
Seen a bubble in the sea? That is our story.
You came with the hands empty, empty, and nothing will you carry.
So why be caught in misery? Make merry, make merry!
Who is your family? Who is a lover really?
You are deep in illusion, happily, happily fooling yourself…

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥




That’s what the entire spiritual process is about, collecting the airfare. So that you can rise up, otherwise, you stay crawling on the highway. Life is not so that you just remain a crawler, a creeper. Life is so that you can take off.







मीरा अगर पुरुष होती, तो भी क्या श्रीकृष्ण को पति ही मानती? तुम्हें समझ में नहीं आ रही बात। ठीक है भाई दैहिकता है, शारीरिकता है, लेकिन फिर भी हम मूल्य देंगे, सम्मान देंगे कि इतना तो करा कि किसी जीवित पुरुष के जाकर के आलिंगन में नहीं बँध गई। उन्होंने कहा, "मुझे ऊँचे से ऊँचा चाहिए भले ही अभी वो जीवित ना हो, भले ही मुझे सामने शरीर–रूप में दिखाई ना देता हो।


















कागा करंग ढंढोलिया सगला खाइया मासु। ए दुइ नैना मति छुइयो पिउ देखन की आस।। जो विरहिणी है वो कौए से बात कर रही है और कह रही है कि जितना माँस है शरीर में, तू खाले सब, मैं नहीं रोकती तुझे, लेकिन ये दो आँखें छोड़ देना। ये दो आँखें छोड़ देना क्योंकि इन्हें पिया को देखने की आशा है।


जो पुरुष प्रकृति में रस नहीं लेगा प्रकृति उसके सामने अपना पूरा नृत्य प्रदर्शित कर देगी और जो पुरुष प्रकृति का दीवाना होकर घूमेगा प्रकृति खुद उससे बच-बचकर घूमेगी। जब पुरुष जैसा स्वामी हो तो प्रकृति का चंचल हो जाना लाज़मी है न। वो है ही ऐसा जो किसी के हिलाए न हिले, तो आश्वस्ति है कि ये तो हिलेगा नहीं तो नाचो, गाओ, लुभाओ, मज़े करो। पक्का भरोसा है कि इस पर कोई विक्षेप आएगा नहीं।






Love clouds have gathered, it is raining down on me; my entire soul is soaked in it, all around there is greenery.



आचार्य प्रशांत: आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की जो आपसी नोंक-झोंक होती थी, बड़ी दिलचस्प थी — कि ज़िंदगी तुमको बड़ी चाहिए कि लंबी चाहिए। ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी चाहिए या लंबी चाहिए?’

क्षमा करने की ज़रुरत तब पड़ती है, जब चोट लगी हो। क्षमा उठती ही चोट से है। वास्तविक क्षमा कोई घटना नहीं है कि आपको चोट लगी और आपने माफ़ किया। वास्तविक क्षमा चित्त की वो निरंतर अवस्था है, जिसमें चोट खाना ही बड़ा मुश्किल हो जाता है। क्षमा को यदि आप एक घटना के तौर पर देखेंगे, तो भूल हो जाएगी। फिर आप कहेंगे कि, "मैंने क्षमा किया!" क्षमा को एक घटना की तरह नहीं, एक मनोस्थिति की तरह देखिए। कहिए कि, "मैं क्षमा में हूँ, मैं निरंतर क्षमा में हूँ।"

If your trust has an object, it is mere belief, like saying, "I’ll be rescued because my friend will come." Faith is: "I do not bother whether I’m rescued; I am alright either way." Faith is not dependent on a person or reason; it reflects a fulfilled Self that is unbothered, when you are alright without an objective reason to be alright.


Acharya Prashant: I might be a very violent man. And my goal is to blast a building off. To learn how to do it, I have to live through stern discipline. I will have to build my body, I will have to learn several skills. I may have the discipline




वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
Kabir Saheb's message questions the very act of searching for fulfilment outside oneself. Whether through religion, relationships, success, possessions, or identity, people keep assuming that what is missing lies somewhere else. The problem is not the destination but the belief that fulfilment exists at a distance. Real freedom begins when the search turns inward, recognising that the seeker and the sought were never truly separate.
गुरु गोविन्द सिंह जी ने सिखों को एक ज़बरदस्त सक्रिय और लड़ाका बल में तब्दील कर दिया। वो पूछा करते थे, कहते थे, ‘अगर तुमको सचमुच अमृत समझ में आया है, तो तुम मेरे साथ क्यों नहीं हो? और अगर मेरे साथ हो, तो बड़ी-से-बड़ी क़ुर्बानी तुमको देनी पड़ेगी।’ पंच प्यारों से उन्होंने ये नहीं कहा था, ‘बताओ कितने श्लोक याद हैं; नहीं, श्लोक नहीं।’ बोले, ‘क़ुर्बानी दे सकते हो? दे सकते हो तो मेरे साथ हो, नहीं तो कुछ नहीं।’ तो आज सूरमा चाहिए, जो अपनी क़ुर्बानी दे सके।
जो भीतर के अंधेरे को हटा सके उसके लिए नाम दिया गया गुरु। गुरु शब्द का इतना महत्त्व है कि सिखों ने मंदिर को नाम दिया गुरुद्वारा। गुरु नानक साहब उच्चतम कोटि के और असली गुरु हैं, पर कितने लोग हैं जो वास्तव में गुरु नानक साहब के जीवन पर और उनकी सीख पर चल रहे हैं? जो एक से बढ़कर एक अंधविश्वास के विक्रेता हैं, उनको हमने नाम दे दिया गुरु का। आपकी उच्चतम संभावना को जो अभिव्यक्ति देने में मदद कर सके, उसका नाम गुरु है। बहुत खोजें, बहुत संदेह से भरे रहें, परीक्षण करें, यूँ ही किसी को गुरु मत बना लीजिए।
जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल,
नाचे बेसुर ते बेताल | टेक |
दरदमंद नूं कोई न छेड़े,
जिसने आपे दुःख सहेड़े,
जम्मणा जीणा मूल उखेड़े,
बूझे अपणा आप खिआल
जिसने वेस इश्क़ दा कीता,
धुर दरबारों फ़तवा लीता,
जदों हजूरों प्याला पीता,
कुछ ना रहा सवाल जवाब
जिसदे अन्दर वस्स्या…
मन जहाँ बार-बार जाकर बैठे उसी का नाम माया है। जो ही विचार मन में लगातार भरे रहें, उसी का नाम माया है। कबीर साहब कहते हैं — ‘एक माया ऐसी भी है जो राम से मिला देती है।’ मन ही है जो यत्र-तत्र भागता है। इसी मन को ऐसा क्यों न कर दें कि ये राम की ओर भागे। यही कला है जीने की कि क्या चुनें और क्या न चुनें। उसको चुनो जो तुम्हें तुम्हारे क़रीब ले आता हो और उससे बचो जो तुम्हें तुमसे दूर ले जाता हो।
Truth enlightens, so it is attractive. Maya enthrals, so it is sometimes even more attractive. Where to go — that is the battle.
श्रीकृष्ण भी तुम्हीं में हैं, और मीरा भी। इन्हें मिलने दो, फिर आफ़तों में भी नाचोगे जैसे मीरा नाचती थी। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, तुम मौज में रहोगे। मीरा होना अनिवार्य है; जीवन मिला ही इसीलिए है कि हमारी मीरा और हमारे श्रीकृष्ण मिल सकें। जिनमें यह मिलन नहीं होता, वे सूखे, उदास जीते हैं। समझ ही श्रीकृष्ण है; जब समझ जागेगी, तब मीरा नाचेगी। यही मिलन, यही योग, यही जीवन जीने की कला है।
DANCE NAKED
Dance, Lalla, with nothing on
But air: Sing, Lalla,
wearing the sky.
Look at this glowing day! What clothes
Could be so beautiful or
more sacred?
~Lal Ded
Acharya Prashant- what does it mean to dance with nothing on?
L1- No causes.
AP- What does it mean to…
सिख धर्म का मतलब ही यही है — जो कुछ भी उचित लगता है, फ़र्क नहीं पड़ता किसने कहा और कब कहा — मैं उसको सुनूँगा और उसके सामने सिर झुकाऊँगा। सिख होने का मतलब है कि मैं लगातार सीख रहा हूँ, मैं शिष्य हूँ। दुनिया में कोई धर्म नहीं कहता कि शिष्य बनो, हर धर्म अनुयायी चाहता है। सिख धर्म शिष्यत्व चाहता है। बहुत-बहुत अनूठा है — न तो अवतार है, न पैग़म्बर, सिर्फ़ गुरु ग्रन्थ साहिब है जो शाश्वत गुरु है।
"अब तो जाग मुसाफ़िर प्यारे" का अर्थ है, कि जब ये सुन रहा है मुसाफिर, जब तू ये बात सुन रहा है, तभी जग जा। अब से अर्थ है, अभी। और अभी माने, जब जग रहे हो, जब सुन रहे हो, तभी। सुनने के लिये जगना आवश्यक है। सुनने के लिए जगना आवश्यक है। तो जब भी तुम इन वचनों को सुन रहे हो, बस तभी उठ के बैठ जाओ। जब भी सुन रहे हो, तभी उठ जाओ।
सिद्धांत के तल पर ज्ञान देना बहुत आसान है, पर कबीर साहब जब तक उस ज्ञान को ज़िन्दगी बनता नहीं देख लेते, छोड़ते नहीं हैं। पाखंड पर जितनी चोट संत कबीर ने की है, उतनी शायद ही किसी ने की हो। वे संत-शिरोमणि इसीलिए कहे जाते हैं, क्योंकि मजाल है कि उनकी ज़ुबान सच बोलने में काँप गई हो। जानवर की ख़ातिर अपनी जान को दाँव पर लगाने का काम कबीर साहब के अलावा किसी ने नहीं किया है। ये वो जगह है जहाँ पर संत और सूरमा में फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है।
भगवान किसी और को सूली पर कहाँ चढ़ा रहे हैं? वो ही हैं, अपने आप को ही सूली दे रहे हैं। खुद ही जाते हैं सिपाही बनकर; खुद ही पकड़ लाते हैं किसी संत को, फिर खुद ही न्यायलय में न्यायाधीश बन बैठते हैं, खुद को ही झूठी सज़ा सुना देते हैं, फिर खुद ही जल्लाद हो जाते हैं; फिर खुद ही सूली हो जाते हैं, फिर खुद को ही सूली पर चढ़ा देते हैं। और किसको मार रहे हैं वो? दया इत्यादि तो दूसरों पर की जाती है। जहाँ द्वैत ही नहीं, वहाँ दया कैसी। किस पर दया करनी है?
एक ओर तो यहाँ मुक्ति के प्रति गहरी निष्ठा देखने को मिलती है, और दूसरी ओर बागी तेवर: “जग ठगने को स्वांग रचाया।” खुली बात कि माला, तिलक और ये सब जो तुम कर रहे हो, जब तक इसमें प्रेम कहीं नहीं है, इसमें सच्चाई कहीं नहीं है, इसमें बस तुम, जो तुम्हारे क्षुद्र स्वार्थ हैं उनकी पूर्ति करना चाहते हो। तुम दुनिया को क्या तारोगे, तुम तो खुद ही सौ तरह के बंधनों में फँसे हुए हो। तुम्हारा तो इरादा भी नहीं है तरने का। तो पहले तो उलाहना है, डाँट है, और फिर उसके बाद रास्ता भी बता देते हैं, कहते हैं कि — सही राह पकड़ो, और सही जो राह है वो सत्यनिष्ठा की है।
कह रहे हैं कि ये तुमने जो तमाम तरह की कहानियाँ गढ़ ली हैं, ये कहानियाँ तुम्हारे अंजन का ही विस्तार हैं, निरंजन की कोई कथा नहीं हो सकती। सारी समस्या तब होती है जब धर्म में कथाएँ घुस जाती हैं। जितनी तुमने किस्से बाज़ियाँ और कहानियाँ ये खड़ी की हैं, इन्होंने ही तुम्हारे धर्म को चौपट कर दिया है। श्रीराम को निरंजन ही रहने दो, श्रीकृष्ण को भी निरंजन ही रहने दो। जैसे ही तुमने गोपी संग गोविंद बना दिया, वैसे ही मामला अंजन का हो गया। गोविंद को गोविंद रहने दो, गोपियाँ मत लेकर के आओ।
The one who takes great pride in his self and knowledge won’t be able to walk towards the Truth. But the one with humility, truly surrendered, sees things clearly. He realizes there are forces within him—his own physical system—working against the Truth. Humility is the hallmark of Sainthood. It comes with the honesty to accept one’s flaws.
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय।।
धागा क्या है? जिसके दो छोर हैं, दो सिरे हैं। दो दूरियों के मध्य जो है, सो धागा।
एक ही दूरी है जीवन में, बाकी सारी दूरियां इस एक दूरी से निकलती हैं। स्वयं…
Acharya Prashant: Suffering is a fire that burns down a lot. It brings along a certain purification. One of the poets gave the example of a snowball. Snowball that is cleansing itself in its own blood; by melting down. When a snowball starts melting, it starts becoming cleaner. And the…
देने वाले ने तुम्हें जो भी कुछ दिया है वो सहजता में ही दे दिया है और जो तुम्हें सहज न मिल रहा हो समझ लो कि वो तुम्हारे लिए है नहीं। कबीर साहब कह रहें हैं कि जो भी कुछ सहज मिल रहा हो, वही मीठा है; और जहाँ कहीं खींचा-तानी है, ज़ोर-ज़बर्दस्ती है, वो नहीं है तुम्हारे लिए। उसकी कोशिश व्यर्थ मत करो।
Usually our love is about one special thing or person. But Kabir Sahab is saying, "Hari bhai ban rai—the entire jungle has turned green. I see greenery not merely in one tree, but in the entire jungle.” That’s the difference between common love and Kabir Sahab’s love. In your love, there is just one green tree; in Kabir Sahab’s love, the entire world has turned green: there is nothing dry anywhere anymore.
If you cannot win the love of the Lord, so what if you can lord over your neighbor? What is the good of dressing your hair and donning your feet with jingling jewelry? What is the value of all your makeup with kajal to your eyelids and vermilion to your…
जो जगेगा, वही रोएगा क्योंकि संसार बड़ी पीड़ा में है। और जो जगता है, संसार की पीड़ा अपने ऊपर ले लेता है। संतों का रोना संत की करुणा की अभिव्यक्ति है। वो तुम्हारे लिए रोते हैं, वो अपने लिए नहीं रोते। दस लोग सो रहे हैं और घर में आग लग गई है। उन दस में से एक जगा हुआ है, तनाव किसे रहेगा? एक जगे हुए आदमी को ना! जो जग जाता है, वह शिव की तरह संसार के विष को ग्रहण करता है।
यह बिल्कुल भी मत सोच लेना कि जिसको होश आ गया, वह कहीं हिमालय पहुँच जाता है और दुनिया से कट जाता है। अध्यात्म दुनिया को डटकर जीने के लिए है। संत योद्धा होता है। जो बोध साहित्य पढ़ेगा, वह इसी दुनिया में जिएगा और अपनी शर्तों पर जिएगा, अपने हिसाब से जिएगा।
हम जंगल से आए हैं। जंगल में अपने शारीरिक अस्तित्व को बनाए रखने के लिए, बदला सहयोगी होता था। बदले से मन को ठंडक मिलती है, पर बहुत थोड़े समय के लिए। मन को जो वास्तव में चाहिए, वह बदला लेने से नहीं मिलता। तुम्हें ज़्यादा फ़ायदा हो जाएगा, अगर जिसने तुम्हें नुकसान पहुँचाया है, उसे माफ़ कर दो, छोड़ दो। उसे छोड़ने में तुम्हारा अपना फ़ायदा है।
जिन्होंने कृष्णमूर्ति से मुलाक़ात की हुई है, वो बुल्लेशाह में और प्रगाढ़ता से प्रवेश कर पाएँगे, बल्कि मैं कहूँगा वही समझ पाएँगे बुल्लेशाह को। और जो बुल्लेशाह के कायल हैं, वो जब कृष्णमूर्ति के पास जाएँगे तो उन्हें ऐसा लगेगा किसी अपने के पास आएँ हैं, इनको तो हम जानते हैं, ये वही बात तो कह रहे हैं। ये वही बात कह रहे हैं, जिस पर हम नाच कर आये हैं। बस सफ़ाई से कह रहे हैं, ज़्यादा व्यवस्था के साथ कह रहे हैं, बिना रंगरोगन के कह रहे हैं।
चिंता का कोई कारण नहीं होता, चिंता बस होती है, और जो मन चिंताग्रस्त है वो चिंता के बहाने खोज लेता है। अगर किसी को रुपयों की चिंता हो, और वो सुलझ जाए, तो मन तुरंत नई चिंता का कारण ढूंढ लेता है। जब तुम पूरी तरह वही कर रहे हो जो उस समय जरूरी है, तो चिंता के लिए समय ही नहीं होगा। चिंता के लिए सोचना पड़ता है, और जब दिमाग पूरी तरह व्यस्त हो, तो सोचने का वक्त ही नहीं मिलता।
मन जिस आयाम को देख सकता है, वो द्वैत का ही आयाम है। वहाँ उसे वो नहीं मिलता जिसकी उसे तलाश है। हमको तलाश तो सत्य की ही है, पर तरीके अनुचित हैं, क्योंकि हम होश में नहीं है। गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो सिर्फ़ इशारा करता है कि गलत जगह खोज रहे हो। तलाश तो तुम्हारी सपना टूटने पर ही बुझेगी।
Prayer is not an activity; it is your very being. "So you cannot pray; you can only be full of prayer." Prayer is the silent call of the mind. The deeper the silence, the truer the prayer. The noisier the mind, the more it is desire, not prayer. True prayer asks for nothing; it’s simply being prayerful in every movement of the mind—eating, walking, talking.
प्रश्न: आचार्य जी, हम पूर्णता के भाव तक कैसे पहुँचे?
आचार्य प्रशांत: पूर्णता के भाव तक पहुँचे कैसे, शुरुआत यहाँ से करते हैं। पूर्णता कोई भाव है ही नहीं, तो उस तक पहुँचने का भी कोई प्रश्न नहीं है।
आप (प्रश्नकर्ता) कहते हैं कि आपने मेरा लिखा पढ़ा है, थोड़ा…
आचार्य प्रशांत: देखो, डाउट और ट्रस्ट दोनों किसी ऑब्जेक्ट पर होते हैं। फ़ेथ भी जब तक उस तरह की है कि कोई ऑब्जेक्ट है उसका, तब तक तो घटेगी-बढ़ेगी है ही। फ़ेथ एबसोल्यूट तब होती है जब वो ऑब्जेक्टलेस (निष्प्रयोजन) होती है। अगर तुम इतना भी कह रहे हो न…
Acharya Prashant: Love is the fire that melts down the bondage that is you. Knowledge is merely the light in which you can see your bondages. Even if you are able to look at your chains in the light of knowledge, that does not rid you of the chains. In…
Questioner: Could you please elaborate on the meaning of this poem?
Acharya Prashant: Just sing what Kabir Sahib is saying. Just sing! I may keep…
Questioner: Acharya Ji, a good discussion happened yesterday in which many seekers participated and shared their understanding of Prakṛiti, Puruṣha and other things.
During the discussion, it was put that Prakṛiti, Puruṣha, Māyā, are mere concepts and that one is pure Ātman, never threatened and…
धुरी करमु जिना कउ तुधु पाइआ ता तिनी खसमु धिआइआ ||
“Dhuri Dhuri karam jinaa ka-o tuDh paa-i-aa taa tinee khasam Dhi-aa-i-aa.”
(Only those whose karma You have pre-ordained from the very beginning, O Lord, meditate on You.
~ Asa di Vaar (Guru Granth Sahib)
Questioner: What does Karma being…
लंबी चाहिए तो खूब नकारात्मकता से भरे रहो। जितना तुम शक्की रहोगे, प्रकृति ने संयोग…
Do not use your life as a waiting room. Do not wait even a second for things that merely promise but won’t deliver, as it's in the future which is unseen. Having seen that what you hope and expect will never materialize, do not wait another moment. Drop what is false. Don’t be kind or liberal; have no patience with falseness.
हम अकसर प्रतीकों को यह बोलकर ठुकरा देते हैं कि यह सब तो यूँ ही है, आचरण गत बातें है इनमें कुछ रखा नहीं है। उनमें ही बहुत कुछ रखा है। आप मंदिर के बगल से निकल रहे हो और आपके मन में दुनिया भर के अंट-संट विचार उमड़-घुमड़ रहे हैं, जैसे कि आमतौर पर चलते रहते है मन में, लेकिन मंदिर को देखते ही आप एक क्षण को रुके और आपने नमस्कार कर लिया मंदिर को, तो जो विचारों का पूरा बहाव है, जो पूरी शृंखला है वह टूट जाती है, क्योंकि वह एक लगातार बहने वाला निरंतर प्रवाह था न, एक निरंतरता थी।
There is such great fun in leaving yourself behind and turning a servant to the Truth. It’s almost like Krishna advising Arjuna, “Talk in everlasting words and dedicate them all to Me—*mām ekaṃ śaraṇaṃ vraja, sarva-dharmān parityajya*.” And at numerous places in the *Bhagavad Gita*, he says, “Arjuna, you are not fighting for yourself, you are fighting for Me. As long as you fight for yourself, if you win, you suffer, and if you lose, you suffer. And when you fight for Me, then you are a victor even before the fight begins.”
A man has to give up on greed, on this and that. A woman has to give up on the feelings related to the body. On all the assumptions and other stuff related to the body. Leaving the house, for her, is like becoming naked. And then the rest of the journey is very easy for her. If you have a woman who can drop her physicality, who can get rid of the basic woman-ness, then you have a great saint in front of you.
The principle of maya is founded on free choice. That's the very condition behind her existence, which is that, “I will disappear only when I choose to.” Grace is not something that happens coincidentally, randomly. Grace is a function of your own willingness. They say, “it may rain but you have to keep your umbrella aside.” The willingness to at least receive, be a recipient has to be there. Otherwise, you will remain dry and untouched.