Live SessionsHIDP 2.0AP FrameworkHis BiographyThe MissionHis WorkOperation 2030
Op-Eds & ColumnsMedia CoveragePress ReleasesInstitutional TalksPodcastsGalleryInvite Him
BooksArticlesVideo CoursesVideo LibraryCareers
Acharya Prashant App
Get it on Google PlayDownload on the App Store

Contact Us
[email protected]+91 96505 85100
Copyright © 2026 PrashantAdvait Foundation
Terms and ConditionsPrivacy PolicyUndertaking
AP Articles
For YouTrendingAll Topics
AP Articles
Love

तुलसीदास की कहानी, और उनकी पत्नी का प्रेम || आचार्य प्रशांत, संत तुलसीदास पर (2017)

Acharya Prashant

13min
1.5kreads
तुलसीदास की कहानी, और उनकी पत्नी का प्रेम || आचार्य प्रशांत, संत तुलसीदास पर (2017)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, तुलसीदास जी के जीवन में ऐसा क्या घटित हुआ था कि अपनी पत्नी के लिए काव्य लिखते-लिखते उनका सच्चा स्वरुप उनके सामने आ गया?

आचार्य प्रशांत: आ नहीं गया, मार-मारकर सामने लाया गया। पत्नी नहीं थी वो, गुरु थी। और ऐसे नहीं पत्नी ने कहा था कि आप इतना मेरे लिए कर रहे हैं, ईश्वर के लिए करिए — ऐसे नहीं हुआ था। घटना ऐसी थी कि मार्मिक है। पत्नी गयी हुई थी मायके और तुलसीदास पर चढ़ा काम का ज्वर, और आषाढ़ (जून का महीना), मूसलाधार बारिश और ये भागे गये पत्नी के पीछे। वासना खींच ले गयी।

पत्नी ऊपर के तल्ले पर; कैसे पहुँचें ऊपर? समाज का भी डर कि दरवाज़ा खटखटाएँगे तो और लोग जान जाएँगे — कितना कामातुर है कि चला आया है। नीचे से आवाज़ दी; बादल कड़क रहे हैं, बारिश हो रही है, काहे को उसको आवाज़ सुनायी दे, पत्नी सो रही है ऊपर।

तो देखा ऊपर से कुछ लटक रहा है। अब घने बादलों से घिरा आसमान, चाँद तो छोड़ दो तारों की भी रोशनी नहीं है, कुछ दिखायी ही नहीं पड़ रहा है ये लटक क्या रहा है? वो जो भी लटक रहा है उसको पकड़कर चढ़ गये ऊपर। चढ़ गये, गये पत्नी के सिरहाने खड़े हो गये। वो खड़ी हुई, चौंकी, घबरायी। बोली, ‘कर क्या रहे हो? पगला गये हो!’ फिर पूछा, ‘आ कैसे गये?’ तो बोले, ‘वो तूने रस्सी लटकायी थी मेरे ही लिए। मुझे मालूम था, आग जितनी इधर है, उतनी उधर भी है; कुछ तो करेगी तू।’

बोली, ‘मैंने तो नहीं लटकायी। लटका क्या था देखने दो!’ देखती है तो मोटा साँप लटका हुआ था। उसने सिर पीट लिया। सिर भी पीटा होगा और तुलसीदास को भी पीटा होगा। पीटपाट के बोली कि जितना समर्पण, जितनी भावना यहाँ दिखा रहे हो, इसका अंश भी अगर राम के लिए दिखाया होता तो तर गये होते, इतनी मूर्खता नहीं कर रहे होते।

समझ रहे हो बात को?

अब लोहा गरम था तब चोट पड़ी है। खड़ी सीढ़ी गिरी हो, तब लगती है ज़ोर की। साँप जब बिल से बाहर आया हो तब चोट करो, तब तो लगेगी उसपर। तुलसीदास का साँप बिलकुल फनफना के खड़ा हुआ था। उस वक़्त बीवी ने चोट करी खड़े फन पर, तब लगती है। ऐसा गुरु चाहिए जो तुम्हें पहले तुम्हारे बिल से बाहर निकाले और जब फन खड़ा करके खड़े हो जाओ तो मारे फटाक! अकस्मात् नहीं हो जाता, कोई चाहिए फिर। और ये सब चीज़ें संयोग से होती नहीं। संयोग का इंतज़ार करो तो सदियाँ बीत जाती हैं।

ऐसी बीवी तो बड़ी अनुकम्पा से ही मिलेगी। और कोई होती बीवी, तो वो पहले कहती, ‘अरे! प्राणनाथ, नागनाथ ने डस तो नहीं लिया तुम्हें? और इतना कुछ करके आये हो तुम हमारे लिए, लो बिछ गये हम। हमारा सौभाग्य जो इतना प्रेमी पति मिला है।’ ये पत्नी भी ज़रा ख़ास रही होगी। ऐसी पत्नियाँ कहाँ होती हैं! पत्नियों को तो यही बहुत जचता है कि हमारे लिए इतना किया।

प्र: सर, अगर वासना ही थी तो उसकी जगह कोई दूसरी ले आते, जैसे कि आज होता है कि ब्रेकअप (सम्बन्ध-विच्छेद) हुआ तो दूसरी मिल गयी, अगर वो वासना ही थी तो।

आचार्य: क्या कहना क्या चाह रहे हो?

प्र: मतलब अपनी पत्नी को छोड़कर वो किसी और के पास भी तो जा सकते थे?

आचार्य: हाँ, जा सकते थे।

प्र: अगर सिर्फ़ वासना ही थी तो?

आचार्य: हाँ, जा सकते थे। नहीं गये।

प्र: मेबि (संभवतः) प्यार हो। प्यार, लव, कोई कनेक्शन (सम्बन्ध) हो?

आचार्य: अरे क्या कनेक्शन हो! समझ में नहीं आ रहा है काम का कितना घोर आवेग है, समझ रहे हो? इतना तुम्हें हुआ है कभी कि दनदनाती रात में, मूसलाधार बारिश, हाथ न मशाल, न शाल, भागे चले गये हो और साँप पकड़कर चढ़ गये हो?

बात समझ रहे हो?

वही कह रहा हूँ कि जब अहंता, वासना, इतने चरम पर होती है और तब उसपर ठोकर पड़ती है, तब वो टूटती है। आसानी से टूटने वाली नहीं है। साँप को पूरा बिल से बाहर निकालना होता है। और साँप, ये कभी पूरा बाहर आता नहीं, बड़ा होशियार है, कुछ न कुछ बचाकर रखता है। जब पूरा नंगा हो जाए तब उसे आईना दिखाना होता है। पूरा नंगा वो होना ही नहीं चाहता। और जिन क्षणों में वो पूरा नंगा होता है, उन क्षणों में कोई मिलता नहीं उसे आईना दिखाने वाला।

सौभाग्य होगा तुम्हारा अगर ये दोनों घटनाएँ एकसाथ घट सकें। पहला ये कि तुम पूरे नंगे हो सको, तुम अनुभव कर सको अपने नंगे यथार्थ को, तुम देख पाओ कि तुम काम के कितने गुलाम हो और ठीक उस क्षण जब काम अपने नग्न रूप में, अपनी पूरी कुरूपता और वीभत्सता के साथ ज़ाहिर हो रहा है तब कोई खट् से लाकर आईना दिखा दे। ये दोनों घटनाएँ एकसाथ घटनी चाहिए। ये बड़ा विरल संयोग होता है।

आमतौर पर तो तुम सभ्यता का मुखौटा ओढ़े रहते हो न। आमतौर पर तो तुम शालीन बने रहते हो, नंगे होते ही नहीं, कुछ-कुछ करके अपनेआप को ढके रहते हो। ऐसा संयोग चाहिए जब सब उभर गया हो, सब दिख गया हो, छुपने का कोई बहाना न चले और तभी कोई आये, अकस्मात् वरदान की तरह और तुमको आईना दिखा जाए। बुरा लगेगा, बहुत बुरा लगेगा।

पता नहीं कैसा लगा होगा तुलसीदास को पर जैसा भी लगा था, उससे रामचरितमानस पैदा हो गयी। काम से सीधे राम तक पहुँचे। प्रेमी उसी को जानना जो आईना दिखा सके। तुलसी को प्रेम था कि नहीं हम नहीं जानते, ये पक्का है कि पत्नी ज़रूर प्रेम जानती थी।

प्रेमी वही है जो तुम्हें सच्चाई तक ले जाए और आमतौर पर जो प्रेमी होते हैं, उनका एक ही मिशन होता है — सच्चाई से हटाओ, ख़ुद तक लाओ। उसे सच्चाई से हटाओ, अपने पास ले आओ, अपने पल्लू से बांध लो। वास्तविक प्रेमी उसको जानना जो सत्य से परिचय कराये तुम्हारा, जो आईना रख दे तुम्हारे सामने। दिक्क़त ये है कि ऐसा प्रेमी भाएगा नहीं। ऐसों को तुम प्रेमी मानोगे ही नहीं। तुम कहोगे, ‘ये तो परेशान करता है।’

प्र: आचार्य जी, ऐसे प्रेम की पहचान कैसे करें?

आचार्य: चोट लगेगी, मार पड़ेगी, पहचान अपनेआप दिखायी देगी। घाव होंगे, प्यारा नहीं लगेगा ऐसा प्रेमी। उसे छोड़ने का बहुत मन करेगा, छोड़ नहीं पाओगे — यही उसकी पहचान है।

जिसको लगातार छोड़ने के लिए वृत्ति कहे लेकिन फिर भी आत्मा उसे छोड़ने को राज़ी न हो, उसी को सच्चा प्रेमी मानना।

वही काम असली गुरु के साथ भी होता है। तुम्हारे मन की एक-एक लहर विद्रोह करती है। कहती है, ‘छोड़ो इसको, छोड़ो, भागो, परेशान करता है, शोषण, उत्पीड़न करता है। जली-कटी सुनाता है, डंडा मारता है, नंगा कर देता है, कोई आवरण शेष नहीं रहने देता, कोई बहाना नहीं चलने देता।’ मन कहेगा, ‘अब बस हो गया। आख़िरी बार है। भाग जाओगे और फिर पाओगे कि लौटकर आ गये।’

यही होती है प्रेम की निशानी। बार-बार भागना चाहोगे लेकिन भाग नहीं पाओगे। तुम्हारे बस में होता तो भाग गये होते। तुम पाओगे कि कुछ है जो तुम्हें बेबस किये देता है, कुछ है जिसपर मन का, अहंकार का ज़ोर नहीं चलता, उसे आत्मा कहते हैं। वो आत्मा का पक्षधर होता है, आत्मा उसकी पक्षधर होती है। वो तुम्हें आत्मा की याद दिलाता है और आत्मा तुम्हें उसकी ओर धकेलती है। वहाँ साँठ-गाँठ है। तुम्हें पता भी नहीं चलता तुम्हारे पीछे क्या खुराफ़ात चल रही है।

प्रेमी आत्मा से मिला हुआ है, आत्मा प्रेमी से मिली हुई है। इन दोनों का है महागठबंधन।

प्र: सर, एक फ़ैन्सी (आकर्षक) शब्द है जिसे कहते हैं सेल्फ़ रियलाइज़ेशन (आत्मबोध) और तब जाकर रामचरितमानस आयी, तो क्या ये वो था? या कुछ और? जैसे कि मतलब कोई आदमी ग़लत कर रहा है या ग़लत सोर्स (स्रोत) से इंस्पायर (प्रेरित) हुआ है, ज्ञान उसका ग़लत है, तब उसे ऐसा आईना दिखाया जाए या उसे दिखा या क्या वो इतना अलर्ट (सतर्क) था कि वो आईना देख पाया?

आचार्य: देखो भाई! बाहर वाला तो तुम्हें यदा-कदा ही आईना दिखा पाएगा, तुम ख़ुद तो अपनी हकीक़त से परिचित हो न। तो किस भाषा में बात कर रहे हो? कह रहे हो, ‘कब उसे आईना दिखाया जाए?’ किसके उपचार की बात कर रहे हो? किसके चिकित्सक बनना चाहते हो? अपनी बात करो न।

कोई और क्यों आये तुम्हें आईना दिखाने, तुम नहीं जानते तुम कैसे हो? आईने की ज़रूरत क्या है? आईना तो बाहरी होता है, और आईना हमेशा लेकर नहीं घूमोगे। आँखें तो हमेशा हैं, इन आँखों से अपना यथार्थ नहीं दिखता क्या? आईना क्या करोगे?

लगातार जी रहे हो न। लगातार जिये जा रहे हो तो लगातार अपनी हस्ती की हकीक़त से भी तो वाकिफ़ हो। जान तो रहे हो कि अगर आये हो रिक्शा करके तो रिक्शेवाले के प्रति क्या व्यवहार था। जान तो रहे हो कि अगर आये थे तो घड़ी को कितनी बार देखा, समय के साथ क्या रिश्ता था। जान तो रहे हो कि अगर ये उत्तर सुन रहे हो तो इस उत्तर के साथ क्या रिश्ता है। जान तो रहे हो कि अगर बाक़ी लोग बैठे हैं तो उनके साथ क्या रिश्ता है। ये भी जान रहे हो कि अगर बाक़ी लोग न बैठे होते तो अभी तुम्हारे शब्द बदल जाते, प्रश्न इसी तरीक़े से न पूछा होता, प्रतिवाद इन्हीं तरीक़ों से न किया होता, और सुनने में भी ज़रा गहराई और होती।

जान तो रहे हो कि पूरी दुनिया के साथ क्या रिश्ता है, इस महफ़िल के साथ क्या रिश्ता है। अब क्या आईना चाहिए? लगातार अपनी ज़िन्दगी पर निगाह रखो, उसके अलावा जानने को और है क्या!

Get Updates
Receive handpicked articles, quotes and videos of Acharya Prashant regularly.

This site is protected by reCAPTCHA.

By continuing, you agree to our Terms and Conditions and Privacy Policy

अभी यहाँ इतने लोग बैठे हैं, सब अगर अकेले-अकेले हों तो वैसे ही रहेंगे जैसे अभी हैं? फिर होगा ये कि कुछ ज़्यादा बोलना शुरू कर देंगे, कुछ का बोलना कम हो जाएगा, लेकिन बदल सब जाने हैं। इसका अर्थ क्या है? इसका ये अर्थ है कि दूसरों की मौजूदगी आपको बदल देती है। ये अहंकार की निशानी है। अहंकार ही प्रभावित होता है। आत्मा तो कम से कम ऐसे मौक़ों पर नितांत अकेली हो जाती है, उसको दूसरा कोई नज़र नहीं आता। आत्मा के लिए तो सत्संग में कैवल्य होता है, अहंकार के लिए सत्संग में भी समाज होता है।

प्र: आचार्य जी, ये कैसे मालूम पड़े कि अब मैं ज्ञानशून्य हो गया हूँ और उस अवस्था में हूँ?

आचार्य: कुछ मालूम नहीं पड़ता। ये प्रश्न भी तब मालूम नहीं पड़ेगा। अभी ये प्रश्न तो मालूम पड़ रहा है न! ये प्रश्न भी प्रश्न नहीं है, ज्ञान है। अभी आपको ये ज्ञान तो है न कि ये प्रश्न महत्वपूर्ण है, तभी पूछ रहे हो, तब ये भी जान जाओगे कि ये भी महत्वपूर्ण नहीं है।

वास्तविक ज्ञान है समस्त ज्ञान की महत्वहीनता से परिचय।

सवाल तभी तो पूछा न जब पूछना ज़रूरी लगा। ये ज्ञान की बात है। ये ज़रूरी है। बोध है ज्ञान की अनिवार्यता से मुक्ति। ज्ञान फिर रहेगा, स्मृति के एक छोटे से कोष्ठ में बैठा रहेगा; अनिवार्य नहीं रहेगा, कूद-फांद नहीं करेगा, अपनेआप को आपके जीवन का केंद्र नहीं बना देगा।

प्र: और अगर वो अवस्था है तो कैसे पहचानूँ कि ये अवस्था आ गयी है?

आचार्य: आप पहचानते हमेशा ज्ञान का उपयोग ही करके हैं। आप जिसको पहचानना कहते हो, वो पहचान वगैरह कुछ नहीं है, मेल-मिलाप है। आप ऐसे पहचानते हैं, ये तस्वीर रखी है और फिर देखेंगे, कहेंगे (इशारे से मिलाते हुए), ‘तुम ही हो।’ तो पहचान भी ज्ञान है। ये संचित ज्ञान है, यहाँ बैठा हुआ है (सिर की तरफ इशारा करते हुए)। बाहर जो कुछ घट रहा है आप उसका इससे मिलान करते हैं और अगर मिलान दिखता है तो आप उसको वही नाम दे देते हैं जो इसका नाम है। ऐसा हमारा जीवन है।

आप कैसे जानते हो कोई आपसे प्रेम करता है? आपके मन में कुछ लक्षण बैठा दिये गये हैं प्रेम के — मीठा बोलेगा, मुस्कुराएगा, गुलाब का फूल देगा, मिठाई लेकर आएगा, चूमेगा-चाटेगा इत्यादि। अब ये सब यहाँ बैठे हुए हैं (दिमाग की तरफ इशारा करते हुए)। आपने इन सबको क्या नाम दिया है? प्रेम का। और बाहर आपको कोई मिले जो यही सब करना शुरू कर दे — गुलाबी शर्ट पहनकर आये, दूर से ही चुम्बन फेंक-फेंककर मारे, चलता-फिरता पेस्ट्री का विज्ञापन हो, इतना मीठा, तो आप तुरन्त कह दोगे, ‘ये रहा प्रेमी!’

ये आपने प्रेम को पहचाना है? ये पहचाना है आपने प्रेम को? पहचाना नहीं है। आपने क्या करा है — मिलान। आपने मिलान करा है। अच्छा, ये प्रेम होता है, वही तो सबकुछ ये कर रहा है तो ये प्रेम हो गया। अब ये प्रेम है।

हम जिसे पहचान कहते हैं वो ज्ञान होता है, तो इसीलिए पहचानना फिर बंद हो जाएगा। फिर भीतर से जो उठता है वो बहुत मौलिक होता है, वो प्रत्यभिज्ञा नहीं होती। हम जिसको पहचानना कहते हैं वो रिकॉग्निशन होता है। कि कॉग्निशन (संज्ञान) पहले ही था, अब क्या हुआ — *रिकॉग्निशन*। हम इसलिए कहते हैं न, ‘आइ रिकॉग्नाइज़ यू।’ (मैंने तुम्हें पहचान लिया।) आपने कोई उसे मौलिक तौर पर नहीं जाना है। आपने बस उसका मिलान कर दिया है।

फिर आप मौलिक तौर पर जानना शुरू करते हो। फिर आप उसे ऐसे देखते हो जैसे बिलकुल कोई बच्चा देखे किसी चीज़ को। फिर आपको कुछ ऐसा दिखायी देगा जो अन्यथा दिखायी ही नहीं पड़ता। और जब तक आप रिकॉग्नाइज़ कर रहे हो, जब तक प्रत्यभिज्ञा है, तब तक आपको कुछ नहीं दिखता। तब तक बस आप ढर्रे का ढर्रे से मिलान करते हो और ढर्रे को ढर्रे का नाम दे देते हो।

प्र: आचार्य जी, कोई तुलसीदास हैं, उस अवस्था में हैं, ये कैसे पहचानें?

आचार्य: तुलसीदास किसी अवस्था में नहीं होते। अवस्था तो उनकी तब थी जब साँप पकड़कर चढ़ रहे थे। सारी अवस्था पर पानी फिर गया। बीवी ऐसी थी कि उसने अवस्था साफ़ कर दी बिलकुल।

अवस्थाएँ जब साफ़ हो जाती हैं तब जो बचता है उसे आत्मा कहते हैं। सारी अवस्थाओं के साफ़ होने के बाद जो बचता है — निरभ्र, खाली, साफ़ आकाश। रातभर बारिश हो रही थी मूसलाधार, सुबह देखा तो बादल नहीं थे, सब छँट गया था, सिर्फ़ एक शून्यता थी, निरभ्रता थी, उसको कहते हैं आत्मा। उस आत्मा का नाम है तुलसीदास। तुलसीदास कुछ हैं थोड़े ही। तुलसीदास जो कुछ थे, उससे जब खाली हो गये तब जो बचा, उसे कहते हैं तुलसीदास।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya PrashantJOIN NOW
Categories
  • Trending
  • Bhagavad Gita
    Ashtavakra Gita
    Avadhut Gita
    Pingla Gita
    Paramhans Gita
    Ribhu Gita
    Uttar Gita
    Jivanmukt Gita
    Putra Gita
    Ajgar Gita
    Uddhav Gita
  • Relationship
    Sex
    Attachment
    Lust
    Depression and Anxiety
    Stress
    Fear
    Loneliness
    Overthinking
    Anger
    Money
    Happiness
    Desire
    Guilt
    Suffering
    Jealousy
    Confusion
    Motivation
  • Adhyatma Upanishad
    Kathopnishad
    Mundaka Upanishad
    Devi Upanishad
    Chhandogya Upanishad
    Ishavasya Upanishad
    Brihadaranyaka Upanishad
    Amritbindu Upanishad
    Kena Upanishad
    Niralamba Upanishad
    Sarvasara Upanishad
    Shewtashvtara Upanishad
    Narayana Upanishad
    Mandukya Upanishad
    Maitreya Upanishad
  • Veganism
  • Women Liberation
Search
Relationship
Related Topics
Clarity
Love
Relationship
India
Values
Bhakti
Maturity
Poems
Bhagat Singh
Enlightenment
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya PrashantJOIN NOW
Comments
Add Your Comment
Be the first one to add a comment :)
Related Topics
Clarity
Love
Relationship
India
Values
Bhakti
Maturity
Poems
Bhagat Singh
Enlightenment
Articles On Tulsidas
शक्की बनो, लंबा जियो || आचार्य प्रशांत (2020)
Suffering
शक्की बनो, लंबा जियो || आचार्य प्रशांत (2020)
3min
837reads
10

आचार्य प्रशांत: आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की जो आपसी नोंक-झोंक होती थी, बड़ी दिलचस्प थी — कि ज़िंदगी तुमको बड़ी चाहिए कि लंबी चाहिए। ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी चाहिए या लंबी चाहिए?’

लंबी चाहिए तो खूब नकारात्मकता से भरे रहो। जितना तुम शक्की रहोगे, प्रकृति ने संयोग…

हे प्रभु! रक्षा करना || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)
Truth
हे प्रभु! रक्षा करना || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)
24min
925reads
6
1
इनका भरोसा कैसे कर लिया? || आचार्य प्रशांत (2020)
Clarity
इनका भरोसा कैसे कर लिया? || आचार्य प्रशांत (2020)
21min
443reads
37
2

Articles On Love
जैसे तुम, वैसा तुम्हारा प्रेम
Love
जैसे तुम, वैसा तुम्हारा प्रेम
10min
3.9kreads
345

प्रश्नकर्ता: उच्चतम स्थान किसका है? क्या सत्य और ईश्वर एक हैं? जो उच्चतम है, उसके प्रति प्रार्थना का क्या अर्थ है? और दूसरा मुद्दा, दूसरा प्रश्न — रक्षा माने क्या?

आचार्य प्रशांत: हम जैसे होते हैं, रक्षा शब्द का तात्पर्य हमारे लिए वैसा ही होता है। और हम जैसे होते…

आचार्य प्रशांत:
वह प्रजापतियों की सृष्टि करके सब पर अपना आधिपत्य रखता है। जैसे सूरज अकेले ही सबको प्रकाशित करते हैं। प्रकाश के स्रोत दो नहीं, प्रकाश के दो नहीं स्रोत हैं, एक है। वैसे ही वह प्रकाश स्वरुप है और वर्णीय है। वर्णीय माने उसी को चुनना, उसी का
…
40

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

प्रेम हो और घाव न हो, क्या ये संभव है?
Love
प्रेम हो और घाव न हो, क्या ये संभव है?
12min
640reads
24
4

प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।

प्रेम होने दो, फिर साहस की ज़रूरत नहीं
Love
प्रेम होने दो, फिर साहस की ज़रूरत नहीं
9min
863reads
48
15

डर और जड़ता से बाहर निकलने का रास्ता किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सही कदम से शुरू होता है। अपनी समस्याओं का बार-बार विश्लेषण और वर्णन करने के बजाय उनसे दूर जाने का निर्णय आवश्यक है। सत्य के प्रति प्रेम जागने पर भय अपने-आप पीछे छूट जाता है और साहस जुटाना नहीं पड़ता। सही संगति, अनुकूल वातावरण और आत्मिक विकास के अवसरों को अपनाने से परिवर्तन सहज होने लगता है। अपनी कमजोरियों से मोह रखने के बजाय उनके प्रति वैराग्य विकसित करना ज़रूरी है। शिकायत, बहाने और आत्म-दया में उलझे रहने से कुछ नहीं बदलता; निर्णायक कर्म, सत्य के प्रति प्रेम और वर्तमान स्थिति के विरुद्ध विद्रोह ही ऊँचे जीवन की वास्तविक शुरुआत हैं.

Excerpts From Articles
प्रूफ नहीं है, तो मानें क्यों?
अंधविश्वास या किसी दावे को केवल किताबों, परंपराओं या बड़ी-बड़ी हस्तियों के कहने से नहीं मानना चाहिए। भौतिक जगत से जुड़े हर दावे के लिए प्रमाण माँगना आवश्यक है। जो बात जाँची-परखी जा सकती है, उसे तर्क, प्रयोग और उपकरणों से जाना जाए; बिना जाने नहीं माना जाए। सच्ची जिज्ञासा वही है जो हर दावे के सामने प्रश्नचिह्न रखे और प्रमाण मिलने पर ही स्वीकार करे।
Read Full Article
Stuck Between Job Security and Your Real Passion?
Struggling to choose between a secure job and the path you actually feel drawn to? This isn't really a question about careers. It's about why other people's opinions have so much power over you in the first place. Real clarity doesn't come from finding the 'right' choice. It comes from honestly looking at your own fear, again and again, until it stops running the decision for you.
Read Full Article
ज्योतिष कितना सच है? कुंडली, ग्रह-नक्षत्र: इनका क्या अर्थ है?
वेदांत को केवल इसलिए सही या श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता कि वह किसी विशेष परंपरा से आता है। विज्ञान जहाँ भौतिक जगत की वस्तुनिष्ठ जाँच करता है, वहीं अद्वैत वेदांत सीधे मनुष्य के ‘मैं’, उसके दुख, बंधन और मुक्ति की पड़ताल करता है। इसकी कसौटी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, बल्कि अपने जीवन में इसकी सच्चाई को देख पाना है। किसी दर्शन को मान लेना नहीं, बल्कि उससे स्वयं को मुक्त करना ही उसका वास्तविक उद्देश्य है।
Read Full Article
Climate Change: The Solution Is a Choice
Climate change is more than an environmental crisis—it is a crisis of human choices. Our patterns of consumption, consumerism and endless pursuit of more are putting increasing pressure on the planet. But meaningful change does not necessarily begin with new technology or stricter policies. It begins with a deeper question: what are we willing to change within ourselves?
Read Full Article
अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।
Read Full Article
Justice Without Boundaries: Why Compassion Cannot Stop at Species
Oppression should not see caste, gender, creed or colour, and it should not see species either. The moral threshold is sentience, not intelligence. An animal feels pain as fully as a human does, whether or not it can explain its suffering.
Read Full Article
रक्षाबंधन: वो रक्षा माँग रही है - ज़रा सुनिए
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।
Read Full Article
फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।
Read Full Article