देने वाले ने तुम्हें जो भी कुछ दिया है वो सहजता में ही दे दिया है और जो तुम्हें सहज न मिल रहा हो समझ लो कि वो तुम्हारे लिए है नहीं। कबीर साहब कह रहें हैं कि जो भी कुछ सहज मिल रहा हो, वही मीठा है; और जहाँ कहीं खींचा-तानी है, ज़ोर-ज़बर्दस्ती है, वो नहीं है तुम्हारे लिए। उसकी कोशिश व्यर्थ मत करो।
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“जो कुछ आवे सहज में, सो मीठा जान। कड़वा लागे नीम-सा, जा में खींचा-तान।।” ~कबीर दास जी
आचार्य प्रशांत: देने वाले ने तुम्हें जो भी कुछ दिया है वो सहजता में ही दे दिया है और जो तुम्हें सहज न मिल रहा हो समझ लो कि वो तुम्हारे लिए है नहीं। कबीर साहब कह रहें हैं कि जो भी कुछ सहज मिल रहा हो, वही मीठा है; और जहाँ कहीं खींचा-तानी है, ज़ोर-ज़बर्दस्ती है, वो नहीं है तुम्हारे लिए। उसकी कोशिश व्यर्थ मत करो।
ये संत की एक विशेषता होती है। उसे दुनिया से शिकायत नहीं होती है। तुम्हें दुनिया से बहुत शिकायत होती है न, तभी तुम बहुत ज़्यादा चीज़ों को बदलने की कोशिश करते हो। वो चीज़ों को नहीं बदलना चाहता। अगर उसे कभी कुछ बदलना भी है तो वो अपने आप को बदलेगा। वो बदलाव लाता भी है तो बड़ी सहजता से लाता है।
तुम अगर देखो तो नदी चलती है पहाड़ से और समुद्र तक पहुँच जाती है, तो पानी की स्थिति में कितना सारा बदलाव आ जाता है; आ जाता है कि नहीं? जो पहले बर्फ था वो पहले पहाड़ का पानी बन जाता है, फिर मैदान का पानी बन जाता है, और अंततः वो समुद्र का पानी बन जाता है। लेकिन ये सारा काम बिना खींचा-तान के किया जाता है। नदी कहीं लड़-वड़ नहीं रही होती है। वो चुपचाप सहजता से, जहाँ मौका मिला, दाएँ-बाएँ अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ जाती है; और इतना लंबा रास्ता तय कर लेती है।






