हम जंगल से आए हैं। जंगल में अपने शारीरिक अस्तित्व को बनाए रखने के लिए, बदला सहयोगी होता था। बदले से मन को ठंडक मिलती है, पर बहुत थोड़े समय के लिए। मन को जो वास्तव में चाहिए, वह बदला लेने से नहीं मिलता। तुम्हें ज़्यादा फ़ायदा हो जाएगा, अगर जिसने तुम्हें नुकसान पहुँचाया है, उसे माफ़ कर दो, छोड़ दो। उसे छोड़ने में तुम्हारा अपना फ़ायदा है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: कबीर साहब के एक दोहे पर स्पष्टीकरण चाहते हुए पूछ रहे हैं, चौबीस वर्षीय प्रश्नकर्ता हैं। आचार्य जी प्रणाम, आज यह दोहा गाने का अवसर मिला तो पूरे दिन इसी को गुनगुना रहा था।
जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप। जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप।
~ कबीर साहब
इस दोहे पर समझना चाह रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: देखो, तुम्हारी जो प्रकृति होती है, प्राकृतिक वृत्ति होती है, वो बदला लेने की होती है। माफ़ी का विधान हमारे शरीर में नहीं निहित है। जंगल से आए हैं हम, बहुत बार समझाता हूँ न। और जंगल में माफ़ी का चलन होता नहीं, जंगल तो सज़ा देता है अगर दे सके तो। सामने वाला बहुत ही पहलवान है, तो फिर तो सज़ा दे नहीं सकते।







