
आचार्य प्रशांत: तिरसठवाँ श्लोक उद्धृत किया है, पिंगलागीता से। भीष्म कहते हैं, युधिष्ठिर से - “राजन्! ब्राह्मण द्वारा कहे गए इन युक्तियुक्त वचनों से राजा सेनजित् का चित्त स्थिर हो गया। वे शोक छोड़कर सुखी हो गए और प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे।”
तो कह रहे हैं प्रश्नकर्ता कि यहाँ तो ऐसा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिंगला गीता में श्लोक क्रमांक १८ से २१ से प्रश्न है।


“संसार में विषयों की तृष्णा से जो व्याकुलता होती है, उसी का नाम दुःख है, और उस दुःख का विनाश ही सुख है। उस सुख के बाद (पुनः कामनाजनित) दुःख होता है। इस…
नवरात्रि में देवी और असुरों की कथा पढ़कर सवाल उठता है: जब दोनों ही प्रकृति हैं, तो लड़ाई किससे है? लड़ाई प्रकृति से नहीं, उस अधूरेपन से है जो मानता है कि दुनिया को भोगकर वो पूरा हो जाएगा। देवता और असुर दोनों यही चाहते हैं। अंतर बस इतना है कि चोट खाकर देवता देखते हैं और लौट आते हैं, असुर फिर वही दोहराते हैं। हम भी रोज़ भोजन, लोगों और चीज़ों से पूरा होने की उम्मीद करते हैं। और ‘सब ब्रह्म है’ कहकर विवेक छोड़ देना भी उसी अहंकार की चाल है। चोट हमें भी लगती है; क्या हम उससे सीखते हैं?

नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं और महिषासुर को बाहर का कोई दैत्य मान लेते हैं। पर दुर्गा सप्तशती का दूसरा चरित्र हमारी अपनी वृत्ति की कथा है। जो मन प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मानता है, जंगल काटता है, नदियाँ दूषित करता है, पशुओं को खाता है और कहता रहता है कि मुझे और चाहिए, वही महिषासुर है। त्यौहार उसी के वध के लिए है, उसे भोग लगाने के लिए नहीं। क्या इस नवरात्रि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानेंगे?

सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?

नवरात्रि में हम माँ की स्तुति करते हैं, पर दुर्गा सप्तशती कहती है कि माँ ही बंधन है, माँ ही मोक्ष है। माँ माने समय, परिस्थितियाँ, शरीर, समाज, वह सब कुछ जिससे हम जुड़े हैं। जीवन में कुछ गड़बड़ होती है तो हम परिस्थितियों को दोष देते हैं, और जो प्रकृति को दोष देता रहेगा, वह उससे कभी मुक्त नहीं हो पाएगा। अपनी भूल देखना और दोष प्रकृति पर न डालना ही स्तुति है, यही आत्मज्ञान है। क्या इस नवरात्रि हम माँ को अपने भीतर देख सकते हैं?

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

एक महिला खिलाड़ी वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतती है, लेकिन उसे ऑनलाइन हैरसमेंट, फ़ेक अकाउंट्स और आपत्तिजनक तस्वीरों का सामना करना पड़ता है। सदियों की वर्जनाओं ने हमें स्त्री को सिर्फ़ देह के तल पर देखने का आदी बना दिया है, उसकी काबिलियत या गहराई से कोई सरोकार नहीं रहता। यही पैटर्न गाड़ी, नौकरी और शादी जैसे रोज़मर्रा के फैसलों में भी दिखता है। यह कोई विकृति नहीं, बल्कि इन्हीं वर्जनाओं की स्वाभाविक परिणति है।

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

शादी और रिश्तों के सामाजिक दबाव में अपने शरीर और गरिमा का सौदा करना बंद करना ज़रूरी है। जीवन का उद्देश्य केवल जोड़ी बनाना या यौन सुख पाना नहीं है। प्रेम वह है जो व्यक्ति को भीतर से ऊँचा और मुक्त करे, न कि उसे वस्तु बना दे। इसलिए पहले स्वयं को गढ़ें, ज्ञान और कौशल बढ़ाएँ, जीवन को सार्थक बनाएँ और अपने भीतर पूर्णता विकसित करें; सही व्यक्ति मिले तो स्वागत है, न मिले तो भी जीवन अधूरा नहीं है।

सच्चा वैराग्य महत्वहीन या हानिकारक चीज़ों को छोड़ना है, और सच्ची महत्वाकांक्षा उस चीज़ के लिए पूरी तरह समर्पित होना है जो वास्तव में मूल्यवान है। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि गहरी समझ के दो पहलू हैं। जब विवेक से सत्य और असत्य स्पष्ट दिखने लगते हैं, तो त्याग प्रयास नहीं रहता, स्वाभाविक हो जाता है। आध्यात्मिक यात्रा में यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।

True freedom begins when we question the beliefs that make us feel trapped. Most of our suffering comes not from circumstances but from unquestioned assumptions, attachments, and imagined obligations. By suspending our beliefs, even briefly, we allow truth to enter, revealing that life always offers choice. Transformation is born from love for truth, the courage to let go, and the willingness to step beyond the boundaries created by the ego.

The Bhagavad Gita deserves reverence not because of inherited beliefs about its author, but because of its power to dissolve falsehood and reveal Truth. Real devotion is not ritual or blind faith—it is understanding, inquiry, and living the wisdom of the Gita. Through sincere study, one discovers the true meaning of Krishna, making the Gita the most authentic path to knowing and worshipping Him.

लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।

आत्मज्ञान के बिना समाज, पर्यावरण या किसी भी बाहरी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं, क्योंकि हर संकट की जड़ मनुष्य की चेतना में है। बाहरी सुधार, नीतियाँ या अभियानों की अपनी भूमिका है, लेकिन वे मूल कारण को नहीं बदलते। इसलिए सबसे आवश्यक कार्य है स्वयं को बदलना और सत्य के प्रति गंभीर होना। जो व्यक्ति सत्य के प्रति उदासीन है, उससे स्वीकृति या मान्यता की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।

Real change begins not by changing the world alone but by understanding the one trying to change it. Laws, technology, policies, and scientific progress have value, yet they cannot solve problems rooted in human consciousness and endless desire. Truth remains the same across cultures and disciplines, requiring only a change in language, not in essence. Lasting solutions emerge through honesty, self-inquiry, and inner transformation, because no external system can replace a change in the human mind.

The mind is not an independent entity but a structure built and maintained by the ego through thoughts, memories, beliefs, and experiences. Most spiritual practices fail when they become distractions from examining the ego itself. Experiences, emotions, and preferences are often conditioned and unreliable. Real inquiry begins with observing the experiencer, admitting facts without distortion, and applying the same rigor to inner life that science applies to the external world.

जीवन के बड़े निर्णय, जैसे करियर और विवाह, तभी सार्थक होते हैं जब वे समझ और जागरूकता से लिए जाएँ, न कि सामाजिक दबाव या आदत के कारण। अधिकांश लोग बिना स्वयं को समझे जीवन के महत्वपूर्ण चुनाव कर लेते हैं और फिर उनके परिणामों से जूझते हैं। वास्तविक परिपक्वता अपने जीवन की जिम्मेदारी लेने, स्वयं को जानने और बाहरी अपेक्षाओं के बजाय स्पष्टता और विवेक के आधार पर निर्णय लेने में है।

Operating from the highest inner point means living with honesty rather than self-created illusions. The ego becomes “higher” not through mystical growth but by dropping false self-images and testing its claims against reality. When honesty weakens, lower motives take control, creating inner conflict and disorder. Real growth lies in continuously questioning oneself, facing uncomfortable truths, and preventing the ego from being driven by comforting but deceptive beliefs.

अहंकार मनुष्य की मूल समस्या है। हम ज्ञान समझते हैं पर उस पर चल नहीं पाते क्योंकि अहंकार को अपनी पहचान के लिए दूसरों की आवश्यकता है। परिवार, समाज, विचारधारा से हम सौदा करते हैं - अपनी स्वतंत्रता बेचते हैं। सच्चा प्रेम स्वयं को और दूसरों को मुक्त करना है, न कि बंधन में रखना। ईमानदारी से अपने झूठ को देखना ही सत्य है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

Question: A gentleman was saying that a person, who is drinking or is drunk, he still has got some kind of stability on mind, and he too, can judge. That is what I felt to be perhaps wrong. A person who is drunk probably loses his judgement and whatever we…

तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।

जब आप न स्वयं को जानते, न ज़िंदगी को जानते, तो ये आप क्या करने जा रहे हो? आपकी ज़िंदगी में कोई अजनबी आएगा और अब वो उम्र भर आपके साथ रहेगा। ये आपकी ज़िंदगी का सेंटर बन जाना है। ज़िंदगी इसी काम के लिए है? बेहोशी में, अनजाने में रिश्ता बना लो और फिर उम्र भर उसकी खिदमत करो। मैं कह रहा हूँ, इंसान बेहतर हो जाएगा तो उसके सारे कर्म बेहतर हो जाएँगे, सारे संबंध बेहतर हो जाएँगे, जिसमें शादी भी सम्मिलित है। उसके बाद तुम जो भी निर्णय करो, अच्छा है। करनी है शादी, शौक से करो, मौज में करो।

एक आदर्श रहता है मन में कि ज़िंदगी ऐसी-ऐसी होनी चाहिए। और वो आदर्श लेकर आप पैदा नहीं हुए थे, वो आदर्श इधर-से-उधर-से आपके मन में आ गया। अब आपको ज़िंदगी नहीं चाहिए, अपने आदर्श जैसी ज़िंदगी चाहिए। उसमें ये भी शामिल है कि दोस्त ऐसे हों, पति ऐसा हो, जीवन ऐसा हो। और हमारे सारे आदर्श सामाजिक होते हैं। हमारा प्यार भी प्यार नहीं है, वो समाज का फ़रमान है, संस्कारों का आदेश है। इसके कारण जीवन जैसा सामने खड़ा होता है, वो हमें कभी-कभी दिखाई ही नहीं देता। हमारी ज़िंदगी बस एक तुलना बनकर रह जाती है।

लड़का–लड़की का मिलन तो बहुत साधारण–सी बात होनी चाहिए; कुछ उसमें इतना विशेष नहीं कि उसका हव्वा बनाया जाए। आदमी है, औरत है, तो उनमें सेक्सुअलिटी भी होगी, वो ठीक है। लेकिन तुम उसको सेंटर बना देते हो कि यही सबसे बड़ी चीज़ है। हमारी परंपरा ने बीच में पर्दे डाल–डाल कर दोनों को इतना दूर कर दिया कि दोनों ने एक–दूसरे के बारे में फ़ैंटेसीज़ बना ली हैं। इंसान को इंसान की तरह देखो। ये सब जो तुमने कहानियाँ पाल ली हैं, ये तुम्हारा नासूर हैं। ये कहानियाँ हटा दो, देखो, जीवन कितना आसान हो जाता है।

पर तुमने अगर मेरे साथ थोड़ा सुना है, पढ़ा है, अध्यात्म, उपनिषद्, गीता थोड़ा तुम्हारे भीतर उतरी है, तो मनुष्य क्या है? मनुष्य की पहचान क्या है? त्रिगुणात्मक प्रकृति क्या है? और किस तरीक़े से वो हमें संचालित करती है, ये सब समझ में आया होगा। तो फिर समझ पाओगे कि मैं तुम्हें क्या कह रहा हूँ। कुछ विशेष नहीं है बेटा यहाँ पर। क्या विशेष हो जाना है, बताओ न क्या विशेष हो जाना है?

यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।

जीवन सही जियो, तो रिश्ते भी फिर सही बनाओगी। सही लोगों को ही अपनी ज़िंदगी में प्रवेश दोगी। गलत ज़िंदगी जीने के कई दुष्परिणाम होते हैं। उनमें से एक ये होता है कि तुम्हें सब गलत ही लोग मिलेंगे। अभी दिक़्क़त ये होती है कि खेल तो होता है सारा जिस्मानी, लेकिन तुमने अपने आप को ये समझा रखा होता है कि बात भावनाओं की है। तो फिर जब रिश्ता टूटता है जिस्मानी, तो तुमको ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी भावनाओं पर चोट हुई है। अरे, बात भावनाओं की कभी थी ही नहीं। क्यों व्यर्थ में भावनाओं को इसमें बीच में ला रहे हो।

You have to get into your own life, thoughts, feelings, actions, decisions, and see what holds you back. And freedom from what holds you back is the most important. That is what is most important. And then you can accept whatever price you have to pay for that most important thing. So it all starts from you. what is really important is a subjective thing. It depends on you. Nobody else can tell it.

जिनके पास कुछ करने को नहीं है, वो कुछ तो करने की कल्पना करेंगे न। अब आदमी को पता नहीं होता कि सूनापन चीज़ क्या है; वो पैदा कहाँ से हो रहा है। तो उसको भरने के लिए फिर तरह-तरह की कोशिशें करता है, अपनी स्थिति अनुसार। आप स्त्री हो, तो डिमांड पुरुष की करोगे; आप पुरुष हो, तो स्त्री की करोगे। आप ग़रीब हो, तो पैसे की करोगे। ऐसा लगेगा कि अलग-अलग चीज़ों की डिमांड हो रही है। पर वो जो आपकी डिमांड है, माने डिज़ायर है, वो वास्तव में आ रही है एक ही जगह से, वह है हमारा अस्तित्वगत अज्ञान, उसी को अहंकार बोलते हैं।

“Immersing myself in deep meditation.” What do you mean by meditation? And who is being immersed? Please tell me, beyond a trick of words, what is this? But you’ll never ask these questions, because some Baba-ji totally dominated your faculty to question with his get-up and demeanour. Real spirituality is not about something that sounds elevated or respectable. Whenever you are bombarded with high-sounding fluff, learn to ask this question; what exactly does that mean?

We keep carrying the unexamined burden of the past all our life. That’s a great problem that we have. If you want to carry something from the past, if you want to remain related to it even today, then you have to ask: how does it benefit you? Because it’s an expensive decision to make. The purpose of life is to unburden yourself. Relate to something or somebody in a way that will help you clear away a lot of useless relationships.

"वो मुझे याद आती है। उसकी छुप-छुप के तस्वीरें देखता हूँ।" ये गुलाबी समस्याओं का कोई समाधान नहीं होता है। ज़िंदगी इसलिए नहीं होती है कि आपको बहुत सुख देगी; ज़िंदगी तो ज़ख़्म ही देती है। अच्छे काम में ज़िंदगी में डूबने का यही फ़ायदा होता है। यादें भी आती रहेंगी, जीना दुश्वार होता रहेगा, डट के काम करो, खूब थक जाओ, सो जाओ। और काम के बाद भी ऊर्जा मिली है, तो रैकेट उठा के जाकर के फोड़-फाड़ दो। कोर्ट को भी, नेट को भी, एकदम टूट जाओ, जाकर सो जाओ।

Women, the way they are brought up in our country, anyway do not have much to lose. If I do not have much in life, and then there arrives a person who is attractive, earns well, is strong, then why, as a woman, will I not go for him? Your body is impelling you to take a particular decision, and you don't even know that it's coming from the body. The only solution is understanding, real, deep, honest observation of life. And this you could also call spirituality.

पत्नी, बहू घर आई है तो खाना बनाएगी, बर्तन धोएगी, कपड़े साफ़ करेगी, बच्चे पैदा करेगी। इसमें पवित्रता क्या है? क्या बताते हो कि शादी का पवित्र बंधन, अगर यही सब है, तो पवित्र क्या है इसमें फिर? पवित्रता चीज़ क्या होती है; ये जानना है तो ऋषियों के पास जाओ, उपनिषदों के पास जाओ। वो बताएँगे कि पवित्र माने क्या। “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” ज्ञान ही है जो पवित्र करता है। ज्ञान है पवित्र। ये थोड़ी है कि बर्तन माँजना पवित्र हो गया।

That’s what the entire spiritual process is about, collecting the airfare. So that you can rise up, otherwise, you stay crawling on the highway. Life is not so that you just remain a crawler, a creeper. Life is so that you can take off.

This breath-in, breath-out, stomach-in, tummy-out; this is not meditation. Even animals do not need training in breathing, and we are being taught how to breathe. What’s going on? You know, you should breathe mindfully. Why? Is there anything wrong with your breath? Meditation is nothing but an observation of the naked inner fact. That is meditation. To stand naked and honest in front of what is, that is meditation.

We teach our kids to write applications: “Humbly I beg to submit that today I have an ache in my tooth.” “Humbly I beg to submit!” If you are stating a fact, if the toothache is real, why the hell are you groveling? If that is the Truth, why are you begging? Drool, drool, drool. That’s become our culture. If your philosophy tells you to submit and surrender to several masters, you will never be a truthful person, because in Truth there is no authority but the Truth.

"As long as you are giving me pleasure and satisfying my needs, there will be peace. The day you stop, there will be war.” This is the usual social contract in which we exchange pleasures and dependencies. This is why there is a lot of violence. But there can be another way of relating to the other, where you are existentially complete within. There can now be beautiful, loving, compassionate relationships because you are not looking to be a parasite or a commander.

There is no compulsion, it's either a slavery you buy into or just an expensive luxury that the rich afford. All this that we are doing: success, marriage, fidelity, money, prestige, whatever, all these are founded on self-ignorance. Somebody tells you, “Go get married, bear kids.” What do you know? You don't know your own birth, and you are giving birth. No point playing blind. Before you start walking, start opening your eyes.

Duality is Truth wanting to know itself. If there is no duality, what will the Truth do? Alone, absolutely alone. He too needs a partner. So, it divides itself into two. All our sufferings, all imperfections are important. There is no reason to feel small about it. Without you, how will the Source know what it is to fail, what it is to suffer? Indulge yourself fully, but remember what all this really is. Don’t forget that.

प्रकृति ने इंसान को ऐसा बनाया नहीं है कि कोई भी दो व्यक्ति ताउम्र एकसाथ चल सकें। पहले रिश्ता चल जाता था, क्योंकि बहुत तरीके के डर होते थे। अब लोगों को हक आ गया है कि वो अलग हो सकते हैं, और जब लोगों को अधिकार रहेगा कि वो अलग हो सकते हैं, तो अलग होंगे। मैं नहीं कह रहा हूँ कि जितने लोग हैं, सब अपने रिश्ते तोड़ लें। गलती हो गई है तो उसका सुधार करो। सुधार पहले तो ऐसे किया जाता है कि बातचीत की, रिश्ता बचाने की कोशिश की, लेकिन अगर वो तरीका नहीं चलता, तो आवश्यक नहीं है कि एक-दूसरे के साथ बंधे रहकर यंत्रणा भोगो जीवनभर।

मुक्ति का मतलब ये नहीं है कि किसी को छूना नहीं है; नदी से कहना है, दूर हट, मैं पुरुष हूँ, तू प्रकृति है। आ गई भ्रष्ट करने बार-बार चली आती है। तू भी आ जाती है। न जाने कितनी सारी तो तुम हो; कोई इधर से घुस रही, कोई उधर से घुस रही। छोटी, बड़ी, लंबी, चौड़ी, हरी, काली, नीली, पीली, हर रंग की होती हैं, आ जाती हैं। किसी को मना नहीं कर रहा, वो सबको आलिंगन में ले रहा है और कह रहा है, तुम सब भी आ जाओ, तो भी मैं तो रहूँगा सागर ही।

This in itself is a philosophical question. This is why you should study philosophy, because you already have this question. Philosophy is your affection for the Truth, your leaning towards the Truth. Don’t you want to know the Truth? How many of you are happy with lies? Nobody. So, it is this love for Truth that we all innately have; that’s called philosophy.

एक सिद्धांत है। एक सिद्धांत क्या है? कि भाई, गाड़ी में जब पाँच-एक लीटर या दो लीटर ही फ्यूल बचे, तो गाड़ी आवाज़ कर देगी, वो सिद्धांत की बात है। आप गाड़ी को इसके लिए दोष थोड़े ही दे सकते हो। तथ्य ये है कि फ्यूल सचमुच कम है, तथ्य ये है कि आप बैठे हो या कोई भी बैठा हो गाड़ी यही कहेगी, कि “लो फ्यूल, लो फ्यूल।” गाड़ी कोई अपनी बात आपसे थोड़ी कह रही है। बात समझिए। और न गाड़ी की आपसे कोई व्यक्तिगत दोस्ती या दुश्मनी है, एक सिद्धांत है।

The fellow is the worst kind of human being possible. But you will not accuse him of disloyalty, infidelity, or cheating, because he still reserved his body for you. This simply tells that the relationship is founded on the body. The woman has been trained to consider herself the body, and so has the man. Why don't we broaden our definition of loyalty? Please ask, “You couldn’t be loyal to any kind of virtue. How will you ever be loyal to me?”

दुनिया ऐसी हो जाए और ज़िंदगी ऐसी हो जाए कि किसी विरोध की ज़रूरत ही न पड़े। पर आज ऐसा नहीं है, आज बहुत कुछ ऐसा है जिसे विरोध की ज़रूरत है। तो मैं वो विरोध कर रहा हूँ ताकि जो कुछ हटाया जाना है, मैं उसको हटा दूँ और मेरे बाद, मेरे अलावा कम ज़रूरत पड़े किसी को उतना जूझने की। लेकिन मान लो, मैं काम नहीं कर पाता पूरा, जिसकी बहुत संभावना है, तो जूझने से डरना मत। याद रखना कि संघर्ष इसीलिए है ताकि एक दिन संघर्ष न करना पड़े।

Drop the center of confusion, come to the center of clarity. Drop what the masses practice, come to the direct route of self-realization. That’s what it means.