‘मैं’ अपने बचे रहने के लिए जो ग़लत चीज़ है उसको अपने जीवन से कभी जाने देगा नहीं क्योंकि ग़लत विकल्प भी अगर चला गया तो ‘मैं’ मिट जाएगा। ‘मैं’ अपने बचे रहने के लिए सही विकल्प को भी अपने जीवन से कभी जाने देगा नहीं क्योंकि सही भी अगर चला गया तो ‘मैं’ मिट जाएगा। एक द्वंद चाहिए होता है 'मैं' को जीवित रहने के लिए, तभी तो मज़ा आता है। कभी धूप, कभी छाँव; दोनों को बनाए रखता है।
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प्रश्नकर्ता: जब मैं कमरे में था कुछ देर पहले और जैसी चीज़ें, दुनिया थी मेरी, उसमें ज़मीन आसमान का अंतर है। तो फिर मैं कौन हूँ और चीज़ें क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: क्या नहीं बदला, वही हो तुम। जो तुम अभी अपने कमरे में थे वो तो मिट गया, जो अभी तुम यहाँ हो वो भी मिट जाएगा। क्या है जो नहीं बदलता, भले ही तुम अपने कमरे में हो, सो रहे हो, जग रहे हो, उठ रहे हो, खा रहे हो, सुन रहे हो। क्या है जो नहीं बदलता? वही हो तुम। बाकी सब तो अवस्थाएँ मात्र हैं। जब कमरे में थे तो पूर्णतया संतुष्ट थे? अभी भी बैठे विचार कर रहे हो, पूर्णतया संतुष्ट हो? एक असंतुष्ट वृत्ति हो तुम जिसको अपनी असंतुष्टि के अलग-अलग कारण मिलते रहते हैं, पल-दर-पल। वो कारण बदलते रहते हैं, उन कारणों से जुड़ी हुई फिर अवस्थाएँ बदलती रहती हैं। जो एक चीज़ नहीं बदलती, वो क्या है? असंतुष्टि। उसी को मैं बार-बार बोला करता हूँ अपने-आपको अतृप्त चेतना जानो।
प्रश्नकर्ता: ये बात भी सुनी है, ये भी बदल जाएगी।
आचार्य प्रशांत: इसी बात से असंतुष्ट हो न? तो कारण एक और मिल गया असंतुष्टि का। गहरी नींद में भी होते हो तो भी क्या मिट जाते हो? कुछ खोज रहे होते हो, इस कारण जगने को तैयार रहते हो। असंतुष्टि तो गहरी नींद में भी नहीं मिट रही। उसी असंतुष्टि का नाम जीवात्मा है।




