रक्षा का अधिकारी वही होता है, जो दुर्बल हो। आज सबसे अधिक रक्षा की ज़रूरत पृथ्वी को है — जहाँ सैकड़ों प्रजातियाँ रोज़ विलुप्त हो रही हैं। स्त्री-पुरुष, भाई-बहन, सभी को यह संकल्प लेना होगा कि जो भी सच्चा है पर कमज़ोर पड़ रहा है, उसकी रक्षा करेंगे। यही रक्षाबंधन के प्रति हमारा सच्चा सम्मान होगा और सिर्फ़ इसी तरीके से हम इस पर्व को अमर और प्रासंगिक बना सकते हैं।
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प्रश्नकर्ता: सर, मैंने आपका संदेश पढ़ा कि रक्षाबंधन को नए और ऊँचे अर्थ दो। मैं अपने घर की एकमात्र कमाने वाली सदस्या हूँ। मेरे पिता और दोनों छोटे भाई हर तरह से मुझ पर निर्भर हैं। आज बहुत सी महिलाएँ ऐसी हैं, जिन्हें पुरुषों से किसी तरह की सुरक्षा की कोई ज़रूरत नहीं, बल्कि जो स्वयं पुरुषों को सुरक्षा दे रही हैं। तो मैं जानना चाहती हूँ कि राखी के नए और ऊँचे अर्थ क्या हो सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: रोहिणी जी, ऐतिहासिक दृष्टि से रक्षाबंधन बहन और भाई के बीच का ही पर्व रहा भी नहीं है। भविष्यपुराण हैं, स्कन्दपुराण हैं, पद्मपुराण हैं और भागवतपुराण है इनमें ऐसे उल्लेख मिलते हैं, जहाँ पर एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को रक्षा बाँधी, राखी बाँधी। और सिर्फ़ धागा, रक्षा का बंधन। और जहाँ वो उल्लेख मिलते हैं, उनमें ज़रूरी नहीं है कि उन दो व्यक्तियों में एक व्यक्ति स्त्री है और दूसरा पुरुष है।
जैसे भविष्य पुराण है। अब उसमें कुछ ऐसा उल्लेख आता है कि देव-दानव युद्ध चल रहा है और इंद्र, देव गुरु बृहस्पति के पास जाते हैं । इंद्र हार रहे होते हैं। तो सहायता के लिए, मार्गदर्शन के लिए जाते हैं। इंद्राणी भी साथ हैं। तो इंद्राणी एक रक्षा तैयार करती हैं, एक तरह की राखी। और उस राखी को फिर बृहस्पति, इंद्र को बाँध देते हैं। बृहस्पति, इंद्र को बाँध रहे हैं।




