इच्छा जिसे तलाश रही है वो इच्छा द्वारा मिल ही नहीं सकता || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

बूड़ा था पै ऊबरा, गुरु की लहरि चमंकि । भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरंकि ।। ~ संत कबीर
प्रश्न: हमारी उम्मीदें क्यों कभी पूरी नहीं होतीं?
वक्ता: आपकी उम्मीदें कभी पूरी नहीं होंगी। संसार से हमारी जो भी उम्मीदें हैं, वो अंततः यही उम्मीद है कि हम तर जाएँगे। हमें लगता है हमें चरमसुख मिल जाएगा चीज़ों से। वो हो नहीं सकता, पर अभिलाषा हमारी यही है कि हम ‘परम’ को, पदार्थ के माध्यम से पा लें। अभिलाषा हमारी ये है कि हम परम को पदार्थ के माध्यम से पा लें। नई कार खरीदें और उससे हमको मोक्ष-तुल्य आनंद मिल जाए।
आप नया मकान, नई कार जो खरीदते हो, आप कार नहीं खरीदते हो, आप मोक्ष खरीदना चाहते हो। ये जो इतना उपभोक्तावाद है, तुम्हें क्या लगता है, तुम नई शर्ट, नई बाइक खरीदते हो? तुम उसके माध्यम से मुक्ति खरीदना चाहते हो। कबीर कह रहे हैं, “ये उम्मीद कभी पूरी नहीं हो पाएगी। ये उम्मीद छोड़ दो।” माया के माध्यम से हरि को नहीं पाया जा सकता, उसको तो सीधे ही पाना पड़ेगा। सीधा रास्ता ही काम आएगा।
ठीक बात है। कार में भी वही है और कूड़े में भी वही है, पर कूड़े में लिप्त होकर के तुम ‘उसको’ नहीं पाओगे। आप इस बात को समझते हैं अच्छे से कि हर इच्छा है ‘उसी’ की इच्छा? आप जब प्रेम करते हो, तो आपको पत्नी नहीं चाहिए होती है, हर प्रेमी ने कभी किसी और को प्रेम नहीं किया है, ‘उसी’ को प्रेम किया है। चाहिए उसको ‘वही’ है, और इसीलिए हर प्रेम असफल हो जाता है।
क्योंकि आपकी जो इच्छा है, वो कभी पूरी हो ही नहीं सकती। आपको चाहिए ‘परम’, वो कभी परम का विकल्प नहीं बन सकती है ना। पुरुष स्त्री में परम को तलाशता है, स्त्री पुरुष में परम को तलाशती है, वो कभी मिलेगा नहीं, तो इसीलिए आपके हाथ सिर्फ़ धूल लगती है। और कुछ ही समय बाद आप बड़े हताश हो जाते हो। आप कहते हो, “गड़बड़ हो गई, चूक हो गई,” पर आँखें तब भी नहीं खुलतीं। आप तब भी आप ये नहीं कहते कि, “परम को सीधे ही पाना पड़ेगा, माया के माध्यम से नहीं पा सकते।”





