तुमसे विलग जो होएँगे, प्राण उसी पल खोएँगे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

अधिक सनेही माछरी, दूजा अलप सनेह । जब ही जल ते बीछुरै, तब ही त्यागे देह ।।
आचार्य प्रशांत: पानी क्या है? समुद्र क्या है? वो, जो मछली के बाहर भी है, मछली के भीतर भी है; वो, जो मछली से पहले भी था, मछली के बाद भी रहेगा; वो, जिसमें मछली का जन्म भी है, जीवन भी है, और अंततः मृत्यु भी है–वो समुद्र कहलाता है। समुद्र वो है जिसमें मछली को आना है, जाना है, और फिर पुनः आना है। समुद्र मछली का होना है। मछली से अलग वो कुछ है ही नहीं। मछली को समुद्र की एक बूँद कहना भी ग़लत नहीं होगा। और कभी कबीर कहते हैं कि 'बुंद समानी समुंद में', और कभी कहते हैं, 'समुंद समाना बुंद में'; दोनों अभिन्न हैं, उनमें कहीं पर कोई रेखा खींची जा नहीं सकती।
ये अभिन्नता अस्तित्व में सबको मिली हुई है कि अलग कभी नहीं कर पाओगे हमें हमारे स्वभाव से, अलग कभी नहीं कर पाओगे हमें हमारे समुद्र से। आप पेड़ को उसके स्वभाव से चित नहीं कर सकते, आप मछली को उसके सागर से जुदा नहीं कर सकते। आदमी अकेला ही है, जिसे उसके सागर से अलग कर दिया गया है और फिर भी वो जिए जा रहा है। तो जब कह रहे हैं कबीर कि 'अधिक सनेही माछरी, दूजा अलप सनेह' तो इसमें दूजा और कोई नहीं है, मनुष्य ही है।
मनुष्य ही है जिसने प्रेम नहीं जाना है, जिसमें अल्पता है। जो अपने स्वभाव से विलग हो करके भी जी जाता है, मर ही नहीं जाता। मछली एक क्षण नहीं जिएगी, मछली को समु्द्र से अलग कर दो, मछली एक क्षण नहीं जिएगी। और हमारे भीतर का समुद्र, हमारे भीतर का रस, कब का सूख चुका है, हम जिए जाते हैं। मर कब के चुके हैं, लाशें चली जाती हैं, चली जाती हैं। मृत्यु कब की हो गई पर चले जा रहे हैं। कबीर ने ही अन्यत्र कहा है कि-
“बिरह भुवंगम तन बसै, मन्त्र न लागै कोई। राम बियोगी ना जीवै, जीवै तो बौरा होई।।”






