तुम्हारे पास सम्यक युद्ध नहीं है लड़ने को तो फिर तुम अपनी परेशानियों से लड़ोगे, क्योंकि युद्धरत तो सबको रहना है। कोई है जो असली लड़ाई लड़ रहा होता है, और जो असली लड़ाई में नही उतरेगा वो फिर नकली लड़ाई लड़ता है। नकली लड़ाई यही होती है, अरे मैं परेशान हूँ! अरे मुझे यह दुःख है!
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, गुरु के शब्द ज्यादा महत्वपूर्ण हैं या फिर गुरु की शरण में होना?
आचार्य प्रशांत: ये दो अलग-अलग चरण होते हैं। आमतौर पर यही आवश्यक है कि ध्यान दो, सवाल पूछो, गौर से सुनो। पर अगर वास्तव में गौर से सुना है, वास्तव में ध्यान दिया है तो फिर मन अगले चरण में प्रवेश कर जाता है। और अगला चरण होता है मात्र संगति का, उपस्थिति का; फिर बातचीत की बहुत जरूरत नहीं रह जाती।
लेकिन उस चरण में भी आप प्रवेश कर सकें, जहाँ बस साथ बैठना काफी है, बोलचाल ज़रा अनावश्यक हो जाती है। उस चरण में भी आप प्रवेश कर सकें, उसके लिए आवश्यक है कि पहले जितनी बातचीत हो, करें। जितनी जिज्ञासा हो उसका समाधान लें।
शब्दों का आदान-प्रदान चलता रहना चाहिए, तब तक चलना चाहिए जब तक आप निःशब्द में प्रवेश न कर जाएँ।
प्रश्नकर्ता: तो जैसे ऐसा लगता है कि जैसे कोई प्रश्न मन में आता है, तो आधे तक आता है और फिर ऐसा लगता है कि गुरु का होना, और उसमें ये प्रश्न, बहुत-बहुत छोटा है, नगण्य है। कोई मतलब इसका महत्व नहीं है।




