एक ओर तो यहाँ मुक्ति के प्रति गहरी निष्ठा देखने को मिलती है, और दूसरी ओर बागी तेवर: “जग ठगने को स्वांग रचाया।” खुली बात कि माला, तिलक और ये सब जो तुम कर रहे हो, जब तक इसमें प्रेम कहीं नहीं है, इसमें सच्चाई कहीं नहीं है, इसमें बस तुम, जो तुम्हारे क्षुद्र स्वार्थ हैं उनकी पूर्ति करना चाहते हो। तुम दुनिया को क्या तारोगे, तुम तो खुद ही सौ तरह के बंधनों में फँसे हुए हो। तुम्हारा तो इरादा भी नहीं है तरने का। तो पहले तो उलाहना है, डाँट है, और फिर उसके बाद रास्ता भी बता देते हैं, कहते हैं कि — सही राह पकड़ो, और सही जो राह है वो सत्यनिष्ठा की है।
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आचार्य प्रशांत:
“ऊँचे कुल के कारणै, ब्राह्मण कोय न होय। जउ जानहि ब्रह्म आत्मा, रैदास कहि ब्राह्मण सोय।।”
कितनी सरलता से और कितनी बारीकी से अध्यात्म का मर्म भी समझा दिया है, और आध्यात्म में जो बाधा आती है, जो चीज़ें नकली अध्यात्म, नकली धर्म बनकर खड़ी हो जाती हैं, उनके विरुद्ध चेता भी दिया है और उन्हें अस्वीकार भी कर दिया है।
“जो जाने ब्रह्म आत्मा।”
‘जो ब्रह्म को जानता हो, आत्मा को जानता हो और ब्रह्म को ही आत्मा जानता हो, वही ब्राह्मण है।’ जाति से नहीं, नाम से नहीं, अतीत से नहीं, शरीर से नहीं, चेतना से ही किसी व्यक्ति का स्थान निर्धारित होता है। आप कहाँ पैदा हो गए आपके पास रुपया-पैसा कितना है, आपके पूर्वज कौन थे, कुल-कुनबा, समुदाय, संप्रदाय क्या है आपका, ये सब बातें संयोग की हैं, देह की हैं। मनुष्य की पहचान न संयोग है, न समय है, न समाज है, मनुष्य की पहचान उसकी चेतना है।




