मैं देख रहा था, सब समझ रहा था, और जानते-बूझते धोखा खा रहा था || आचार्य प्रशांत (2023)

आचार्य प्रशांत: अर्जुन असमंजस में हैं। कृष्ण बात को इतना सरल, इतना सीधा करके बता देते हैं कि अर्जुन को लग रहा है कि सही जीवन, सही निर्णय, सही कर्म ये सब तो बहुत सहज, साधारण बात होनी चाहिए। अर्जुन कह रहे हैं कि बात अगर इतनी सीधी है तो फिर कोई भी व्यक्ति बहक कैसे जाता है? ये सदा का खेल रहा है।
ज्ञानियों का काम है उलझे हुए मुद्दों को भी सुलझाकर सामने रख देना।
“मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे।।”
और साधारण मन के लिए जो मुद्दा अधिक-से-अधिक उलझा हुआ भी रहता है; वो ज्ञानी के हाथों में पड़कर के बिलकुल खुले निरभ्र आकाश की तरह साफ़ हो जाता है। लगता है इसमें तो कोई जटिलता हो नहीं सकती, अरे! इतनी सीधी सी तो बात थी।
पर बात उतनी सीधी अगर वास्तव में होती आपके लिए, तो कभी उलझी भी न होती आपके लिए। बात तो न सरल है न जटिल, निर्भर इस पर करता है कि वो बात है किसके लिए। ये हम भूल जाया करते हैं। हम सदा वस्तुगत सत्य खोजते हैं। तो बात एक बाहरी वस्तु है न?
हम पूछा करते हैं कि बात कठिन है कि सरल है। और वेदान्त आपको लेकर के जाता है आपमें। वेदान्त कहता है, ‘कौन सी बात, कहाँ है बात, बात दिखाओ, कोई बात नहीं है; तुम हो। तुम हो और दुनिया तुम्हारा प्रतिबिम्ब है, और तुम ही टेढ़े-टपरे हो तो तुम्हारे लिए हर बात टेढ़ी होगी।
और तुममें सिधाई आ जाए तो सब बातें तुम्हारे लिए सीधी हो जाएँगी। तुम्हीं भीतर से उलझे हुए और धुँधले हो तो तुम्हारे लिए पूरा जगत कोहरे जैसा होगा, और उलझन भरा। और तुम्हारे भीतर सुलझाव हो जाए तो कोई बात नहीं जगत की जो तुम्हारे लिए अब समस्या रहे; एकदम आर-पार देख लोगे।









