चेतना को मिटाने या दबाने के प्रयास को हिंसा कहते हैं। चेतना को समर्थन और सम्मान देना ही अहिंसा है। दैत्य स्वयं तो अचेत है ही, ये चैतन्य जीव की चेतना पर आक्रमण के लिए भी आतुर है, तो अब देवी क्या करें? अगर चेतना को बचाना है तो सबसे पहले उसका वध करना पड़ेगा जो चेतना के विरुद्ध खड़ा है। हिंसा हुई या नहीं हुई, यह इससे नहीं नापा जा सकता कि खून बहा कि नहीं बहा, बल्कि इससे नापना होगा कि आपका मन चेतना के साथ है या चेतना के ख़िलाफ़ है।
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आचार्य प्रशांत: "जहाँ वह घोर संग्राम हुआ था वहाँ की धरती देवी के गिराए हुए रथ, हाथी, घोड़े और असुरों की लाशों से ऐसी पट गई कि वहाँ चलना-फिरना असंभव हो गया। दैत्यों की सेना में हाथी, घोड़े और असुरों के शरीरों से इतनी अधिक मात्रा में रक्तपात हुआ कि थोड़ी ही देर में वहाँ ख़ून की बड़ी-बड़ी नदियाँ बहने लगीं। जगदम्बा ने असुरों की विशाल सेना को क्षण भर में नष्ट कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे तृण और काठ के भारी ढेर को आग कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है। और वह सिंह भी गर्दन के बालों को हिला-हिला कर ज़ोर-ज़ोर से गर्जना करता हुआ दैत्यों के शरीरों से उनके प्राण चुने लेता था।"
स्पष्ट ही है कि कोई बात संकेत के रूप में कहने की कोशिश की जा रही है, उसको समझना होगा। ये ग्रंथ का बड़ा अनादर और दुरुपयोग है यदि आप इन घटनाओं को तथ्य के तल पर प्रामाणिक मान लें। और ग्रंथकार ने चेष्टा भी नहीं करी है बात को रंचमात्र भी प्रामाणिक रखने की। साठ करोड़ की सेना, पाँच हज़ार वर्ष तक युद्ध, फिर एक करोड़ रथी आ गए, फिर श्वास से सैनिक पैदा हो गए। ग्रंथकार की कोई इच्छा भी नहीं है कि आप मानें कि ऐसा वास्तव में हुआ, उस तरह से हुआ जैसा हम प्रतिदिन अपने सामने संसार में होता देखते हैं। नहीं, ये वो नहीं है।
ये वैसी घटनाएँ नहीं हैं जो प्रतिदिन आपके सामने संसार में होती हैं; ये वो घटनाएँ हैं जो प्रतिदिन आपके भीतर के संसार में होती हैं। इन घटनाओं को इतिहास मत समझ लीजिएगा। कोई युग, कोई काल, कोई कल्प ऐसा नहीं था जब ये घटनाएँ आपकी आँखों के सामने घटी हों। लेकिन कोई युग, कोई काल, कोई कल्प, कोई क्षण ऐसा नहीं है जब ये घटनाएँ आपकी आँखों के पीछे न घट रही हों। ये निरंतर घटने वाली घटनाएँ हैं हमारे अंतरलोक में। समझ में आ रही है बात?



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