कुछ भी के लिए तो हम प्रस्तुत ही नहीं हैं। कुछ भी के लिए तो बड़ी बेधड़क निर्भीकता चाहिए। कुछ भी तो हमसे आगे की बात हो जाती है। हमारे साथ तो वही दो-चार छोटी-मोटी चीज़ें होती है जो रोज़ होती हैं। सुख का पता चलना माने अहंकार का पता चलना, दुख का पता चलना माने अहंकार का पता चलना। मन परिचित ही सबकुछ पकड़े रहता है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर। जैसे पहले हम कुछ करते हैं और हमें नहीं पता है कि हम क्या कर रहे हैं। अनायास रिस्पॉन्डिंग, हमारे एब्सेन्स, हमारे रिस्पॉन्सेस, ये हो रहे हैं। और हमें उसका आभास सिर्फ़ तब है जब कोई हमें आकर ये बता रहा है या तो तारीफ़ के तरीके से या शिकायत के ज़रिए से। तभी हमें पता चलता है कि हमने क्या किया है, तो हम ऑब्ज़र्वेशन स्टेट में थे ही नहीं। उस समय हम अहंकार को पकड़े बैठे है, या तब जब हमको किसी ने बता दिया तारीफ़ या शिकायत के ज़रिए, तब ऐसा लगता है जैसे तब अहंकार निकलकर आ रहा है। वरना तो अगर अनायास ही कुछ कर रहे थे तो तब अहंकार नहीं था न?
आचार्य प्रशांत: अलग-अलग रूपों में सामने आता है। जब अनायास भी कर रहे हो, अनायास चले जा रहे हो बेहोशी में, कुछ जानते नहीं, ठोकर नहीं लगती है? दुख नहीं होता, चोट नहीं लगती? कहो। घूम रहे हो, गिरे गड्ढे में या जब अनायास कुछ कर रहे होते हो, तब सब आनन्द-आनन्द होता है। होता है न? खूब चोटें लगती हैं, कुछ भी नहीं होता। कुछ भी के लिए तो हम प्रस्तुत ही नहीं हैं। कुछ भी के लिए तो बड़ी बेधड़क निर्भीकता चाहिए। कुछ भी तो हमसे आगे की बात हो जाती है। हमारे साथ तो वही दो-चार छोटी-मोटी चीज़ें होती है जो रोज़ होती हैं।
प्रश्नकर्ता: तो तुम कर रहे हो।




