हम कभी जीवन के तथ्य को स्वीकार नहीं करते कि हमें सत्य से डर लगता है और हम अपनी क्षुद्रताओं और झूठ पर जीना चाहते हैं। फिर हम बड़ी तिरछी चाल चलते हैं। झूठ को सत्य का नाम दे देते हैं और कहते हैं कि सत्य के समर्थन में हैं। सत्य के खिलाफ़ तो सारा संसार खड़ा है, लेकिन इतनी भी आबरू और हिम्मत नहीं होती कि हम खुलकर कह दें कि हम सत्य के खिलाफ़ हैं। हमने झूठ को ही सत्य का नाम दे रखा है और झूठ का समर्थन कर रहे हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: कहानी है। भक्त के प्रण की चिंता भगवान को होती है। अर्जुन ने प्रण किया कि यदि जयद्रथ को नहीं मारता तो आत्मदाह कर लूँगा। ये प्रण करते वक्त वो पूछने नहीं गया था कृष्ण से। उसने उठा लिया, लेकिन अब उसने कसम उठा ही ली है तो उसको पूरा करने का आयोजन कृष्ण कर रहे हैं। थोड़ी हैरानी की बात है, कृष्ण ने स्वयं तो व्रत उठाया नहीं और अर्जुन ने भी ये कसम खाते वक्त कृष्ण की ना सहमति ली, ना अनुमति ली; तो कृष्ण को क्या पड़ी है?
वो क्यों अर्जुन की मदद कर रहे हैं, एक ऐसे वचन को निभाने में जिसके लिए जाने में, प्रत्यक्षतः उनकी कोई भूमिका थी नहीं?
समझेंगे!
भक्त को भगवान की अनुमति लेनी नहीं पड़ती। अनुमति तो आपको किसी की तब लेनी पड़ती है जब आप में और उसमें भेद की कोई संभावना हो।







