सीमाओं की बात क्या, हमें असीम से मतलब || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

“हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध।हद बेहद दोनों तजे, ताका मता अगाध”।।~ संत कबीर
वक्ता: आदमी का जीवन लगातार सीमाओं में बीतता है, वर्जनाओं में बीतता है, नियम-कानून से बंधे-बंधे बीतता है। कम ही लोग होते हैं जो यह हिम्मत जुटा पाएं कि इन वर्जनाओं को तोड़ देंगे। कम ही लोग होते हैं जिनमें साहस हो कि नियमों से बंधे हुए नहीं रहेंगे। कोई ही होता है जो कहता है कि तुम्हारी रूढ़ियाँ, तुम्हारे ढर्रे, तुम्हारे कायदे मेरे लिए नहीं हैं।
आम आदमी का जीवन तो वही है जो कबीर कह रहे हैं ‘हद चले सो मानवा’ – हदों में बंधा हुआ, घेरों में कैद एक काराग्रेह है आम आदमी का जीवन। चारों तरफ मात्र मानसिक घेरे ही घेरे हैं। इंट-पत्थर की दीवार होती है उसे तोड़ना आसान होता है पर मानसिक घेरों के पार जाना बड़ा मुश्किल है, बहुत-बहुत मुश्किल है, और हम सब अपनी-अपनी मानसिक जेलों में कैद हैं।
पशुओं के साथ प्रयोग हुए हैं: जहाँ पर बारूद की एक रेखा खींच दी गई और जानवर जैसे ही उसे पार करने लगा उस रेखा में आग लगा दी गई। जानवर तिलमिला के पीछे हट गया उस रेखा से। थोड़ी देर बाद जानवर फिर उस रेखा को पार करने लगा, फिर उसमें आग लगा दी गई और जानवर फिर पीछे हटा। कुछ समय बाद स्तिथि यह आ जाती है कि आप वहां बारूद रखो न रखो जानवर कभी उस रेखा को पार करता ही नहीं है। अब वो एक मानसिक रेखा है और उसमें बड़ी ताकत है। वो कभी पार की ही नहीं जाएगी। ऐसे ही कैद हैं हम सब। मन से बड़ा काराग्रह हो नहीं सकता।
फिर कोई होता है हजारों में एक जो उकता करके इन हदों से विद्रोह कर देता है बल्कि तोड़ ही डालता है हदों को, धज्जियाँ उड़ा देता है सारे नियम-कानूनों की। वो कहता है कि, ‘मैं तुम्हारे ढर्रों का मोहताज नहीं; वो साधू है। उसका अपना एक कायदा है, उसके अपने तरीके हैं जो समाज के तरीकों से बिलकुल विपरीत हैं। लेकिन एक बड़ी मजेदार चीज़ देखने में आती है कि समाज साधू का दुश्मन नहीं होता हालांकि साधू ने समाज के ढर्रे तोड़े हैं। समाज साधू को अपने-आप में शामिल कर लेता है।






