सिर्फ़ तुम्हारी ईमानदारी से घबराती है माया || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2018)

प्रश्नकर्ता: इसके अध्ययन में शंकराचार्य का जब हम पूरा पढ़ते हैं तो उसमें एक बहुत डिफिकल्ट कान्सेप्ट (जटिल अवधारणा) आता है जिसको हम कहते हैं 'माया'। और ये माया ही अपनेआप में द्वैत और अद्वैत का एक तरीक़े से किसी-न-किसी रूप में अलग करने का माध्यम है। माया के कान्सेप्ट का मेरा अपना एक्स्प्लनैशन (स्पष्टीकरण) है। लेकिन मैं चाहूँगा आप विस्तार में कहें।
आचार्य प्रशांत: माया कान्सेप्ट नहीं है, माया हमारी रोज़मर्रा की हक़ीक़त है। और जब तक आप उसे कॉन्सेप्ट या सिद्धान्त कहेंगे वो आपको डिफिकल्ट ही लगेगी। सन्तों के पास जाइए तो वो कहते हैं,
माया माया सब कहे माया लखे न कोय। जो मन से न उतरे माया कहिए सोय।।
~ कबीर साहब
और कितनी सरल बात है, जो आपके दिमाग में चल रहा है उसी का नाम माया है। बताइए इसमें कठिन क्या है, डिफिकल्ट क्या है? जो भी कुछ मन में घर करके बैठ गया, जिस भी विषय में आप लगातार विचार करते रहते हैं वही मन का बोझ है। वही कबीर साहब की चक्की है, उसी का नाम माया है। कुछ उसमें कठिन नहीं।
हाँ, जब आप उसे अपने जीवन से दूर करके देखते हैं, उसे सिद्धान्त भर बना देते हैं, किताबी बात बना देते हैं तो हो सकता है कि वो कठिन लगे। चले थे मन्दिर की ओर, मुड़ गये मैख़ाना की ओर, यही माया है। इसमें क्या कठिन है? यह तो रोज़ की बात है। बैठे हैं सत्संग में लेकिन मन में घूम रहा है व्यापार, यही तो माया है। रोज़ की बात है, इसमें कठिन क्या है? अध्यात्म गूढ़ सिद्धान्तों का नाम नहीं है। अध्यात्म का अर्थ है अपनी रोज़मर्रा की बेचैनी को स्वीकार करना ईमानदारी से और फिर उसको शान्ति की ओर ले जाना। सरल, अति सरल है।









