो अर्जुन के लिए अभ्यास का क्या अर्थ हुआ? बस जो कुछ कृष्ण कह रहे हैं, कृष्णमय हो जाओ। जो कुछ कृष्ण कह रहे हैं, उसमें प्रवेश कर जाओ।

पर तुम उसमें प्रवेश नहीं कर पाओगे, अगर तुम्हारे मन में अपने भाईयों के, अपने चाचा के, और अपने पितामह के, अपने गुरुओं के – यही ख्याल घूम रहे हैं। तो तुम कृष्ण के साथ एक नहीं हो पाओगे। इन ख्यालों की मूल्यहीनता को देखना और छोड़ देना, ये क्या कहलाता है? वैराग्य।

अभ्यास माने, कृष्ण को याद रखना,वैराग्य माने, लीला को लीला जानना। लीला को लीला नहीं जाना तो सताए जाओगे, फिर लीला माया कहलाती है।

जब लीला को लीला नहीं जाना, तो फिर लीला बहुत बड़ी हो जाती है, लीला फिर कृष्ण का ही रूप ले लेती है। मात्र रूप, कृष्ण नहीं हो जाती। अब लीला लीला नहीं रह गई, अब लीला माया बन गई है।

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