तुम्हें ज़िन्दगी की पहचान होती तो ऐसे होते तुम? || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

मोहे मरने का चाव है, मरूं तो हरि के द्वार। मत हरि पूछे को है, परा हमारे बार॥ ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: मोहे मरने का चाव, मरूं तो हरि के द्वार
“धार्मिक हूँ, आध्यात्मिक हूँ, समझ गया हूँ कि, समर्पण के सिवा कोई रास्ता नहीं है। समझ गया हूँ कि जिसको मैं अपना होना कहता हूँ वही सारे दुखों का कारण है तो इसलिए मरना चाहता हूँ”, मरने का अर्थ है—पूर्ण विराम, ख़त्म होना, किसका ख़त्म होना? दुःख का ख़त्म होना।
"मोहे मरने का चाव, मरूं तो हरि के द्वार।"
और हरि के द्वार पर ही स्वयं को विसर्जित करना चाहता हूँ, लेकिन जो दूसरी पंक्ति है वो बात को कुछ उलझा देती है—
"मत हरि पूछे को है, परा हमारे बार।"
पर हरि हैं कि ध्यान ही नहीं दे रहें हैं कि, ये कौन है जो इतनी कशिश से, इतनी श्रद्धा से आया है अपने आप को समर्पित कर देने के लिए, अपनी आहुति चढ़ा देने के लिए।
ऐसा होना ही है।





