प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। बचपन से यही शिक्षा दी जाती है कि पढ़ाई कर लो, अच्छे नंबर लाओगे तो अच्छे बच्चे कहलाओगे या फिर आगे चलकर अच्छी नौकरी मिलेगी तो समाज में प्रतिष्ठा मिलेगी। तो इन सब में जो एक निष्कामता की जो चीज़ है, वो कहीं-न-कहीं कम ही रहती है हमारी। और ये कंडीशनिंग काफ़ी समय से होती आ रही है, जब तक हमें आध्यात्मिक शिक्षा नहीं मिल पाती है। और आप अभी कह रहे हैं कि ये सारी चीजें तो रहेंगी। इसको हटा पाना काफ़ी मुश्किल है। जब इतने सालों से ये हमारे जीवन में है। तो इनको लेकर के ही दौड़ लगाना पड़ता है। तो उस दौड़ लगाने के दरमियाँ अपनी वृत्तियों को छोड़कर जब दौड़ लगाने की बारी आती है तो वहाँ पर जो…
आचार्य प्रशांत: छोड़कर नहीं, उनके बावजूद, उनके होते हुए भी।
प्र १: तो जब दौड़ लगाने की बारी आती है तो अंदर से जो विरोध उठता है…
आचार्य: उसी के विरुद्ध तो लड़ना है।
प्र १: जी, तो उनका तेज इतना प्रबल रहता है कि कभी-कभी लगता है कि…
आचार्य: तेज तो रहेगा ही। सामने कभी कर्ण हैं, कभी द्रोण हैं, कभी भीष्म हैं। उनके पास देखो कितना तेज है। तो तुम योद्धा काहे के हो कि उनका तेज देखा और लोट गये, ‘बहुत तेज है’, रथ के पीछे आकर छुप गये। ये कोई बताने की बात है कि सामने जो खड़ा है, उसमें बहुत तेज है। उसमें तेज है, तुम्हारे पास क्या है फिर? तुम भी ज़रा हुंकार मारो, दम दिखाओ। तुम काहे के लिए हो? या सारा तेज उन्हीं के सुपुर्द कर रखा है? क्यों भई?




