प्रश्नकर्ता: उपनिषद् भी कहते हैं “एकोहम् बहुष्यामि”
तो क्या ये जो कल्पना होती है, वो ईश्वर के मन में होती है? कि, "मैं एक हूँ और बहुत हो जाऊँ?"
आचार्य प्रशांत: ये उसके मन में होती है जिसे बहुत दिख रहे हैं और जिसे एक दिख रहा है। ईश्वर न बहुत है न एक है। जब हम कहते हैं कि ईश्वर कह रहा है, "हूँ एक, बहुत हो जाऊँ”, तो हमने पहले ही गिनतियों की दुनिया में प्रवेश कर लिया है – एक और बहुत; ये संख्याएँ हैं, ये गिनतियाँ हैं। ये गिनतियाँ कहाँ हैं? कहने वाले के मन में। तो ये वही बोल सकता है, जो पहले ही गिनतियों की दुनिया में आ चुका है।
गिनतियों की दुनिया में आया हुआ मन, उसके विषय में कल्पना करने की कोशिश कर रहा है, जो संख्यातीत है। ये जो अभी आपने वक्तव्य बोला, ये कुछ भी नहीं है, मात्र कल्पना है - मन की, मनातीत के बारे में। चाहे ‘कुन-फ़ाया-कुन’ हो, चाहे तैत्रिय उपनिषद् का २.६, चाहे बाइबिल का वक्तव्य कि लेट देअर बी लाइट (प्रकाश हो!) ये क्या सत्य है? ये जो वक्तव्य है कि- “उसने कहा कि मैं कई हो जाऊँ और वो हो गया है” ये वक्तव्य क्या सत्य है? क्या 'सत्य' आकर के इसकी उद्घोषणा कर रहा है? कि मैंने कहा कि मैं कई हो जाऊँ’?
ये कौन कह रहा है?
ये हमारे-आपके जैसे लोग कह रहे हैं। हम अपने सीमित मन का प्रयोग करके किसी प्रकार असीम को जानने की चेष्टा कर रहे हैं। सत्य नहीं कहने आता कि, "एक हूँ, कई हो जाऊँ," न उसके पास भाषा है या यूँ कहिए कि उसको भाषा की आवश्यकता नहीं है और न उसके पास गिनती है या यूँ कहिए कि उसको गिनती की आवश्यकता ही नहीं है। ये तो हमारी भाषा है, हमारी कल्पना है।






