पीड़ा का एक सागर है मन। इसीलिए उसको नाम दिया गया है — भवसागर। होना ही पीड़ा है। जिन्हें दुख से बचना हो, उन्हें दुख से हटकर सुख की ओर नहीं भागना होता। उन्हें योग की ओर जाना होता है। योग है, दुख से निवृत्ति। दुख से बचोगे सुख की ओर जाकर नहीं, दुख से बचोगे योग की ओर जाकर। और योग का क्या अर्थ है? योग का अर्थ है, मन को आत्मा में लीन कर देना। यही योग है।
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दरस बिन दूखण लागे नैन। जब से तुम बिछुरे प्रभु जी, कबहूँ न पायो चैन। सबद सुणत मेरी छातियाँ कांपि, मीठी-मीठी बैन। बिरह-बिथा काँसू कहूँ सजनी, बह गई करवत थैन। कल न परत पल हरि मन जोवत, भाई छमासी रैण। मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैणा।।
~ मीराबाई
आचार्य प्रशांत: कल हम ही में से किसी से मेरी बात हो रही थी, तो उन्होंने कहा कि जब कोई पुराना दर्द भरा मार्मिक गीत सुनता हूँ। शायद ये नहीं कहा कि “पुराना,” पर कभी-कभी तो पता नहीं क्यों कुछ अजीब-सा लगता है, ऐसा लगता है कोई रिश्ता है। आँखें भर आ जाती हैं, मन में कुछ होने लगता है और बात कुछ नहीं। ऐसा नहीं कि मुझे कोई व्यक्तिगत उदासी है, ऐसा नहीं कि मेरे जीवन में कुछ चल रहा है। पर किसी और की तान सुनकर, किसी और के भाव सुनकर, किसी और का वियोग सुनकर — अपने भी हूक-सी उठती है। आपकी उठी हूक?
ये मीरा की कहानी नहीं है। श्रीकृष्ण कोई मीरा के व्यक्तिगत भगवान नहीं हैं। हम सब मीरा हैं और श्रीकृष्ण सबके हैं। तो मीरा ने जो कहा है, वो किसी इंसान की निजी बात नहीं है, वो हम सब की कहानी है। तो मीरा के गीत सुनकर अगर आपको कोई भावोदय न हो, मन को कोई पुरानी कहानी न याद आए, मन को ये किस्सा अपना-सा न लगे, ये दास्तान पहचानी-सी न लगे — तो वो चौंकाने वाली बात होगी। आप सुनें मीरा को, और आपको लगे जैसे आप ही गा रहे हैं, तो ये सहज साधारण बात होगी।




