
किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?


किसी के क्रोध पर चोट करो तो क्रोध पाँच गुना हो जाता है। दो गुटों की लड़ाई में एक मारा जाता है तो बीस और खड़े हो जाते हैं। दुर्गा सप्तशती का रक्तबीज यही है: हर बूँद से एक नया असुर। रक्तबीज कोई ख़ास असुर नहीं, हमारे अहंकार की प्रतिक्रियात्मकता है। उस पर चोट करने से वो और बड़ा होता है, क्योंकि किसी को ‘तुम बुरे हो’ कहना भी उसे ‘तुम हो’ कहना है। काली उसे खा लेती हैं, यानी अहंकार प्रकृति से अलग नहीं रह जाता। तो क्या हम देख सकते हैं कि जिसे हम ‘मैंने किया’ कहते हैं, वो कौन कर रहा है?
नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं और महिषासुर को बाहर का कोई दैत्य मान लेते हैं। पर दुर्गा सप्तशती का दूसरा चरित्र हमारी अपनी वृत्ति की कथा है। जो मन प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मानता है, जंगल काटता है, नदियाँ दूषित करता है, पशुओं को खाता है और कहता रहता है कि मुझे और चाहिए, वही महिषासुर है। त्यौहार उसी के वध के लिए है, उसे भोग लगाने के लिए नहीं। क्या इस नवरात्रि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानेंगे?
यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बाइबिल में एक दृष्टान्त है, एक कहानी है, उससे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ।
“जीसस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया कि स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के समान है जिसने अपने खेत में अच्छे उपजाऊ बीज बोया। पर जब सभी लोग सो रहे थे तो उसका…

आचार्य प्रशांत: जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना…
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…

प्रश्नकर्ता: आप कहते रहते हैं कि जिसको जिसमें सहजता हो और सुविधा हो वो वैसे कपड़े पहने। आप ये भी कहते हैं कि ऋषियों को, मुनियों को स्वेच्छापूर्वक वस्त्र धारण करने का अधिकार है, उन्हें कुछ पहनना हो तो पहनें, न पहनना हो तो ना पहनें।
बहुत सारे पुराने ऋषि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल आपने सत्संग में आत्म-प्रेम के विषय में कहा था, कैसे मन यह जानते हुए, यह देखते हुए कि उसमें सारी गन्दगी मौजूद है, बहुत विकार मौजूद हैं, खुद को प्रेम कर सकता है। यह रास्ता बहुत कठिन मालूम होता है, जब भी आत्म-प्रेम, सेल्फ़-लव की ओर…