
टूटफूट ही वो जरिया है जो आपको बताएगा कि आपके पास कुछ ऐसा भी है जो टूट नहीं सकता। जब सब बिखरा पड़ा होगा उसके बीच ही अचानक आपको पता चलेगा, अरे एक ऐसी चीज है जो नहीं बिखरी बड़ा मजा आएगा। उसके बाद यही लगेगा कि इसको और बार-बार पटको और जितना बार-बार पटको और जितना यह नहीं टूटता उतना इसमें विश्वास और गहरा होता जाता है और आदमी और खुलकर खेलता है। यह सबके पास है। यह सबके पास है। हमें इसका पता इसीलिए नहीं है क्योंकि हमने इसको कभी आजमाया ही नहीं।






The atman is called 'the enjoyer' in the sense of the watcher, just as in a cinema hall you enjoy the show. How do you enjoy the show? By leaping into the screen? In the cinema hall, you enjoy the show by relaxing in your seat. That's what the atma does—it keeps relaxing in its seat. Even suffering is enjoyed in this detached manner, much like how we can enjoy tragic scenes in a movie. For the atma, there is no tragedy, as all suffering is false.


Acharya Prashant: If one is living rightly, then youth is the permanent state of one's mind. The body can grow old. The mind cannot grow old if one has lived rightly. Youth, that way is your default state.

आचार्य प्रशांत: कुछ पाने का विचार होगा, कुछ खोने का विचार होगा, और तो कोई विचार होता नहीं। विचार बड़ी नीरस चीज़ होती है, उबाऊ। न जाने तुम कैसे इस उबाऊ चीज़ के साथ इतना समय गुज़ार लेते हो।



आज्ञाभयसंशयात्मगुणसङ्कल्पो बन्धः ।


Questioner 1 (Q1): What I want to know is, suppose with all the discussions and with our own thought process, to some extent we understand Vedānta or spiritualism. But understanding is not enough. We have understood what to do—whether it is to reach the stage of bliss, or to separate …


हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषं ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥

आचार्य प्रशांत: हम जो कुछ भी करते हैं पूरी जो हमारी मानसिक व्यवस्था है, मनुष्यों ने जो भी व्यवस्था स्थापित करी वो ले-देकर के या तो अनुभव हो रहे दुख को मिटाने के लिए होती है या आशंकित दुख को दूर रखने के लिए।

आचार्य प्रशांत: वो जो है, ठीक है? जो सब उपनिषदों का ध्येय है, प्रतिपाद्य विषय है, वो ऐसा है जैसे दूध में मक्खन और मक्खन का भी शिरोभाग, शिरोबिन्दु। मक्खन के ऊपर रहने वाला सारभाग है वो,ठीक है? छाछ, छाछ पर मक्खन, और मक्खन में भी सबसे ऊपर?


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी जैसा आपने बताया कि जो भी कुछ मन के दायरे में आता है वो सब छिलके हैं, यानि असत्य है। पर असत्यों को हटाने के लिए भी जो डिस्क्रिशन

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। हमारे विस्तृत परिवार में श्राद्ध करने को बड़ा महत्व दिया जाता है। श्राद्ध के दिनों में पंडित को बुलाकर खाना खिलाना, यज्ञ-वगैरह करना आदि। मैं यह नहीं करती हूँ पर डरती हूँ कि क्या मैं अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध न करके उनके साथ कुछ अनादर

आचार्य प्रशांत: परमात्मा वास्तव में आत्मा-मात्र है। चूँकि ‘आत्मा’ शब्द का हमने बहुत दुरुपयोग कर लिया — हम मन को ही आत्मा कहने लग गए, हम जीवात्मा को ही आत्मा कहने लग गए — तो फिर ‘आत्मा’ शब्द को इंगित करने के लिए कहना पड़ा ‘परम आत्मा’; जैसे कि कई…

प्रश्नकर्ता: दुनिया की इस आठ-अरब की आबादी में आत्मस्थ आदमी की पहचान कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: तो गौरव, आत्मस्थ आदमी की पहचान तुम्हें करनी क्यों है? आत्मस्थ आदमी की पहचान तुम करना चाहते हो, इसका मतलब आत्मस्थ आदमी कुछ खास होता होगा! तुम ये तो कहते नहीं, कि “आठ-अरब की…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अक्सर हम ईश्वर से कुछ माँगते रहते हैं और न मिलने पर दुखी हो जाते हैं। क्या हमें दुखी होना चाहिए?




“आज्ञा मानना बंधन है। भय बंधन है।”

आचार्य प्रशांत: सब नाम, सब उपाधियाँ, सब रूप सीमित होते हैं। जो कुछ भी सीमित है, वो एक मामले में धोखा है। किस मामले में? वो तुम्हारी गहनतम अभिलाषा पूरी नहीं कर पाएगा, पर वो तुम्हारे सामने खड़ा इसी तरह से हो जाता है जैसे वो बड़ा महत्त्वपूर्ण हो—और महत्व…


प्रश्नकर्ता: क्या आत्मा को ही इस्लाम में रूह और क्रिश्चियनिटी (ईसाइयत) में स्पिरिट कहते हैं?

प्रश्नकर्ता: यूनिवर्स (संसार) का सत्य क्या है? मेरी आत्मा का उद्देश्य क्या है?
आचार्य प्रशांत: ये सवाल मत पूछो, ये पता लगाओ कि ये सवाल तुम्हारे मन में अरे आए नहीं हैं घुसेड़े गए हैं। तुम पूछ रहे हो सोल पर्पज़ क्या है, आत्मा का उद्देश्य क्या है? उद्देश्य बाद…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, आप बार-बार कहते हैं ऊँचे उठो, जो बड़े-से-बड़ा है उसको करो। जीवन में कोई बहुत बड़ा लक्ष्य होना चाहिए, कभी भी छोटा होना स्वीकार मत कर लो। आप ऐसा बोलते हैं।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मैं आपको कुछ समय से सुन रहा हूँ। मेरे एक मित्र से मेरी बातचीत हो रही थी, जो कि दलित वर्ग से हैं। तो मैंने उन्हें कहा कि, 'आप आचार्य जी की पुस्तकें पढ़ें, वीडियोज़ देखें, वेदांत की तरफ जाएँ; जो मूल शिक्षा है सनातन धर्म

भाषा हमें बहुत सारे देती है नाम। और ये जो सारे नाम हैं, ये हमें भरोसा दिला देते हैं कि अपूर्ण अहंकार, पूर्ण हो सकता है। ‘इस नाम से बात नहीं बनी तो उस नाम से बात बनेगी; तो उस नाम से बात बनेगी, तो उस नाम से बात बनेगी।




प्रश्नकर्ता: मेरा नाम पूनम साहू है और मै जर्नलिज़्म डिपार्टमेंट (पत्रकारिता विभाग) से विद्यार्थी हूँ। मेरा सवाल आपसे ये है कि विपरीत परिस्थितियों में ख़ुद के मन को किस तरह शान्त रखें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं अपना प्रश्न एक उदाहरण से प्रारम्भ करूँगा। जैसे आज़ादी के तुरन्त बाद भारत और पाकिस्तान जो साथ में देश थे वो अलग हो गये। और उसके कुछ समय तक भी पाकिस्तान नहीं चल पाया और उसमें से भी पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों अलग हो गए।


प्रश्नकर्ता: जब आपसे लोग पूछते हैं कि क्या आप एनलाइटेंड (प्रबुद्ध) हैं, तो आप बार-बार एक ही जवाब देते हैं, न हूँ, न कभी होने वाला हूँ। कहीं ये वही बात तो नहीं कि हमें किसी चीज़ का अनुभव न हो, तो हम कह दें कि वैसी कोई चीज़ होती…

प्रश्नकर्ता: मन दूसरों से मान की अपेक्षा रखता है, लेकिन अपमान होता है तो बुरा तो लग ही जाता है।
आचार्य प्रशांत: जानते हो ये मान-अपमान क्या चीज़ है? पूरी तरह प्राकृतिक है बस, और कुछ नहीं है। और हमने कहा था प्रकृति बस दो-चार चीज़ें ही चाहती है, क्या?…


प्रश्नकर्ता: गुरुजी, जब भी हमारे गुरुभाई, गुरुबन्दगी की बात करते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि हम भी पूरी बन्दगी कर सकते हैं। अकेले बैठकर भी ऐसा लगता है कि उनकी संगति में ही हूँ, पर जब अकेले नितनेम या गुरुबन्दगी करने बैठने लगते हैं, तो कठिनाई महसूस होती
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न सच्ची ख़ुशी को लेकर है। जैसे मैंने कोई कामना करी, और अगर वो पूरी नहीं होती है, तो उससे जो फ़्रस्ट्रेशन, जो दिमाग में मम्बलिंग या ओवरथिंकिंग (अधिक सोचना) होती है, बाद में इसको लेकर एक वॉइड (खालीपन या रिक्तता) बन जाता है…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे एक चीज़ पूछनी थी कि जैसे आपकी चेतना है या ओशो रजनीश की चेतना, हम ये मान के चल रहे हैं कि आप लोगों की चेतना एक आम चेतना से बहुत ऊपर है। तो क्या हम ये मान के चलें जब ऐसे धर्मगुरु शरीर छोड़ते हैं…
प्रश्न: आचार्य जी, हम पूर्णता के भाव तक कैसे पहुँचे?
आचार्य प्रशांत: पूर्णता के भाव तक पहुँचे कैसे, शुरुआत यहाँ से करते हैं। पूर्णता कोई भाव है ही नहीं, तो उस तक पहुँचने का भी कोई प्रश्न नहीं है।
आप (प्रश्नकर्ता) कहते हैं कि आपने मेरा लिखा पढ़ा है, थोड़ा…
Questioner: Acharya Ji, a good discussion happened yesterday in which many seekers participated and shared their understanding of Prakṛiti, Puruṣha and other things.
During the discussion, it was put that Prakṛiti, Puruṣha, Māyā, are mere concepts and that one is pure Ātman, never threatened and…
Acharya Prashant: Chandogya Upanishad — Chapter 3, part 11, verses 2 and 3:
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन । देवास्तेनाहंसत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ ३.११.२ ॥
na vai tatra na nimloca nodiyāya kadācana | devāstenāhaṃsatyena mā virādhiṣi Brahmaṇeti || 3.11.2 ||
Never does this happen there; never did…
Buddha's silence on Ātmā corresponds to Śūnyatā, showing no interest in Īśvara. Vedānta similarly shows no concern for these concepts. Acharya Shankar explains that as long as the Jīva perceives itself as Truth, Īśvara becomes necessary. Īśvara holds value only while the Jīva considers itself real. Once one identifies as Ātmā, Īśvara disappears, leaving only Ātmā, also known as Brahman: "Ayam atmā brahman.
Questioner: Acharya ji, in Bhagavad Gita, Sri Krishna says, “I am the highest in all the vidyas.” He says, “I am the Everest in mountains”; that way he denotes all the powers. He says, “I am Atman, the highest thing, absolutely”.
There he does not say the potential but…
The 'Atma' has no age; it is ageless; the mind has the…
“ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम्। विज्ञानमकामुरुधेव विभाति माया स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्प:।।“
“यह जगत् मन का विलास है, दीखने पर भी नष्टप्राय है, अलातचक्र (लुकारियों की बनेठी)– के समान अत्यन्त चंचल है और भ्रम मात्र है— ऐसा समझे। ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित एक ज्ञानस्वरूप आत्मा…
दृष्ट्वा मां त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम्। ब्रह्माणमग्रत: कृत्वा पप्रच्छ: को भवानिति।।
“मुझे देखकर सनकादि ब्रह्माजी को आगे करके मेरे पास आये और उन्होंने मेरे चरणों की वन्दना करके मुझसे पूछा कि आप कौन हैं?”
~ हंस गीता, श्लोक २०
इत्यहयं मुनिभि: पुष्टस्तत्त्वजिज्ञासुभिस्तदा। यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे।
प्रिय उद्धव! सनकादि परमार्थतत्त्व…
Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts, fear, etc.
~ Niralamba Upanishad, Verse 25
✥ ✥ ✥
Acharya Prashant (AP): “Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts or fear etc. Bondage is to imagine that Ātman has doubt or…
Questioner (Q): Sir, my question is about handling pressure—the pressure of expectations. Sir, when God in Bhagavad Gita says that a human being is bound to make mistakes, why society is not ready to accept mistakes? Everybody is judged in the end by only results. How would you work if…
Questioner (Q): So I had your advice and I got some books in terms of getting different perspectives. It might be a bit weird in a way question but I kind of wonder, when people are praying for God somewhere and also you're mentioning something about the myth of the…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि भगवान महावीर आत्मा को मानते हैं और भगवान बुद्ध आत्मा को अस्वीकार करते हैं। एक आत्मा को सत्य बोलते हैं और एक असत्य बताते हैं तो इन दोनों के बीच में अंतर क्या है?
आचार्य: जब कोई बात हमको बताई जाती है…
hiraṇmaye pare kośe virajaṃ brahma niṣkalam tacchubhraṃ jyotiṣaṃ jyotistadyadātmavido viduḥ
In a supreme golden sheath the Brahman lies, stainless, without parts. A Splendor is That, It is the Light of Lights, It is That which the self-knowers know.…
तो माने हमारी सारी गतिविधियाँ, हमारे…
तो पहली…
आचार्य प्रशांत: गिरीश मोहन हैं, कह रहे हैं उपनिषद् में बहुत पहले पढ़ा था, “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो”। आपकी बातें सुनता हूँ तो वो श्लोक याद आ गया, मुझे समझाइए कि आप ताकत पर, बल पर इतना ज़ोर क्यों देते हैं ?
गिरीश मोहन! बल तो चाहिए न, नहीं तो बह…
अन्तर्हितच्क्ष स्थिरजड़्गमेषु ब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन। व्यप्त्याअव्यवच्छेदमसड़्गमात्मनो मुनिनर्भस्त्वं विततस्य भावयेत्।।
(अध्याय १, श्लोक ४२)
राजन, जितने भी घट-मठ आदि पदार्थ हैं वो चाहे चल हों, अचल हों, उनके कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होने पर भी वास्तव में आकाश ‘एक और अपरिछिन्न है’। वैसे ही चर-अचर जितने भी सूक्ष्म-स्थूल शरीर हैं उनमें आत्मा रूप…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। एक छोटी सी कन्फ़्यूज़न थी कि अब तक मैं समझता था कि जिसको हम लोग जीवात्मा कह रहे थे वो आत्मा है। और जिसको हम आत्मा कह रहे थे वो परमात्मा है, जिसे हम सत्य कहते थे। ये मेरी अपनी समझ थी।
तो मुझे अभी तक…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हाल ही में वीडियो प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है — “हिन्दू इतने देवी-देवताओं को क्यों पूजते हैं?” तो उसमें भी आपने यही समझाया था कि पूजन या पूजा तो देवी-देवताओं की ही हो सकती है, क्योंकि ब्रह्म की हम पूजा कर नहीं सकते। उसी सिलसिले में…
आचार्य प्रशांत: आज्ञा का अर्थ है– विशेषाधिकार किसी का, किसी के पीछे सुनना, किसी को बहुत ऊँचा स्थान दे देना, किसी को प्रथम मान लेना। आत्मा और आज्ञा साथ-साथ नहीं चलते। आत्मा किसी की नहीं सुनती। आत्मा किसी की आज्ञा पर…
आचार्य प्रशांत: दत्तात्रेय कह रहे हैं कि जो व्याप्य और व्यापक दोनों से मुक्त है, उस एक — बस एक कहा है — उस एक के प्रति यदि तुम सफल हो, तो फिर तुम कैसे कहोगे कि आत्मा प्रत्यक्ष है कि परोक्ष है।
बात मीठी है और बात इतनी–सी ही…
आचार्य प्रशांत: नहीं, आत्मा न रूह है, न सोल है, न स्पिरिट है; आत्मा आत्मा है। अंग्रेज़ी में आत्मा के लिए एक विशिष्ट शब्द होता है – ‘सेल्फ़’; ‘सोल’ नहीं, ‘सेल्फ़’। और आत्मा वेदांत में…
लेकिन बहुत सारे ज्ञानियों ने ख़ुद को कभी दास कहा है, कभी पाँव तले की घास…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, धर्म के किस्से-कहानियों में एक नायक की तरह, एक सर्व शक्तिमान वीर या ज्ञानी की तरह बार-बार अवतारों का उल्लेख आता है। अवतार का क्या मतलब होता है? नरसिंह अवतार ने प्रहलाद को बचाया, वामन अवतार छोटे थे, बौने थे, परशुराम क्रोधित रहते थे, मत्स्य अवतार मछली…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये है कि जैसे न आत्मा जन्म लेती है न मरती है, तो जो आम धारणा यह है कि उसकी आत्मा भटक रही है या आत्मा अतृप्त है। तो जैसा कि आप बताते हैं कि आत्मा तो जन्मती ही नहीं है, न…
प्रश्नकर्ता: जो श्रीमद्भगवद्गीता की दो मूलभूत बातें हैं, उनको जोड़कर सवाल है। श्रीमद्भगवद्गीता में ये कहा गया है कि आत्मा एक शरीर बदलकर दूसरा शरीर धारण करती है। पिछले दो-सौ वर्ष में जो मानव जनसंख्या है, वो क़रीब एक बिलियन से बढ़कर अब क़रीब आठ बिलियन होने को है। तो…
गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ।।
~ नितनेम (अनंदु साहिब)
बाइ गुरुज़ ग्रेस द लॉर्ड अबाइड्स विदिन द माइंड, एंड वंस प्री-ऑर्डेंड डेस्टिनी इज़ फ़ुलफ़िल्ड।
“गुरु के अनुग्रह से ईश्वर मन में बसता है, और व्यक्ति पूर्वनिर्धारित नियति को प्राप्त कर लेता है।”
प्रश्नकर्ता: ग्रेस (अनुग्रह) और प्री-ऑर्डेंड…
आचार्य प्रशांत: परिस्थिति तो परिस्थिति है न?
प्र: वो जो विपरीत परिस्थितियाँ है; जैसे कि कोई हमारा काम…
अहंकारकृतं बन्धमात्मनोअर्थ विपर्ययम्। विद्वान निर्विद्घ संसारचिन्तां तुर्ये स्थितस्त्यजेत्।। ~हंस गीता (श्लोक-२९)
आचार्य प्रशांत: हंस गीता, श्लोक क्रमांक उन्तीस, यह बन्धन अहंकार की ही रचना है और यही आत्मा के परिपूर्णतम सत्य, अखण्डज्ञान और परमानन्दस्वरूप को छिपा देता है। इस बात को सुनकर विरक्त हो जाए और अपने तीन अवस्थाओं में…
प्रश्नकर्ता: जब मैं कैम्प में था, तो मुझे ऐसा लग रहा था कि मैंने दुनिया को ख़ुद पर हावी नहीं होने दिया। लेकिन जैसे ही वापस आया बीमार पड़ गया, तो ऐसा लगा कि मन पर दुनिया फिर से हावी हो रही है। काफ़ी सारे ढर्रे टूट चुके हैं, लेकिन…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न राजा जनक से सम्बन्धित है। वो एक शान्त, सरल और स्पष्ट जिज्ञासा करते हैं कि ज्ञान कैसे प्राप्त हो, मुक्ति कैसे हो और वैराग्य की प्राप्ति कैसे हो। मैं जब राजा जनक की स्थिति की तुलना महाभारत के अर्जुन की स्थिति से करता हूँ…