नवरात्रि में हम माँ की स्तुति करते हैं, पर दुर्गा सप्तशती कहती है कि माँ ही बंधन है, माँ ही मोक्ष है। माँ माने समय, परिस्थितियाँ, शरीर, समाज, वह सब कुछ जिससे हम जुड़े हैं। जीवन में कुछ गड़बड़ होती है तो हम परिस्थितियों को दोष देते हैं, और जो प्रकृति को दोष देता रहेगा, वह उससे कभी मुक्त नहीं हो पाएगा। अपनी भूल देखना और दोष प्रकृति पर न डालना ही स्तुति है, यही आत्मज्ञान है। क्या इस नवरात्रि हम माँ को अपने भीतर देख सकते हैं?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: दो जने हैं। उनकी कहानी है। अब इनको सुनो। दो जनों में पहले हैं एक राजा, राजा सुरथ। जैसे राजा अपने क्षेत्र में एक अग्रणी राजा थे, वैसे ही जो व्यापारी है तो वह होता है एक समाधि नाम का व्यापारी, वैश्य। यह तगड़ा सेठ होता है अपने समय का। राजा सुरथ का ऐसा है कि उन पर बाहर से आक्रमण हो जाता है। व्यापारी है, व्यापार में घाटा होने लग गया पिछले कुछ समय से। तो दोनों मेधा मुनि के सामने बैठ जाते हैं। मुनि पूछते हैं, “बात क्या है?” दोनों ने पूछा कि हम सब जानते हैं फिर भी हम क्यों मोह से ग्रस्त हैं और दुख भोग रहे हैं? तो ऋषि उन्हें किस तरफ़ को ले जा रहे हैं? तो यहाँ से महामाया की कथा की शुरुआत होती है। समझना चाहते हो कि तुम्हारे साथ अगर क्या हो रहा है तो उसको समझने का तरीका है प्रतीकों से भरी हुई एक कथा। यह समझाने के लिए ऋषि कहते हैं, “एक बार भगवान विष्णु सो रहे थे तो उनकी देह से दो असुर पैदा हो गए।” सारी जो समस्या थी वह किसने पैदा करी? और फिर समस्या सुलझाई भी किसने? माँ ने। तो सप्तशती कहती है, माँ ही बंधन है, माँ ही मोक्ष है। यह बताने के लिए यह पूरा वृत्तांत कहा गया है।
चलिए अब ज़रा माता से कुछ बात कर लीजिए।
तो सप्तशती। अब यह मुझे बहुत-बहुत, बहुत प्यारी रही है। सबसे पहले आज से दो साल पहले हुआ था। तो ऋषिकेश में थे और तब पूरी सप्तशती पर एक-एक श्लोक लेकर के पूरा भाष्य तैयार किया था। तो रुचि इसमें पहले से थी और जो पूरा काम था वह सितंबर 2021 में हुआ था। एक महीने के अंदर-अंदर ही हुआ था। सप्तशती है। कुछ 700 के आँकड़े में विशेष है। जो दो ग्रंथ मुझे प्रिय हैं, दोनों में 700। कौन से? भगवदगीता, दुर्गा सप्तशती, दोनों में सात-सात सौ है। ठीक है।




