गॉसिप - व्यर्थ चर्चा- मेरे जीवन का हिस्सा क्यों? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी सत्र शुरू होने से पहले हम सभी लोग मन्त्रणा कर रहे थे। एक सज्जन ने यह सवाल उठाया कि हम लोग एच.आई. डी. पी. के छात्र हैं, तो हम ये सब क्यों कर रहे हैं, मतलब बातें वगैरह। जवाब देते हुए मैंने कहा, “‘क्योंकि ये भी जीवन का एक अंग है। जैसे और चीज़ें होती हैं, आदमी शादी करता है, परिवार बनाता है, परिवार के साथ रहता है, बहुत सारी चीज़ें हैं जो वो कर रहा है क्योंकि वो भी जीवन का अंग होती हैं, ऐसे ही ये भी ज़िन्दगी का हिस्सा है।” मेरे इस उत्तर पर खूब तालियाँ बजीं।
तो आचार्य जी, मेरे दिमाग में यहाँ पर दो सवाल उठ रहे हैं।
पहला सवाल ये है – एच.आई. डी. पी. के बाद भी हम लोग ऐसी बातें क्यों करते हैं? क्या ये नहीं होना चाहिए? और दूसरा सवाल ये है – जो मैंने बात कही कि ये चीज़ें पार्ट ऑफ़ लाइफ़ (जीवन का अंग) हैं, तो उसे मद्देनज़र रखते हुए इन्हें 'चीप' (ओछा) क्यों कहा जाता है? ‘*चीपनेस*’(ओछापन) की परिभाषा क्या होगी?
आचार्य प्रशांत: अच्छा सवाल है।
दो मुद्दे।
पहला – इतनी एच.आई. डी. पी. कर लो, कुछ भी कर लो, उसके बाद भी ऐसा सब क्यों होता है? और दूसरा – क्या ये पार्ट ऑफ़ लाइफ़ (जीवन का अंग) है? और अगर ये है तो इसको बुरा ठहराने का कोई औचित्य है क्या?
समझते हैं।



