धर्म के केंद्र में करुणा बैठी है। यह सही हो ही नहीं सकता कि धर्म के नाम पर जानवर की बलि दी जाए। बात यह है कि आदमी भी बहुत हद तक पशु ही है। आपकी बेहतरी के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा आपके भीतर का जानवर है। उस भीतर के जानवर की कुर्बानी देनी होती है। बाहर के जानवर को मारकर और उसका माँस खाकर आप भीतर के जानवर को ही और बलवान बना रहे हो। जबकि बकरीद की कहानी का मर्म है — “चेतना के ऊँचे उद्देश्यों के लिए अपने भीतर की पाशविकता को पीछे छोड़ो।”
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प्रश्नकर्ता: बकरीद आ रही है, और मैं उन संस्थाओं का समर्थन करता हूँ जो कि पी.सी.ए. ऐक्ट(अधिनियम) है, प्रीवेंशन ऑफ क्रुएलटी टुवर्ड्स एनिमल्स(पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम 1960), उसके सेक्शन अट्ठाईस को हटाने की माँग कर रहे हैं।
उसका जो सेक्शन अट्ठाईस है वो कहता है कि किसी भी धार्मिक काम के लिए किसी भी पशु की, किसी भी तरीके से हत्या की जा सकती है, बलि दी जा सकती है, कुर्बानी दी जा सकती है। तो बहुत लोग और बहुत संस्थाएँ ये माँग कर रहे हैं कि ये जो सेक्शन अट्ठाईस है पी.सी.ए ऐक्ट का, इसको हटा दिया जाए, और अभी क्योंकि बकरीद सामने है तो इसलिए ये माँगें और ज़ोर पकड़ रही हैं। हालाँकि इस अधिनियम का संबंध किसी विशेष समुदाय, वर्ग या धर्म या मज़हब से नहीं है, तो फिर आप इसपर कुछ बोलते क्यों नहीं हैं? आप समर्थन क्यों नहीं दे रहे हैं कि, 'हाँ, ये जो सेक्शन अट्ठाईस है, इसको हटाया जाए?'
आचार्य प्रशांत: मैं आता हूँ उसपर। पहले कुछ आँकड़े हैं जो आप सबके सामने रखने ज़रूरी हैं। भारत में प्रतिवर्ष अस्सी लाख टन पशुओं का माँस तैयार किया जा रहा है, 1960 में ये दस लाख टन था। 1960 में भारत की आबादी पैंतालीस करोड़ थी, अभी एक सौ चालीस करोड़ है। आबादी बढ़ी है तीन गुना, और माँस का आहार बढ़ गया है आठ गुना, और खासतौर पर पिछले पंद्रह सालों में माँस के सेवन में ज़बरदस्त वृद्धि हुई है। भारत-भारत में लगभग पच्चीस करोड़ मुर्गे प्रतिवर्ष मारे जाते हैं, पंद्रह करोड़ बकरे मारे जाते हैं, और चालीस लाख करीब भैंस-भैंसे, इन सब की हत्या होती है। ये भारत के आँकड़े बता रहा हूँ, क्योंकि आप जिस अधिनियम की बात कर रहे हैं वो भारत का है।




