
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुः । अतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ 1.२ ॥
śrotrasya śrotraṃ manaso mano yadvāco ha vācaṃ sa u prāṇasya prāṇaścakṣuṣaścakṣuḥ atimucya dhīrāḥ pretyāsmāllokādamṛtā bhavanti || 1.2 ||
It is the ear of the ear, mind of the mind, tongue of…




ध्यान में बैठकर हम कोशिश करते हैं कि मन में एक भी विचार न आए, मानो सोचना कोई गंदगी हो। पर जैसे पेट का काम पचाना है, वैसे ही मस्तिष्क का काम सोचना है। विचार न कोई रोग है, न कोई बड़ी उपलब्धि, वह डकार जितनी ही साधारण क्रिया है। दस सेकंड आँख बंद करके अपनी कोई अधूरी हसरत पूरी होती सोचिए, सब नकली जानते हुए भी मज़ा आ जाता है। सोच के घोड़े को वही दौड़ा रहा है जिसे उससे राहत की आशा है। तो हम विचार से लड़ें, या पूछें कि यह सोच किसके लिए चल रही है?
आचार्य प्रशांत: केन उपनिषद है हमारे सामने। सबसे पहले तो 'केन' और 'उपनिषद', इसी में बहुत कुछ छिपा हुआ है। 'केन' शब्द का अर्थ क्या हुआ? केन शब्द का क्या अर्थ है?
"किसके द्वारा किया गया है ये सब?" किसके द्वारा? किसके द्वारा? ये उसी अर्थ में हैं जैसे हम…
(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 1)
जिसने भी ये सोच लिया कि वो जानता है, उसके लिए ये बात तय है कि वो नहीं जानता।
प्रश्नकर्ता: जैसे कहा गया था की मैं…
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च॥
(अध्याय 3, श्लोक 2)
मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्मा को अच्छी तरह जान गया हूँ और न ही समझता हूँ कि उसे जानता हूँ। इसलिए मैं न उसे जानता हूँ,…

Self-help doesn't help. Its approach is, “I am sad as my desires are not fulfilled, so the way to help myself is to fulfill desires.” They never realize their lives are driven by biological, social, and cultural forces outside of themselves. Spirituality offers the only real solution: “Before helping the self, one must know what the self really is."

अलग-अलग नहीं हैं दोनों! बाहर से अलग हैं, अंदर से एक हैं। जिसको हम आध्यात्मिक ज्ञान भी कहते हैं, वह बस मन की खोजबीन, जाँच-पड़ताल का नाम है। हमें दोनों चाहिए, विज्ञान भी, अध्यात्म भी। विज्ञान इसीलिए ताकि तुम्हें जगत की हक़ीक़त पता रहे, और अध्यात्म ताकि तुम्हें मन का ज्ञान रहे, तुम्हें पता हो कि ये मन चीज़ क्या है? इन दोनों का ही पता होना चाहिए, जैसे तुम्हारे मन के पखेरू को दो पंख मिल जाएँ, अब वो मुक्ति के आकाश में उड़ जाएगा।

Man has certain desires. He is seeking the company of the highest, so that his lowest desires can be fulfilled. The highest is just a means, a method and that is the case with all means and methods. Whether the highest is the means, whether the highest is even the end, the real end is always the gratification of the lowly self. Man is such that even if he wants the company or proximity of Gods, it is for the fulfilment of his own personal objectives.

You’re conditioned to think you can only exist with social approval. What holds you back is the fear that something devastating will happen if you don’t conform. Challenge that belief. One must have a healthy contempt for the world, which is possible only when one has deep love for what’s real. Otherwise, you'll keep bowing your head.

'The observer is the observed; an honest observation dissolves them both.' Or, 'The observer is the observed, and both are false.' We lay a lot of emphasis on the world, assuming it to be the Truth. If the world is an entity independent of everything, then it has to be the Truth, right? Truth is that which is independent of everything.

They don't contradict each other. Existentialists like Sartre argue that humans cannot suppress consciousness and are 'condemned to be free.' We are born without a predetermined purpose—existence precedes essence. You exist first and must then discover your essence. In the spirit of 'Neti Neti' (neither this nor that), no external force can define your essence; it is your freedom to consciously determine what life is for.

संसार में तुम जिस भी चीज़ को शांति का,तृप्ति का साधन बनाओगे वो चीज़ बेचारी असफल हो जाएगी। तुम उसे भोगकर के कुछ और कर देते हो। तो फिर कौन है जो तुम्हें सन्तुष्टि दे सकता है? सिर्फ़ वो जो तुम्हारे स्पर्श से कहीं आगे का हो। तुम्हारा स्पर्श उस पर कोई दाग ही न लगा पाये, जो अस्पर्श्य हो। ऐसे किसी को ही सत्य कहा गया है, परमात्मा कहा गया है। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उस पर हावी नहीं हो सकते। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उसे बदल नहीं सकते।

Questioner: When I do something my parents don’t approve of, they scold me. But sometimes the matter goes too far and I get offended, and then I refrain from talking back to them; I fear that if I say something, I will end up hurting them. But then, if I…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न युग के बारे में है। जैसे हम पढ़ते हैं, चार युग होते हैं– सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। और जो एक युग होता है उसको लगभग लाखों वर्षों का मानते हैं। जबकि एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) के अनुसार जो स्टार्स (तारों) की पोजीशन (स्थिति) है,…

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

Questioner: Sir, as a law student, Every student has a concern about whether it is about environmental concerns, there is a lot of environmental pollution etc. Also, it is about poverty concern or corruption or any other social issue but then when we get out of college we get start…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र कहते हैं कि ध्यान की विधियाँ बंधन हैं। मेरी जिज्ञासा यह है कि इतनी सारी ध्यान की विधियाँ क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: विधियाँ उनके लिए हैं जिन्हें सत्य को तो पाना है और अपनी ज़िद को भी बचाना है। ख़ुदा को भी पाना है ख़ुद को…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं पिछले दो-तीन महीने से अध्यात्म में हूँ। थोड़े समय से बिलकुल सही चल रहा था, जब तक मन और बुद्धि पर काम हो रहा था तो ज़्यादा डर नहीं था, पिछले हफ़्ते कुछ ऐसा हुआ कि बहुत ज़्यादा डर लगने लगा। मैं जिनसे सीख रही…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मेरा सवाल मेरे बच्चों के बारे में था, आचार्य जी। मेरे नौ साल के और ग्यारह साल के दो बच्चे हैं लेकिन उनका लगाव आध्यात्मिक साहित्य में नहीं हो पा रहा है। वो लोग पंजाबी रैपिंग सॉन्ग सुनते हैं; बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग सुनते हैंl उसमें…

Acharya Prashant: The world overpowers us in a thousand ways, and don’t we agree to that? You go to the markets and the markets attract you; that’s kind of an attack, an invasion. And don’t you agree to that? Or do you just say that “This is an invasion upon…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! डू वी नीड टू क्रिएट गॉड्स ऑर वी हैव ऑलरेडी (क्या हमें भगवान बनाने होंगे या वो पहले से हमारे पास हैं)? जैसे हम कुछ अच्छी क्वालिटीज़ हम जो पढ़ते हैं शास्त्रों में, कई बार हमारे पास नहीं होती है, या वो हमारे पास है, हम अनदेखा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: एक चीज़ होती है मेंटल एजिलिटी (मानसिक चपलता), जैसे कि मैं कहीं बाइक से जा रहा हूँ और अचानक कोई मोड़ आ गया या एक कुत्ता बीच सड़क पर आ गया, तो मुझे एकदम से ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ी। तो ये जो स्किल (कौशल) होती है एकदम से …

प्रश्नकर्ता: अगले प्रश्नकर्ता आपके साथ गोवा शिविर में भी थे और वहीं से ही वे उद्धृत करते हैं। आपने कहा था, ‘आदमी वास्तव में जान जाए उनके ऊपर कौन है। तो आगे लिखते हैं कि आचार्य जी, इस बात को मैं कैसे समझूँ और जान पाऊँ कि ज़िन्दगी निजी भोग…
![अपने बारे में धोखे में मत रहो [ऐसे जाँचो अपनी सच्चाई] || आचार्य प्रशांत (2021)](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-af5c2d9d-efc9-4cdb-b73d-461d8c27b596/30/image.jpg)
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो मैं अब तक समझा हूँ, मुझे लगता है कि जैसे मन अपना सही जगह जानता है, तो पूरे दिन वो वही ढूँढता रहता है हर चीज़ में। खाली भी बैठा है तो वो प्लेननेस (साधारणता), वो जो ब्लंटनेस (भोथरापन) अच्छी नहीं लगती, वो फ्रेशनेस (ताज़गी) ही…

जीवन में जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचे अनुभव हों, उनको एक सीमा से ज़्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। और जो लोग सच्चाई के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं उनको थोड़े अलग तरह के अनुभव होने शुरू हो जाते हैं, इससे मैं सहमत हूँ। और वो अनुभव आपको तभी नहीं होते…

Questioner: One of the chapters is on Sattvik and Tamasik action. So how do you distinguish? And you keep saying in the book that there is a fine line between Sattvik and Tamasik actions.
Acharya Prashant: You see, Tamasik action is when you’re conditioned; when you’re in bondage, yet you…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं हंसराज कॉलेज का छात्र हूँ, कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेन्ट (संगणक विज्ञान विभाग) से। मेरे मन में एक प्रश्न है, जहाँ पर मैं दुविधा से भरा हुआ हूँ, कि मेरा इस बार अन्तिम वर्ष है और मैं कॉलेज से पास आउट हो (निकल) जाऊँगा। तो मेरी फैमिली…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, स्वधर्म क्या है? क्या स्वधर्म का पालन करते हुए आजीविका चलायी जा सकती है?
आचार्य प्रशांत: स्वधर्म का कोई सम्बन्ध आपके रोटी-पानी के जुगाड़ से नहीं है, कि ये ऑक्युपेशन (व्यवसाय) कि वो ऑक्युपेशन। आप जिसको वर्क (काम) बोलते हैं, वो और क्या होता है? आजीविका का…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…

प्रश्न: प्रणाम आचार्य जी। कई दिनों से मैंने व्यर्थ की जगहों पर समय बिताना छोड़ दिया है। फ़िज़ूल की बातों से दूर रहने लगा हूँ। पुराने दोस्तों से भी बेकार की बातें भी करना छोड़ दिया है। जो भी समय मिलता है पूरी कोशिश करता हूँ कि काम में लगे।…

प्रश्नकर्ता: स्त्री की सुंदरता से उसकी कोमलता का जो एहसास होता है, क्या वो परमात्मा की कोमलता जैसा होता है?
आचार्य प्रशांत: रोमेंटिक उपन्यास पढ़ रहे हो? हमें तो पता था सत्यम-शिवम्-सुंदरम, स्त्री कब से सुन्दर होने लग गई? सत्य सुन्दर होता है। स्त्री-पुरुष कब से सुन्दर हुए? कोमलता माने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सैक्स (यौन क्रिया) से सम्बन्धित बहुत विचार आते हैं तो उन्हें कैसे कम या नियन्त्रित कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँ ही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो, जो तुमको पता है…

Acharya Prashant: Desire means that you are not alright with yourself and you want something else to happen, correct? So, we are anyway not living for ourselves. We are rather living to change ourselves. And are these not two very different things? If you are living for yourself as you…

Acharya Prashant: Whatever you are doing, there has to be honesty in that. What is important is that you do not say one thing and do another thing. If you look at the great scientific discoveries or inventions, the scientist or the explorer would be busy in his chosen area…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम संघर्ष करते हैं तो वह समय हमें बहुत कुछ सिखाता है, लेकिन फिर हम उसे कठिन समय क्यों कहते हैं? और जब समय अनुकूल चल रहा हो तो हम कुछ ऐसे काम कर देते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए था। मुझे यह समझ नहीं…

Acharya Prashant: The spiritual soldier, the religious warrior has to be extremely intelligent. You could go to the extent of saying that he has to be cunning in the service of Truth; I’m choosing this word with all deliberation.
He has to be cunning in the service of the Truth;…

प्रश्नकर्ता १: आचार्य जी, प्रणाम। आज गुरु पूर्णिमा का पावन अवसर है। आपसे आज तक मिला तो नहीं हूंँ, लेकिन आपके वीडियोस व्याख्यान ही मेरे लिए गुरु समान हैं। सबसे पहले धन्यवाद!
श्री गुरुगीता में आया है —
"शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन। लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यग्गुरुमेव समाश्रयेत्।।"
यदि…

आप एक बन्धन छोड़ते हो तो दूसरा पकड़ लोगे। आप जब तक हो बन्धन अनिवार्य है। बन्धन को छोड़ने को तो एक बार को हम फिर भी रज़ामन्द हो जाएँगे, बँधे हुए को छोड़ने को रज़ामन्द नहीं होते। और जिसे बँधना ही है वो बेड़ियाँ तलाश लेगा, तुम लाख कोशिश करो उसे आज़ाद रखने की वो बेड़ियाँ तलाश लेगा। उसे बहाने मिल जाएँगे और उसके बहाने तर्कयुक्त होंगे, तुम उसके बहानों को गलत नहीं साबित कर पाओगे।

प्रश्नकर्ता: सबको प्रणाम। आज की इस धर्म चर्चा में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच में एक ऐसी विभूति या कहें शख्सियत आचार्य प्रशांत जी हैं। आपके बारे में मैं थोड़ा सा बताना चाहूँगा। आप बहुत ही ज्ञानी और पढ़े-लिखे एक आचार्य हैं। इन्होंने आइआइटी से इंजीनियरिंग की, आइआइएम से…

Vedanta does not talk of a personal past life, the person that you are or I am, we have no past or future life. Rebirth or reincarnation happens at a general, at a macro level, not at a personal level. It’s the “I” tendency that exists and keeps repeating its existence. Read more...

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आप हमेशा बोलते हैं कि ऊँचे उद्देश्य रखने चाहिए जिससे कि उसमें किसी भी तरीक़े का कोई डेविएशन नहीं होता है। अब ऊँचे उद्देश्य रखने की सामर्थ्य और साहस नहीं मिल पाता है क्योंकि अपनेआप को बहुत जगह मैं बेहोश पाता हूँ। कभी कुछ चीज़े साफ़…

प्रश्नकर्ता: साक्षी भाव के लिए ध्यान की आवश्यकता है?
आचार्य प्रशांत: साक्षी भाव और ध्यान एक ही बात है। ध्यान साक्षित्व का माध्यम नहीं है। थोड़ा समझेंगे, ध्याता हम सब सदा हैं, ऐसा नहीं कि जब आप कुछ विशिष्ट पलों में ध्यान लगाने बैठते हो तभी आप ध्यानी होते हो।…

प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…

अगर तुम्हारा हृदय अभी भी काँपता है, अगर तुम रोते हो, परेशान होते हो, तो एक तरीके से ये शुभ लक्षण हैं। इससे यही पता चलता है कि अभी भीतर कोई है, जो तुमको पुकार-पुकार कर कह रहा है, "बदलो, बदलो, ये ठीक नहीं है", इसी कारण कष्ट हैं तुम्हें। कष्ट का अर्थ ही है कि भीतर चेतना का स्रोत बैठा ही हुआ है।

Acharya Prashant: It has been told to us that there exist two centers. I suppose it has been very freshly told to you right? Very recently. He says, “How do I know that I am living out of the right center? How does a young man know whether he’s not…

प्रश्नकर्ता: जो अभी जिज्ञासा है मेरी आचार्य जी, यूट्यूब पर एक शॉर्ट्स देखा था, उसके सम्बन्ध में है। तो एक बहुत सुप्रसिद्ध व्यक्ति जो श्रीमद्भगवद्गीता पर बोलते हैं उनका वह शॉर्ट्स देखा था; काफ़ी चल रहा है, बार-बार मेरे फीड पर आया। तो वो निष्काम कर्म पर बोल रहे थे…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं कसौली हिमाचल प्रदेश का रहने वाला हूँ, शिमला के पास में ही है बिलकुल। यहाँ पर पिछले कुछ सालों में टूरिज्म बहुत बढ़ गया है। और उससे जॉब्स तो क्रिएट हो रही हैं, परकैपिटा इन्कम भी बढ़ रही है। बल्कि रीसेंटली मैंने एक स्टडी पढ़ी…

The character of Radha is not present in any of the Upanishads, obviously, not in the Vedas. It is not sufficiently present even in the Puranas. With respect to the character of Sri Krishna, there are two Puranas mainly. There is the Shrimad Bhagavad Puran and there is the Harivansh Puran. These two are dedicated to Sri Krishna. Even in these two, Radha is scarcely mentioned. Read more....