हमारी समस्या ये है कि हमें समस्याएँ चाहिए। हम ऐसे अभ्यस्त हो गये हैं। कोई समस्या न हो तो हम खड़ी करेंगे। तनाव रहता है तो कम-से कम जीवन को उद्देश्य मिला रहता है। सुबह उठे हैं, उद्देश्य है, आज किसी का सिर फोड़ना है या उद्देश्य है कि आज अपनी तशरीफ़ बचानी है। प्रेम हम जानते नहीं। प्रेम भी एक बड़ा उद्देश्य होता है पर वो तो है नहीं हमारे पास। तो हमारे पास तो जीने का एक ही उद्देश्य होता है, या तो बचानी है या बजानी है। दोनों ही काम हिंसा के हैं — बचाना और बजाना।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम अपनी समस्याओं को छोड़ देते हैं तो एक ऐंप्टिनेस (खालीपन) आ जाती है, उसे फ़िल (भरने) के लिए फिर हम खुद समस्या के पास जाते हैं।
आचार्य प्रशांत: बढ़िया बात बोली न इसने। तुम्हारी समस्या ये है कि हमें समस्याहीन होना सुहा नहीं रहा। हमारी समस्या ये है कि हमें समस्याएँ चाहिए। हम ऐसे अभ्यस्त हो गये हैं। कोई समस्या न हो तो हम खड़ी करेंगे। जीवन में कुछ रहे न? तनाव नहीं रहता तो लगता है मुर्दा हो गये। तनाव रहता है तो कम-से कम जीवन को उद्देश्य मिला रहता है। सुबह उठे हैं, उद्देश्य है, आज किसी का सिर फोड़ना है या उद्देश्य है कि आज अपनी तशरीफ़ बचानी है।
कुछ उद्देश्य ही नहीं बचा तो क्या करोगे?
तनाव चला गया तो उद्देश्य चले गये, अब करोगे क्या? प्रेम हम जानते नहीं। प्रेम भी एक बड़ा उद्देश्य होता है पर वो तो है नहीं हमारे पास। तो हमारे पास तो जीने का एक ही उद्देश्य होता है, या तो बचानी है या बजानी है। दोनों ही काम हिंसा के हैं — बचाना और बजाना।




