वास्तव में पछतावा और प्रायश्चित दो अलग-अलग शब्द हैं, इनको एक समझ भी मत लेना। प्रायश्चित ज़रा साफ़-सुथरी और प्यारी बात है। पछतावे का मतलब होता है बस बाद में छाती पीटना और जब कोई न दिख रहा हो, दोबारा वही करने में मसगुल हो जाना। ये दिखाये भी जाओ कि हमें तो बड़ा दुख है कि हम गंदे हैं। इसे कहते हैं पछतावा — वो रहे भी आओ, और प्रकट करो जो यूँ रहने में बड़ा अफ़सोस है। प्रायश्चित का मतलब होता है अफ़सोस के ही पार चले जाना, नये हो जाना।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, संघर्ष सा करना पड़ता है। अगर मेरी कुछ ऐसी आदतें हैं जो शायद मैं चाहता हूँ और मुझे पता भी है कि ऐसा नहीं करने से मैं ठीक हो सकता हूँ। मगर मैं अपने आप को रोकता नहीं हूँ, अनुभव में पूरा डूबा रहता हूँ, जो चीज़ आती है मेरे सामने वो मैं करता हूँ। और उसको करने के बाद फिर एक पश्चताप की लहर पीछे से आती है, और वो कहती है कि ‘सर, आपने फिर?’ मतलब, अनुभव भी हो रहा है उसका, और मैं उसे रोकना भी नहीं चाहता।
आचार्य प्रशांत: वो पश्चाताप नहीं है, पाखण्ड है। एक देवी जी हैं, उन्होंने अभी कुछ कर्म करे; मैं कहूँ बताओ खुलकर, वो कहें न। बताने में बड़ी लाज आती है, बड़ी गरिमा आ जाती है, इट इज़ इनडिग्निफाइड (ये अपमानजनक है।) मैंने पूछा, ‘करना इनडिग्नीफाइड नहीं था, बताना इन डिग्निफाइड है?’ करने में तो कूद-कूदकर, और बताने में? करने में तो आँख मून्दकर, और बताने में?
तुम्हें वास्तव में इतनी लाज आती होती तो करने में आती न। तुम्हें कोई लाज-वाज नहीं है, और जिसको पछतावा बोल रहे हो कि ‘कर तो दिया है, पर अब प्रायश्चित उठा है, इसलिए बताएँगे नहीं’, ये प्रायश्चित नहीं है, पाखंड है। प्रायश्चित छुपाने में नहीं है, प्रायश्चित तो फिर इसमें है कि जाकर खोल देंगे। ये बढ़िया कहानी है; कर डाला, पर अब करके इतना पछता रहे हैं कि मुँह नहीं खोल सकते, और ये खूब चलता है — हमनें इतना गंदा काम किया है कि हम व्यक्त नहीं कर सकते।




