ये आग किसने बुझाई है, ये जवानी क्यों बेच खाई है? || आचार्य प्रशांत (2023)

आचार्य प्रशांत: अपने आसपास की दुनिया को जब आप देखेंगे, तो दो बातें आपको प्रतीत होंगी। पहली ये कि दुनिया की हालत ठीक नहीं है। और दूसरी ये कि जो लोग जितना कामना-लोलुप हैं, वो उतने ही ज़्यादा ऊर्जावान दिखाई देते हैं। जो विध्वंस को जितना आतुर है वो उतना ही ज़्यादा उत्साही दिखाई देता है। और आप ये भी पाएँगे कि जो लोग विध्वंसात्मक नहीं हैं, कामना-प्रेरित नहीं है, वो थोड़े कम उत्साही, बल्कि बहुत कम उत्साही और उदासीन से प्रतीत होते हैं।
अब इन दोनों बातों को ज़रा मिलाइएगा। एक तो ये कि दुनिया की हालत हमें ख़राब दिखाई देती है और दूसरी ये कि दुनिया में सबसे ज़्यादा उत्साही, उर्जावान, सक्रिय लोग वही हैं जो चेतना के निम्न तलों से संचालित होते हैं। जिनके पास पूरी करने को अपनी क्षुद्र क़िस्म की आकांक्षाएँ हैं। जो किसी के कल्याण के लिए नहीं, अपने स्वार्थ के लिए काम करते हैं। यही लोग हैं जो दुनिया में सबसे आगे-आगे दिखाई देते हैं, सबसे ज़्यादा सक्रिय रहते हैं, सबसे ज़्यादा उत्साही रहते हैं, सबसे ज़्यादा श्रम करते हैं। तो इन दोनों बातों में जो सम्बन्ध है वो एकदम प्रत्यक्ष है।
दुनिया की ख़राब हालत है ही इसलिए क्योंकि दुनिया में कर्म करने की सारी ज़िम्मेदारी ग़लत लोगों के हाथ में चली गयी है। जो व्यक्ति जितना गिरा हुआ है, वो उतनी सक्रियता से कर्म कर रहा है। जो स्वार्थ, छोटे लाभ और विनाश के लिए काम कर रहा है। वो पूरी तत्परता से काम कर रहा है। उसके पास आलस नहीं, आवेग है। और जो लोग दुनिया को थोड़ा समझना शुरू कर देते हैं, जिनके स्वार्थ थोड़े कम पड़ जाते हैं, वो कर्म के प्रति भी उदासीन हो जाते हैं। तो नतीजा वही निकल रहा है जो हमारे सामने है। जगत विनाश की ओर तेज़ी से उन्मुख है। दुनिया की हालत किसी भी दृष्टि से अच्छी नहीं है।
कल एक छोटा सा आँकड़ा मैं पढ़ रहा था कि दुनिया भर में और विशेषकर भारत में पिछली शताब्दी के अन्तिम दस वर्षों में भी कुल मिलाकर वनों का उतना नाश नहीं हुआ था जितना अभी पिछले पाँच वर्षों में हो गया है। और पिछली शताब्दी भी अब समाप्त हुई है तो दुनिया में वन बहुत कम थे। जितने होने चाहिए उससे बहुत कम। लेकिन हमने क्या किया इस शताब्दी में? हमने ये किया कि वनों के विनाश की दर दूनी कर दी। वन पहले ही कम थे और उनके विनाश की दर हमने और बढ़ा दी। तो दुनिया की स्थिति बहुत मामलों में जितनी आज ख़राब है, इतनी ख़राब कभी नहीं रही। बहुत मामलों में आज दुनिया बहुत अच्छी और बड़ी सुखद भी प्रतीत होती है। लेकिन अगर आप थोड़ी विहंगम दृष्टि लेंगे, थोड़ा









