सिद्धांत के तल पर ज्ञान देना बहुत आसान है, पर कबीर साहब जब तक उस ज्ञान को ज़िन्दगी बनता नहीं देख लेते, छोड़ते नहीं हैं। पाखंड पर जितनी चोट संत कबीर ने की है, उतनी शायद ही किसी ने की हो। वे संत-शिरोमणि इसीलिए कहे जाते हैं, क्योंकि मजाल है कि उनकी ज़ुबान सच बोलने में काँप गई हो। जानवर की ख़ातिर अपनी जान को दाँव पर लगाने का काम कबीर साहब के अलावा किसी ने नहीं किया है। ये वो जगह है जहाँ पर संत और सूरमा में फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। 7 जून को बक़रीद है और 11 जून को कबीर साहब जयंती है। तो मैं साहब के मांसाहार और पशुबली से रिलेटेड कुछ दोहे पढ़ रही थी। तो मैंने देखा कि जिस निर्भीकता से उन्होंने अपने समय पर उस बारे में बात की, उस तरीक़े से किसी और संत ने इतनी स्पष्टता से कभी बात नहीं की। तो मैं कुछ दोहों की सूची लेकर आई हूँ और मैं चाहती हूँ, आपसे समझना कि साहब वास्तविकता में क्या संदेश देना चाहते थे और समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते थे। और हम लोग आज भी इतने पुराने धार्मिक पाखंड में अभी तक फंसे हुए हैं, तो इसका कोई समाधान हो सकता है? और पशुबली जैसे धार्मिक पाखंड कार्य आज भी क्यों होते हैं?
आचार्य प्रशांत: देखो, कबीर साहब की यही बात है। सिद्धांत के तल पर ज्ञान देना बहुत अच्छा है — बहुत अच्छा है — लेकिन फिर भी आसान है। उनकी ईमानदारी बहुत खरी है। वो जब तक उस ज्ञान को ज़िन्दगी बनता नहीं देख लेते, वो तुम्हें छोड़ते नहीं हैं। पाखंड पर जितनी चोट संत कबीर ने करी है, उतनी शायद ही किसी ने करी हो और वो भी बड़ी विपरीत परिस्थितियों में।
हम बात कर रहे हैं मध्यकाल के बनारस की — कट्टरता का गढ़ — और दोनों तरफ़ की कट्टरता: ब्राह्मणवादी कट्टरता भी, वैष्णव कट्टरता, शैव कट्टरता, और इस्लामिक कट्टरता। मुसलमानों का तो राज था। और संत-शिरोमणि माने — सबसे ऊँचे — वो कहे इसीलिए जाते हैं क्योंकि मज़ाल है कि उनकी ज़ुबान काँप गई हो सच बोलने में। सामने खड़ी हैं बड़ी से बड़ी ताक़तें, उनके मुँह पर बोल रहे हैं कि तुम अधर्मी हो। यही वजह है कि जो ललकार आपको कबीर साहब के यहाँ मिलती है, वो अन्यत्र कम सुनने को मिलती है — या बस आपको दूसरी जगह उस ललकार की थोड़ी गूंज सुनाई देती है। यहाँ गर्जना है, गूंज नहीं है। यहाँ गर्जना है।


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