
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्कार।
आचार्य प्रशांत: नमस्कार।
प्रश्नकर्ता: ऑन बिहाफ़ ऑफ़ एवरी ऑडियंस सिटिंग ओवर हियर, फ्रॉम प्रार्थना टीवी एंड ओसा टेलीविज़न, हमें खेद है कि आप इन पर्सन इस मंच पर हमें नहीं मिले। बट एनीवे, हम आपके साथ जुड़ गए हैं।
आचार्य प्रशांत: *आई वॉन्टेड टू कम देयर। देयर वर प्रिपरेशंस बीइंग मेड। आई वॉन्टेड टू कम, एंड नॉट ओनली दिस इवेंट, देयर वर अ कपल ऑफ़ मोर इवेंट्स शेड्यूल्ड एट भुवनेश्वर। बट द कंडीशंस हियर जस्ट डिडन्ट अलाउ मी। सो जस्ट अ फ़्यू डेज़ बिफ़ोर द डिपार्चर, द प्लैन्स हैड टू बी चेंज्ड। सो आई रियली वॉन्टेड टू बी देयर, बट आई एम ग्लैड आई एम इंटरेक्टिंग विथ द ऑडियंस ऑन द स्क्रीन। एंड थैंक यू फ़ॉर इनवाइटिंग मी।**
प्रश्नकर्ता: मेरे पास आपकी किताब है, आचार्य जी। मैं ये किताब से पहले, “अद्वैत डेली लाइफ़" पढ़ चुका था। देन कैन यू से दैट इट इज़ अ मॉडर्न गीता ऑफ़ नाउअडेज़? क्योंकि यहाँ जितने भी लोग आए थे, सबके हाथ में यह किताब थी।
आचार्य प्रशांत: नहीं, देखिए, श्रीमद्भगवद्गीता तो एक ही है और अनूठी है। तो ये धृष्टता तो मैं नहीं करूँगा कि भगवद्गीता के सम्मुख इस किताब को रखूँ, या किसी भी और किताब को रखूँ। लेकिन हाँ, भगवद्गीता, वेदांत, अद्वैत दर्शन, और जितने भी प्राचीन से लेकर आधुनिक दर्शन हैं, वो आज के इंसान को क्या संदेश देते हैं और आज के मनुष्य के लिए कैसे उपयोगी हो सकते हैं, वह रस मैंने इस किताब में निचोड़ना चाहा है।
तो इस किताब का संदर्भ अलग है, काल अलग है, आयाम अलग है, और कोशिश मेरी यह रही है कि इसमें जो सब प्रकरण हैं, अध्याय हैं, चैप्टर्स, छोटे, संक्षिप्त रखा जाए, ताकि आज हम जैसे हैं, जैसा हमारा मन है, ध्यान देने की हमारी जो क्षमता है, जो अटेंशन स्पैन है, जो आज की हमारी समस्याएँ हैं, उनको यह किताब संबोधित कर सके।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद। मैं बात आगे बढ़ाने से पहले आपको बधाई देता हूँ कि 60 मिलियन से ज़्यादा सब्सक्रिप्शंस आपके फ़ॉलोअर्स आज क्रॉस कर चुके हैं। वी कैन हैव अ क्लैप फ़ॉर आवर गेस्ट। द ओनली फ़िलॉसफ़र एग्ज़िस्टिंग इन आवर कंट्री। देयर इज़ सो मेनी फ़ॉलोअर्स फ़ॉर हिम, एंड वी आर ग्लैड टू सी इट इन द एग्ज़िस्टिंग। द मिलियंस ऑफ़ यूथ आर ट्रैकिंग यू, लिसनिंग टू यू, डेकोरेटिंग योर वर्ड्स, कोटिंग योर कोटेशंस। सो कहीं-न-कहीं ऐसा लगता है कि यूथ लिसन आचार्य प्रशांत।
अब मेरा सवाल यह रहा। यह मेरा पर्सनल सवाल है कि ऑन एट सेंचुरी, शंकराचार्य ने बड़ा उद्घोषक होकर बात किया कि "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, अहं ब्रह्मास्मि।" एंड हम दस साल पहले एक धारावाहिक प्रिपेयर किए थे ऑन श्री शंकराचार्य इन आवर जीसी चैनल। सो तभी मुझे थोड़ा सौभाग्य मिला था कि उनका जो अद्वैत का लाइन्स है, थोड़ा समझने के लिए।
और यह जो किताब है, यह भी आपने यहाँ लिख रखा है कि *"दिस बुक इज़ फ़ॉर दोज़ टायर्ड ऑफ़ स्वीट लाइज़।" वी आर फ़ैब्रिकेटिंग लाइज़, वी आर डेकोरेटिंग लाइज़, वी आर टॉकिंग अबाउट लाइज़।*ये सब कुछ अगर झूठ है, इल्ल्यूज़न है, तो हम लोग सब जो यहाँ बैठे हुए हैं, हर किसी के लिए टारगेट का सवाल है, रेवेन्यू का सवाल है, करियर का सवाल है, फ़ैमिली का सवाल है। सो ये सारी चीज़ों को अगर हम इल्ल्यूज़न समझ लें, तो उसका 100% ओनरशिप हम नहीं कर पाएँगे। इफ़ यू डोंट ओन 100% ऑफ़ एनीथिंग, देन इट विल टैपर द प्रोडक्टिविटी, एंड फ़ाइनली वी मे लैंड ऑन अ फ़ेल्यर। हम इसको अगर इल्ल्यूज़न सोचें या झूठ सोच लें, व्हाट अबाउट द प्रोडक्टिविटी, आपकी नज़र से?
आचार्य प्रशांत: आपने दो-तीन बातें बोलीं, इल्ल्यूज़न, प्रोडक्टिविटी और मोटिवेशन। देखिए, अद्वैत यह नहीं कहता कि प्रथमतया, मूलतः जगत झूठ है। कारण सीधा है कि जगत का तो जो दृष्टा है, वो अहंकार ही है न। जगत का दृष्टा तो अहंकार है। तो हम ऐसे हैं कि हमें जो कुछ दिखाई देता है, हम उसमें अपने स्वार्थानुसार कुछ अर्थ भर देते हैं। इसलिए यह सब कुछ झूठा हो जाता है। यह नहीं कहा जा रहा है कि आप तो सत्य हो और आपके चारों ओर जो जगत है, वह झूठा है। वास्तव में जगत तो आपके ही लिए है। जगत आपके ही संदर्भ में है। तो अगर आदि शंकर कहते हैं कि यह जगत ही मिथ्या है, तो उससे आशय बिल्कुल स्पष्ट है। उन्होंने यह नहीं कहा कि जगत की दो-चार वस्तुएँ मिथ्या हैं, उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा। वह कह रहे हैं कि समूचा जगत ही मिथ्या है।
समूचा जगत किसके लिए मिथ्या हो सकता है? समूचा जगत अगर किसी को लाल दिख रहा है, तो इससे हमें क्या जगत के बारे में कुछ पता चलता है? अगर कोई भी बात जगत के एक-दो विषयों के बारे में नहीं, अपितु समस्त जगत के बारे में ही कही जा रही है, तो इससे हमें जगत के बारे में कुछ भी पता नहीं चलता।
अगर मैं कहूँ, अभी मैं देख रहा हूँ अपनी स्क्रीन पर, मैं कहूँ कि आपने काले रंग का कुछ परिधान पहन रखा है, ठीक है? और मैं कहूँ कि आपके पीछे जो सज्जन बैठे हैं, उन्होंने सफ़ेद रंग की शर्ट पहन रखी है, तब तो ठीक है। इससे पता चलता है कि भाई, वहाँ क्या चल रहा है, स्क्रीन पर क्या चल रहा है। लेकिन अगर मैं कहूँ कि स्क्रीन पर जितने हैं, सब काले हैं या सब सफ़ेद हैं, और इसी स्क्रीन पर नहीं, जिस दिशा में जितनी स्क्रीनें हैं, उन पर जो भी कोई है, सब काले ही काले हैं, तो इससे स्क्रीन पर जो भी लोग हैं, उनके बारे में कुछ भी पता नहीं चलता। इससे बस यह पता चलता है कि मेरी आँख में कुछ समस्या है।
तो आदि शंकर का जो वचन है, वह समस्त जगत, पूरे ब्रह्मांड के बारे में है, और पूरे ब्रह्मांड को ही मिथ्या कह रहे हैं। तो इससे पता चलता है कि वह ब्रह्मांड के बारे में बात ही नहीं कर रहे हैं। अगर किसी को सब कुछ काला या सब कुछ लाल दिखाई देता हो, तो जो दिखाई दे रहा है, उसके बारे में कोई बात नहीं कही जा रही। फिर तो बात देखने वाले के बारे में कही जा रही है। अगर समस्त ब्रह्मांड ही मिथ्या है, जगत ही मिथ्या है, तो जो जगत का अनुभोक्ता है, फिर उसमें कुछ खोट है। उसमें कुछ गड़बड़ है। तो बात अहंकार के बारे में की जा रही है। यह जो मैं है, ये जो दृष्टा है, जो अनुभोक्ता है, ये जो ज्ञाता है, इसके बारे में बात की जा रही है।
तो यह हम सोच लेते हैं, और यह कोई बहुत सटीक अर्थ नहीं हुआ, कि जैसे कहा जा रहा हो कि दुनिया में कुछ मायावी है, कि जैसे जगत इल्ल्यूज़री है। नहीं, नहीं, नहीं। अहंकार इल्ल्यूज़री है। और इसीलिए उसने अपने चारों ओर जो कुछ भी रच रखा है, और जो कुछ भी वो कहता है कि है, अस्तित्वमान है, वो सब झूठा होता है।
अब आप बताइए, आप अपने जगत के केंद्र में हैं, और मैं भी अपने जगत के केंद्र में हूँ। और अभी जितने लोग दिखाई दे रहे हैं, सब पीछे, सब लोग भी अपने जगत के केंद्र में हैं। हम सब अपने-अपने जगत के केंद्र में होते हैं। और क्योंकि हम अपने जगत के केंद्र में होते हैं, तो इसीलिए हमने अपने चारों ओर जो कुछ भी खड़ा कर रखा है, हमें उसका सत्य नहीं पता होता, क्योंकि उसको देखने वाला, उसको जानने वाला मैं ही हूँ। मैं माने अहंकार। और चूँकि वो ख़ुद झूठा है, चूँकि वो ख़ुद झूठा है, इसीलिए वो जो कुछ भी देखता है, अपने झूठ की रक्षा करने के लिए ही देखता है। वो जो कुछ भी देखता है, उसको वास्तव में देखता नहीं है, प्रक्षेपित करता है। क्योंकि उसका प्रयोजन देखने से कम है और आत्म-सुरक्षा से ज़्यादा है। उसका सरोकार इससे नहीं है कि क्या है, मैं यह जानूँ। उसका प्रयोजन इससे है कि किसी तरह अपनी जान बचाऊँ, क्योंकि वह स्वयं मिथ्या है न।
अहंकार क्या है? देह के साथ पैदा हुआ एक भ्रम है, एक झूठ है, जो कहता है, "मैं हूँ, मैं हूँ।" देह तो फिर भी तथ्य हो सकती है व्यवहारिक तल पर। देह तो फिर भी तथ्य हो सकती है। पर यह जो अहम्-भाव है, अहम्-वृत्ति है, यह तो खुला झूठ है। यह न भी हो, तो देह रहती है और देह के संचालन के लिए, और जगत के व्यापार के लिए, अहंकार की कोई ज़रूरत नहीं है। उसके बिना भी दुनिया मस्त चल सकती है। लेकिन फिर भी अहंकार कहता है, "मैं हूँ।" तो अहंकार पहला झूठ है। चूँकि अहंकार झूठ है, इसलिए उसने अपने चारों तरफ़ जो जगत रच रखा है, वो झूठ है। इसलिए शंकराचार्य कह रहे हैं कि जगत मिथ्या। इसलिए कह रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: तो एक सवाल आ रहा है। अहंकार झूठ है, और आपने भी इस किताब में अच्छी तरह से लिखा है कि "ईगोसेंट्रिक एम्बिशन वर्सेस कॉन्शस एस्पिरेशन।"
आचार्य प्रशांत: पर अभी मैंने वो आपकी प्रोडक्टिविटी वाली बात का जवाब नहीं दिया। मैं दे दूँ?
प्रश्नकर्ता: प्लीज़, प्लीज़।
आचार्य प्रशांत: अब आप एक बात बताओ। मैं बैठा हूँ अपनी दुनिया के केंद्र में, और मेरे चारों ओर मेरी दुनिया है। और चूँकि मैं भीतर से झूठा हूँ, इसीलिए उस दुनिया में मैंने सारे झूठे अर्थ भर रखे हैं। कौन-सी चीज़ कैसी है, मुझे कुछ नहीं पता। बस उसको मैं वही परिभाषा देता हूँ, जिस परिभाषा से मेरे अपने झूठ की रक्षा हो सके। तो अब आप बताइए, मेरे लिए एफिशिएंसी, प्रोडक्टिविटी, उत्पादकता, या यह जो सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक व्यवस्था चल रही है, इसको बचाए रखने में मेरा क्या लाभ है? यह सारी व्यवस्था तो मेरे झूठ का उत्पाद है। इसको चलाए रखने से मुझे क्या मिलेगा?
आपने कहा, रिस्पॉन्सिबिलिटी। कौन-सी रिस्पॉन्सिबिलिटी? झूठ को बचाने की रिस्पॉन्सिबिलिटी। अहंकार जिन भी बातों को कहता है कि यह मेरी रिस्पॉन्सिबिलिटी है, कर्तव्य हैं, वह सब बातें उसके अपने झूठ की उपज हैं। तो उन बातों को बचाकर क्या मिलेगा? इसीलिए आपने जब अभी आरंभ में ही गीता की बात की, तो वहाँ पर तो गीताकार कहते हैं कि कर्तव्य तो नासमझी की सज़ा है। कर्तव्य तो उनके लिए ही होते हैं, जो नासमझ होते हैं। और जिनके पास समझ होती है, उनके लिए तो कोई कर्तव्य बचता ही नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि वो कुछ करते नहीं, वो बहुत बड़े-बड़े काम कर जाते हैं। पर उनके कर्तव्य फिर उन्हें कोई बताने नहीं आता बाहर से कि तुम यह करो, तुम यह करो। तो उनके जो कर्तव्य होते हैं, वो स्वतःस्फूर्त होते हैं।
इसी तरह से आगे और जाकर कहते हैं श्रीकृष्ण कि सारे ही अपने कर्तव्यों को छोड़कर, वो धर्म का नाम लेते हैं, कि सारे ही अपने धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। इसीलिए तो कहते हैं न, क्योंकि आपने जिस चीज़ को अपना धर्म या कर्तव्य समझ रखा है, वह आपके अहंकार की ही पैदाइश है। तो इसीलिए उसके पीछे भागने से आपको कुछ मिलेगा नहीं। बस इतना होगा कि आप जैसे हो, वैसे और बने रह जाओगे। आप अपने ही झूठ में और दृढ़ता से स्थापित होते जाओगे।
मैं बिल्कुल नशे में हूँ, और मैं इस चीज़ को कुछ समझ रहा हूँ, उसे कुछ समझ रहा हूँ, उसे कुछ समझ रहा हूँ। हर चीज़ को वो समझ रहा हूँ, जो वो है ही नहीं। और मैं दो और दो पाँच करने के लिए पूरी ज़िंदगी लगाए दे रहा हूँ और कह रहा हूँ, "यह तो मेरा कर्तव्य है। मुझे कर्तव्य सौंपा गया है परिवार द्वारा, परंपरा द्वारा, धर्म द्वारा कि मैं दो और दो पाँच करके दिखाऊँ।" और वह पूरी ज़िंदगी हो नहीं सकता, दो और दो पाँच। लेकिन मैंने उसको अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक ज़िम्मेदारी समझ रखा है। और फिर अगर कोई मुझसे सत्य की बात करे, तो मुझे डर लगता है कि अगर मैंने सत्य जान लिया, तो मेरी ज़िम्मेदारियों का क्या होगा?
आपकी ज़िम्मेदारियाँ झूठ हैं, इसीलिए तो वो सत्य के सामने टिक नहीं पातीं। इसीलिए जो लोग चाहते हैं कि आप झूठी ज़िम्मेदारियों में फँसे रहें, वो आपको उस सत्य के निकट जाने नहीं देना चाहते। आपको सच्चाई पता चल गई, तो आप झूठी ज़िम्मेदारियों के जाल से मुक्त हो जाओगे। क्योंकि वो ज़िम्मेदारियाँ सब आपके झूठ से ही उपज रही हैं।
जी, बताएँ। आप कुछ कह रहे थे।
प्रश्नकर्ता: मैं सोच रहा था कि मेरे पास मेरा कंपनी का सीईओ बैठे हुए हैं। सो आई वज़ थिंकिंग ऑफ़ कि, सपोज़, इट्स द मंथ ऑफ़ मार्च। यू नो, दिस एंटायर मंथ वी ऑलवेज़ थिंक एंड ग्रो विथ टारगेट। अगर मेरा सेल्स ग्राह को 100 करोड़ का एक्स्ट्रा टारगेट लेना है, कैन ही डील दैट टारगेट विदाउट ईगो?
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो जो टारगेट आपको दे रहे हैं, उनको वो थोड़ी चाहिए कि 100 करोड़ एक्स्ट्रा चाहिए। 100 करोड़, वो सो रहे होते हैं, कोई उनके ऊपर लाकर रख दे, तो उनको कोई आनंद थोड़ी आएगा। 100 करोड़ अहंकार को चाहिए। सो रहे हो आप, और आपके पेट पर आकर कोई 100 करोड़ की गड्डी रख दे, आपको कोई बहुत आनंद आ जाएगा? या आप सो रहे हैं, 100 करोड़ आपके अकाउंट में ट्रांसफ़र हो गया। आपको न उसका ज्ञान है, तो आपके जो सोने का आनंद है, उसमें कोई कमी आ जाएगी या कुछ बढ़ोतरी हो जाएगी?
पैसा अहंकार को चाहिए। और अहंकार को पैसा नहीं चाहिए, अहंकार को पैसे के माध्यम से संतुष्टि चाहिए।
समस्या यह है कि आप जो टारगेट बना रहे हो, वो टारगेट आपके असली टारगेट को पूरा नहीं कर रहा। आप 100 नहीं, 1000 करोड़ का टारगेट बना लो। जो अहम् का असली टारगेट है, वो उस टारगेट से पूरा ही नहीं होगा। आप अपने टारगेट को और ओवर अचीव कर लो। अहम् का टारगेट, अहम् इसलिए थोड़ी होता है कि उसको आप 100 करोड़ दे दोगे, तो उसकी भूख मिट जाएगी। वह बेचारा तो पैदाइशी आशिक़ है और पैदाइशी झूठा है। और इन दोनों चीज़ों में वो फँसा रहता है कि अपने झूठ को बचाऊँ या अपने प्रेम को पाऊँ।
उसका टारगेट ये है ही नहीं कि मुझे 100 करोड़ और मिल जाएँ। आप हो, कि आप हो, कि आप हो, कि जितने भी लोग अभी सभा में बैठे हों, कोई भी हों, हम सबका एक ही टारगेट है। किसी तरह पूर्णता मिले, तृप्ति मिले, संतुष्टि मिले, शांति मिले, मुक्ति मिले। यह असली टारगेट है। लेकिन इस टारगेट को पूरा करने के लिए हम एक सेकेंडरी टारगेट बनाते हैं। उस सेकेंडरी टारगेट का नाम है, ₹100 करोड़ मार्च के महीने में। सेकेंडरी टारगेट अच्छा है, अगर वो प्राइमरी टारगेट को पूरा कर रहा होता। समस्या ये है कि आपने ज़िंदगी में जितने सेकेंडरी टारगेट बना रखे हैं, वो कोई भी आपके मूल लक्ष्य की प्राप्ति में, प्राइमरी टारगेट को पाने में, सहायक नहीं होते हैं। इसीलिए तो आप इतना कुछ पाए जाते हो, फिर भी प्राइमरी टारगेट नहीं मिलता। प्राइमरी टारगेट का ही नाम लिबरेशन है, मुक्ति है, शांति है, सत्य है, आकाश है।
तो आप जगत में जी रहे हो, आप लक्ष्य बनाओगे, टारगेट्स बनाओ। लेकिन इतनी ईमानदारी होनी ज़रूरी है, स्वयं से पूछना ज़रूरी है कि आप ये जो टारगेट्स बना रहे हो, ये आपको आपके प्राइमरी टारगेट तक पहुँचा रहे हैं कि नहीं पहुँचा रहे हैं। कुछ भी पाकर क्या होगा, अगर जो पाया उससे ख़ुद को न पाया?
प्रश्नकर्ता: जी। सवाल है कि अगर बोर्डरूम में बैठकर, पसीने के साथ, और मेरा गुस्से वाला सीईओ जो मेरे सामने खड़ा हो जाए, अगर आचार्य जी की लैंग्वेज मैं उनको सुनाऊँ, वो मुझे क्या आंसर देंगे? मैं सोच रहा हूँ कि, "दिस एफर्ट इज़ नॉट गोइंग टू प्राइमरिली फ़ुलफ़िल द रियल हैप्पीनेस।"
आचार्य प्रशांत: आपका टारगेट ये है कि आपके सीईओ आपसे प्रसन्न रहें। लेकिन वो भी आपका प्राइमरी टारगेट नहीं है। आप अपने सीईओ को प्रसन्न रखकर कुछ और पाना चाहते हैं। लेकिन आप अपने सीईओ को कितना भी प्रसन्न रख लें, आपके सीईओ आपको कभी वो नहीं दे सकते, जो आपका केंद्रीय टारगेट है। आपके सीईओ में क्या, दुनिया के किसी सीईओ में वो क्षमता नहीं कि आपको वो दे दे, जिसके लिए आप सचमुच प्यासे हो।
प्रश्नकर्ता: सो, आचार्य जी, हाउ कैन वी शिफ्ट, अकॉर्डिंग टू यू, फ़्रॉम एन ईगोसेंट्रिक एम्बिशन टू अ कॉन्शस एस्पिरेशन, ताकि हमें ईगो न लगे?
आचार्य प्रशांत: बाय वॉचिंग द ईगो। हम जो कुछ भी कर रहे हैं, अपनी जान तो अहंकार की तृप्ति के लिए ही कर रहे हैं न। और जब तक वो है, जब तक उसको लगता है वो है, वही कर्ताधर्ता बनकर बैठा रहेगा। अहंकार ही डूअर है। द ईगो इज़ द डूअर, द मूवर, द प्लानर, द एग्ज़ीक्यूटर। सब कुछ वही करता है। तो बस उसको यह ख़याल रखना है कि कर तो मैं रहा हूँ यह सब कुछ, पर इससे क्या वास्तव में मुझे वह मिल रहा है, जो मुझे चाहिए?
इसको हम, जो हमारा गीता कम्युनिटी का फ़्रेमवर्क है, एपी फ़्रेमवर्क, उसमें हम इसको आत्मवलोकन कहते हैं। ख़ुद को देखो और पूछो कि जो कर रहे हो, उससे सचमुच तुम्हें मिल क्या रहा है? देखो कि तुम जो कर रहे हो, वो चीज़ किस केंद्र से आ रही है। क्या वो केंद्र भी ईमानदारी का है? ईमानदारी का केंद्र माने कि मुझे अगर प्यास लगी है, तो मैं डीज़ल न पियूँ, भले ही डीज़ल पानी से महँगा आता हो। लगी है प्यास, और डीज़ल पी रहे हैं, और ख़ुद को बता रहे हैं, "मैं बड़ा आदमी हो गया। पहले तो मैं सस्ता पानी पीता था, अब डीज़ल पी रहा हूँ। और ये सब घूम रहे हैं, इनकी तो ज़िंदगी में कुछ है नहीं। ये तो सिर्फ़ पानी पीते हैं। मैं बड़ा आदमी हूँ, मैं डीज़ल पीता हूँ।"
तो यह पूछना ज़रूरी है कि तुम जो कर रहे हो, और तुम जो सचमुच चाहते हो, जो तुम्हारी गहनतम आकांक्षा है, इनमें आपस में कोई मेल, कोई तारतम्य, कोई एलाइनमेंट है कि नहीं है। दौड़-धूप तो खूब कर रहे हो, दिन भर दौड़ रहे हो, जान लगा रहे हो। लेकिन यह सब जो कर रहे हो, इससे तुम्हें वह मिल रहा है क्या, जिसके लिए तुम पैदा हुए हो? और अगर वह नहीं मिल रहा, तो जन्म व्यर्थ ही गँवा रहे हो फिर।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू, आचार्य जी। अब हम दूसरे पड़ाव में चलते हैं। एक ही चीज़ों में इतना बहुत हो गया।
आचार्य प्रशांत: आप थोड़े से निराश लग रहे हैं मेरे उत्तरों से।
प्रश्नकर्ता: मैं निराश नहीं हूँ। मैं सोच रहा हूँ कि मैं आपकी कौन-सी लाइन को कोट करूँ, ताकि आई कैन डू माई डिफेन्स।
आचार्य जी, अक्सर क्या होता है कि आप कई सारी बातों में अटैचमेंट को फ़ोकस किए हैं कि इट्स ऑल्सो अ कॉज़ ऑफ़ सफ़रिंग। इसको बॉन्डेज कहते हैं, आपकी लैंग्वेज में। सो हम कैसे फ़र्क़ करें कि यह अटैचमेंट है और यह बॉन्डेज है, और ये अटैचमेंट सही है?
आचार्य प्रशांत: कोई अटैचमेंट सही नहीं होता। और अटैचमेंट और बॉन्डेज में फ़र्क़ करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है, क्योंकि अटैचमेंट बॉन्डेज होता है, अनिवार्य रूप से, अनपवाद रूप से, विदाउट एनी एक्सेप्शंस। तो अटैचमेंट तो बॉन्डेज होता ही है। शायद प्रश्न यह होना चाहिए कि हम कैसे अंतर करें कि अटैचमेंट है, माने लगाव है, जुड़ाव है, आसक्ति है या प्रेम है। इन दो में तो अंतर किया जा सकता है, अटैचमेंट और लव में, आसक्ति में और प्रेम में। इन दो में तो अंतर किया जा सकता है। अटैचमेंट और बॉन्डेज में कोई अंतर नहीं है। अटैचमेंट इज़ बॉन्डेज।
देखिए, समझते हैं। आमतौर पर हम अटैचमेंट की बात किसी व्यक्ति के संदर्भ में ही करते हैं। यद्यपि किसी वस्तु से भी हो सकता है। कोई कह सकता है, "आई एम अटैच्ड टू माई कार।" पर आमतौर पर ऐसा उपयोग कम होता है, ज़्यादा किसी व्यक्ति के संदर्भ में होता है। "आई एम अटैच्ड टू सच-एंड-सच पर्सन।" इससे मेरा ऐसा-ऐसा आसक्ति है। अब आप जिस चीज़ से जुड़ रहे हो, उससे जुड़ थोड़ी रहे हो पूरे तरीके से अटैचमेंट में। अटैचमेंट का मतलब होता है सुपरफ़िशियल अफ़िलिएशन। सतह से सतह का संपर्क में आ जाना, और खाल, खाल से चिपक गई। अटैचमेंट हुआ है, डिसॉल्यूशन नहीं हो गया है। अटैच्ड ही है सबमर्ज नहीं है, डिसॉल्व्ड नहीं है, इमर्ज नहीं है, डूबे नहीं हैं, अपलावन नहीं हो गया। गले नहीं हैं, विगलित नहीं हुए हैं। सिर्फ़ अटैच्ड हैं, अटैच्ड हैं। और अटैचमेंट का मतलब है, ऐसे जाकर सतह-सतह से, खाल-खाल से जुड़ गई है, और खाल-खाल से जुड़ी है, अभी ऐसे अलग भी हो जाएँगे। तो इसमें अहंकार तो जैसा था, वैसा ही रह गया न। बल्कि अहंकार ने उस दूसरे व्यक्ति को या विषय को अपने आप को और सुदृढ़ करने के लिए इस्तेमाल कर लिया है।
तो अहंकार अटैचमेंट में मस्त रहता है, लेकिन प्रेम से बहुत घबराता है। यद्यपि हम अपने अटैचमेंट को ही प्रेम का नाम देकर ख़ुश हो लेते हैं। हमें लगता है कि मैं तो बड़ा प्रेमी हूँ। मेरा इससे प्रेम है, मेरा उससे प्रेम है, मेरा उससे प्रेम है। आई लव माई फ़्रेंड्स, आई लव माई फ़ैमिली। लेकिन सही बात तो यह है कि हम सब अहंकारी हैं, और अहंकार और प्रेम साथ-साथ नहीं चल सकते। अहंकार माने एक भीतरी झूठ, और प्रेम का अर्थ होता है उस भीतरी झूठ को हटाने की चाहत। अहंकार कहता है, "भीतरी झूठ क़ायम रहे। मैं रहूँ, मैं रहूँ।" और प्रेम का अर्थ ही है कि भीतरी झूठ हटे। प्रेम माने एक आकर्षण, प्रेम एक चाहत। कौन-सी चाहत? मैं जो हूँ, मैं वैसा न रहूँ, मेरा होना मेरे लिए ठीक नहीं। क्या मैं किसी ऐसे से जुड़ सकता हूँ, जो मुझे मिटा दे?
और अटैचमेंट कहता है, "मैं जैसा हूँ, वैसा ही रहूँ। हाँ, अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मैं जाकर किसी से ऊपरी, सतही, सुपरफ़िशियल रिश्ता बना लूँ।" अटैचमेंट में आप बदलते नहीं, अटैचमेंट में आप मिटते नहीं। अटैचमेंट में आप और बढ़ जाते हो, आप और दृढ़, और पुख़्ता, और सॉलिडिफ़ाइड, और रिइन्फ़ोर्स हो जाते हो।
तो कैसे पता करें कि अटैचमेंट है कि प्रेम है, लव है? बस यह देख लीजिए कि आप जिससे रिश्ते में हैं, उस रिश्ते में आपके भ्रम कट रहे हैं कि नहीं कट रहे हैं।
सामने वाला आपके जीवन में आया है, तो आपके भीतरी अँधेरे को प्रकाशित कर रहा है या भीतरी अँधेरे को और बढ़ा रहा है। जिसको आप ज़िंदगी में लाए हैं, वो क्या चाह रहा है, आपको और स्वतंत्रता देना या आपको और क़ैद देना, बंधन देना? प्रेम में जो आपके साथ होता है, आप उसे मुक्ति, स्वतंत्रता, आज़ादी देते हो, फ़्रीडम देते हो, आसमान देते हो, पंख देते हो। अटैचमेंट में चूँकि आप गए ही हो दूसरे से बस बाहर-बाहर से जुड़कर कुछ अपनी स्वार्थ-सिद्धि करने के लिए। तो अटैचमेंट में आप हमेशा उसको बॉन्डेज दोगे, जो आपके सवाल की शुरुआत थी, अटैचमेंट इज़ बॉन्डेज। अटैचमेंट में आप जिससे जुड़े हो, उसको बिल्कुल पकड़कर रखोगे। उससे दस्तख़त करा लोगे कि तू कहीं भागेगा नहीं। हर तरीके से उस पर बंधन लगाओगे। यह अटैचमेंट है। प्रेम माने मुक्ति, और अटैचमेंट माने शोषण। ऐसे अंतर कर लीजिए।
एक हमारे यहाँ गीता कम्युनिटी पर एक उक्ति चलती है, जो बड़ी पसंद है गीता-छात्रों को हमारे। वो ये चलती है कि एक आदमी कह रहा है, "अरे, उसने पिंजरे में एक चिड़िया रखी हुई है। अरे, ये मेरी चिड़िया मुझसे बहुत प्यार करती है। मेरी चिड़िया मुझसे बहुत प्यार करती है।" तो पीछे से, आचार्य जी बोल रहे हों, "तो ठीक है, पिंजड़े का दरवाज़ा खोल दो। हम देखें कि सचमुच तुम्हारी चिड़िया तुमसे कितना प्यार करती है।" या इसी का एक दूसरा संस्करण है कि वो व्यक्ति कह रहा है, "मैं अपनी चिड़िया से बहुत प्यार करता हूँ। मैं अपनी चिड़िया से बहुत प्यार करता हूँ।" चिड़िया को पिंजरे में रखकर बोल रहा है, "मैं अपनी चिड़िया से बहुत प्यार करता हूँ, बहुत प्यार करता हूँ।" तो उससे कहा जा रहा है, "ठीक है, पिंजड़े का दरवाज़ा खोल दो। देखते हैं तुम्हारी चिड़िया भी तुमसे कितना प्यार करती है।" ये अटैचमेंट है, दूसरे को अपनी ज़िंदगी में रखना अपने स्वार्थ के लिए।
प्रश्नकर्ता: एक माँ और बच्चों के साथ, या कोई एक इंटिमेसी रिश्ते को आप किस नज़र में देख रहे हैं? ये क्या सेम अटैचमेंट है?
आचार्य प्रशांत: दोनों बातें हो सकती हैं।
प्रश्नकर्ता: आप इसको बंधन भी कह सकते हैं। बच्चों और माँ के रिश्तों में तो वो बंधन भी है।
आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं। माँ और माँ में बहुत अंतर होता है। एक माँ होती है प्रकाशित, समझदार, जानकार; और एक माँ होती है अहंकारी। जैसे सब जीव होते हैं, दो तरह के। तो जिस माँ के माध्यम से उसका अहंकार काम कर रहा होगा, वह बच्चे को भी अपनी इच्छाओं की पूर्ति का साधन बना लेगी। जब हम कहते हैं न, "माँ और बच्चे का रिश्ता तो पवित्र होता है," तो हम ऐसे कहते हैं जैसे सब माएँ एक जैसी होती हैं। माएँ भी बिल्कुल दो तरह की होती हैं, जैसे सब जीव दो तरह के होते हैं। मैंने बोला है, "पूत कपूत हो सकता है, तो माता कुमाता भी हो सकती है।" बिल्कुल हो सकती है, क्योंकि मनुष्य है। और मनुष्य उठ भी सकता है, मनुष्य गिर भी सकता है।
एक माँ होगी, जो कहेगी कि भले ही मेरे शरीर से बच्चे का जन्म हुआ है, पर बच्चा शरीर मात्र नहीं है। मुझे सिर्फ़ यही नहीं देखना है कि नहला दिया, धुला दिया, मालिश कर दी, खाना खिला दिया। मुझे यह भी देखना है कि इसके भीतर क्या चल रहा है, मुझे इसकी चेतना पर ध्यान देना है। यह जागृत माँ है, यह असली माँ है, यह सुमाता है, यह पूजनीय माँ है। और एक दूसरी माँ होगी, जो कहेगी, "बेटा चाहिए, बेटा चाहिए।" भारत में इतनी भ्रूण-हत्याएँ होती हैं, वो माँओं की सहमति के बिना तो नहीं हो जातीं न। इतनी जो लड़कियाँ मार दी जाती हैं, कोख में ही, या पैदा होने के ठीक बाद, वो माँओं की सहमति के बिना तो नहीं मार दी जातीं। पूरी सहमति नहीं होगी माँओं की, पर कुछ तो रहती है।
बेटियों को उल्टे-सीधे संस्कार देने में, और बेटियों को दबाकर रखने में, माँओं का भी पूरा योगदान होता है। तो किसने कह दिया कि माँ तो देवी ही होती है? तो जब हम माँ और बच्चे के रिश्ते की बात कर रहे हैं, तो वो किसी भी अन्य रिश्ते से भिन्न नहीं है। जैसे कोई भी रिश्ता एक अच्छे, सुंदर, सच्चे केंद्र से भी हो सकता है, और एक गिरे हुए, घटिया केंद्र से भी हो सकता है; वैसे ही माँ और बच्चे का रिश्ता भी दोनों तरह का हो सकता है। बहुत ऊँचा रिश्ता भी हो सकता है माँ और बच्चे का, और बहुत गिरा हुआ रिश्ता भी हो सकता है माँ और बच्चे का। निर्भर इस पर करता है कि माँ आध्यात्मिक रूप से कितनी जागृत है। माँ अगर जगी हुई होगी, तो उसके जगने का, उसके जागरण का प्रकाश उसके बच्चे से उसके संबंध में भी दिखाई देगा। और माँ अगर जगी हुई नहीं होगी, तो उसके बच्चे से उसके रिश्ते में भी अंधकार होगा, और उसके जितने रिश्ते होंगे दुनिया में, उस माँ के उन सब रिश्तों में बराबर का अंधकार होगा।
ये जो हमने एक परंपरा से, संस्कृति से बात पकड़ ली है कि सिर्फ़ इसलिए कि आपने बच्चे को जन्म दे दिया, तो अब आप में कुछ गरिमा आ गई, कुछ दैवीयता आ गई, यह बात गलत है, ऐसा कुछ नहीं होता है। बच्चे को जन्म देने भर से अहंकार में कोई परिवर्तन नहीं आ जाता। हाँ, उसको एक बेचारा, कोमल, नाज़ुक, निरीह, दुर्बल और आश्रित विषय मिल जाता है, जिस पर अब वह अपनी मनमानी चला सकता है।
माँ-बाप जो बेहोश माँ-बाप हैं, वे सबसे ज़्यादा शोषण और किसका करते हैं? अपने बच्चे का ही तो करते हैं, क्योंकि बच्चा उन पर आश्रित है। तो यह जो हमने पारंपरिक बात पकड़ रखी है कि साहब, माँ तो भगवती है और पिता तो भगवान हैं, इस बात में कोई दम नहीं है। माँ-बाप बच्चों का शोषण भी जमकर करते हैं, क्योंकि वो हैं ही ऐसे। जब वे हर चीज़ का शोषण कर रहे हैं, तो अपने बच्चे का नहीं करेंगे क्या? जब वो जाकर के; नहीं, कंट्रोवर्शियल नहीं है, बहुत सीधी बात है। ये जो बात है, यह भारत के मौलिक धर्म से आ रही है। और अगर हम इस बात को कंट्रोवर्शियल कह रहे हैं, तो फिर हम तो सनातन को ही कंट्रोवर्शियल कह रहे हैं। जो मैं बात कह रहा हूँ, वह वेदों के दर्शन, वेदांत से आ रही है। वह कंट्रोवर्शियल हमें सिर्फ़ इसलिए लग रही है क्योंकि हमारा जो लोकधर्म है, वो जो हमारी प्रचलित अभी संस्कृति चल रही है, वह वेदांत से बहुत दूर छिटक चुकी है।
तो अब जब असली धर्म हमारे सामने प्रस्तुत किया जाता है, तो वह हमारे लिए सनसनीखेज़ हो जाता है, आपत्तिजनक हो जाता है, कंट्रोवर्शियल हो जाता है।
प्रश्नकर्ता: चलिए, यह एक आध्यात्मिक असर है, और यह सवाल मुझे ज़रूर पूछना चाहिए कि जब हम भक्ति की बात कर रहे हैं, और सुबह तीन-चार सेशन जा चुके हैं पूरी-की-पूरी किताब में आपकी, अद्वैत में, और जहाँ भी है, कि आपने फोकस किया कि* यू मस्ट आस्क।* हमें पूछना चाहिए। इन्क्वायरी इज़ द कोर डीएनए ऑफ़ योर टीचिंग। बट बहुत बड़ा बिरादरी देश में जो फॉलो करते हैं बिना पूछे, सो क्या हमें हर कुछ पूछना चाहिए, या कुछ चीज़ों को फॉलो करना चाहिए? हम कैसे समझें कि क्या पूछें और क्या फॉलो करें?
आचार्य प्रशांत: यह भी तो आप पूछ ही रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: जी। हाँ ये पूछ रहा हूँ।
आचार्य प्रशांत: प्रश्न ही अवैध हो गया न! अरे, जो नहीं भी पूछ रहे, उन्हें भी बताया गया है। समस्या यह है कि उन्हें बिना पूछे बता दिया गया। उनको पता ही नहीं है कि कब उनको बता दिया गया, और जो उनको बता दिया गया, उसे उन्होंने चुपचाप अपनी बेहोशी में मान लिया।
आप जाते हो किसी को फॉलो करने, बाबा जी को फॉलो करने आप चले जाते हो। क्या आपको बचपन से पता था कि बाबा जी को फॉलो करना है? आपने पूछा नहीं, भले ही कि फॉलो किसको करना है और फॉलो करना चाहिए भी कि नहीं; पर आपको बताया गया है। हवाओं ने आपको बता दिया, चुपचाप प्रचलित संस्कृति ने आकर आपके कान में फूँक दिया और आपके मन में यह बात स्थापित कर दी। चुपचाप, साज़िशन, एक षड्यंत्र की तरह आपके भीतर ये बात बैठा दी गई कि फॉलो करो। आपने पूछी नहीं, पर बताई गई है आपको। कोई आपके भीतर से ये बात थोड़ी निकल रही है। तो जब बात बाहर से ही आ रही है सारी, तो मैं प्रश्न करूँ न? जब मुझे बाहर की ही किसी बात को अपने भीतर प्रवेश देना है, तो कम-से-कम वह प्रश्न की छन्नी से होकर गुज़रे, बाहरी बात।
मैं फिर पूछ रहा हूँ, बाबा जी को फॉलो करना है, फलानी रस्म को फॉलो करना है, फलाने पंथ को, फलानी धारा को फॉलो करना है। आपने फॉलोअरशिप की बात करी। फॉलो करना है, यह बात भी आपको किसी ने सिखाई है। आपकी अपनी नहीं है। जब आपको बाहर से ही किसी से कुछ जानना है, जब बाहर से ही किसी से कुछ सीखना है, तो प्रश्न के माध्यम से सीखिए, अपनी चेतना के माध्यम से सीखिए। देखिए, फॉलो तो पशु भी कर लेता है। मनुष्य को मनुष्य बनाती है उसकी जिज्ञासा। यह एक काम है जो पशु नहीं कर सकता। और जो जिज्ञासा ही करने से इंकार कर दे, जो अपने जीवन में प्रश्नों को वर्जित कर दे, वह फिर पशु जैसा हो जाता है।
आप जानवर को ट्रेन कर दीजिए, ऐसा करना है, वह करता रहेगा। अगर आपने इंसान को भी ऐसा ही कर दिया है कि चलो उस दिशा चलो, वैसे चलो, उस कतार में लग जाओ, वहाँ जाकर ये कर लो, वहाँ जाकर वो कर लो, तो इंसान भी फिर पशु जैसा हो गया। इंसान की पहचान ही है उसकी जिज्ञासु चेतना। तो प्रश्नों का कोई विकल्प नहीं होता है। और याद रखिएगा, ऐसा नहीं है कि जो प्रश्न नहीं पूछ रहा, वह कुछ स्वीकार ही नहीं कर रहा बाहरी बात, उसकी हालत ज़्यादा ख़राब है। जो प्रश्न नहीं पूछ रहा, वह बाहरी बात को स्वीकार कर रहा है, लेकिन बिना प्रश्न पूछे। स्वीकार तो वह भी बाहरी ही बात को स्वीकार कर रहा है, लेकिन बिना प्रश्न पूछे स्वीकार कर रहा है। यह कितनी ख़तरनाक चीज़ है! सोचिए।
आपने न जाने कितनी बातें मान रखी हैं। आप अपनी मान्यताएँ लेकर चल रहे होंगे। मैं आपसे पूछूँ, इनमें से कितनी मान्यताएँ आपकी अपनी हैं? निजी हैं? मौलिक हैं? एक भी आपकी अपनी नहीं है।
प्रश्नकर्ता: बहुत कम।
आचार्य प्रशांत: आप जिस परिवेश में, जहाँ पैदा हुए, जिस युग में पैदा हुए, जिस काल, जिस संदर्भ में, वहाँ से आपको मान्यताएँ मिल गईं। आपने बिना प्रश्न पूछे उनको स्वीकार कर लिया। आप कहीं और, किसी देश में होते, किसी दूसरे लिंग में होते, किसी दूसरे धर्म में, किसी दूसरी जाति में होते, किसी दूसरी आर्थिक स्थिति में होते, किसी दूसरे राष्ट्र में होते, आपकी मान्यताएँ दूसरी होतीं। तो चल तो आप सब बाहरी चीज़ों पर ही रहे हो। जब आप बाहरी चीज़ों पर ही चल रहे हो, तो उन बाहरी चीज़ों पर कम-से-कम सवाल तो उठा दो, स्वीकार करने से पहले। कर लेना स्वीकार, हम नहीं कह रहे कि हर बाहरी चीज़ को अस्वीकार ही करो। तुम्हें स्वीकार भी करना है, तो कर लेना स्वीकार। पर भाई, पूछ के स्वीकार कर लो कम-से-कम।
प्रश्नकर्ता: आचार्य प्रशांत कोई भजन गाते हैं?
आचार्य प्रशांत: खूब गाते हैं। भजन ही भजन गाते हैं। आप हमारी गीता कम्युनिटी में आइए, वहाँ भजन ही भजन चलते हैं।
प्रश्नकर्ता: अद्वैत के हिसाब से यह सवाल होता है कि पूजा नहीं?
आचार्य प्रशांत: अरे, अद्वैत में कैसे भजन नहीं होंगे? आधे शंकराचार्य “भज गोविंदम्, भज गोविंदम्” कर रहे थे। आप कह रहे हैं, अद्वैत में भजन नहीं है। और जो न भजे, उसको क्या बोल रहे थे? वो बोलते हैं मूढ़मति हो तुम। “भज गोविंदम् मूढ़मते।”
प्रश्नकर्ता: वहाँ भी उन्होंने मूढ़मति बोल दिया।
आचार्य प्रशांत: लेकिन, भजने का बड़ा साफ, स्पष्ट और सुंदर अर्थ होना चाहिए। भजने का मतलब तोते की तरह दोहराना नहीं होता। भज शब्द का अर्थ होता है दूरी, विभाजन। देखना कि मैं जो बना बैठा हूँ, मैं वह नहीं हूँ जो मैं सचमुच हूँ। एक दूरी दिख रही है मुझे मेरे तथ्य में और मेरी संभावना में, और यह दूरी कष्ट देती है। इसी कष्ट से सब भजन उठते हैं। उसको भजन बोलते हैं। भजन बिना ज्ञान के नहीं उठ सकता। दस लोग कुछ गा रहे हैं, तो आप भी वहीं पर मस्त होकर गाने लग गए, इसको भजन नहीं बोलते। जो गा रहे हैं, उसका अर्थ भी नहीं पता ठीक से, बस दोहराए जा रहे हैं, दोहराए जा रहे हैं, नाचे जा रहे हैं। इसको भजन नहीं बोलते।
भजने के लिए सबसे पहले घोर पीड़ा उठनी चाहिए। वह विरह ही प्रेम का आधार है।
भज, देखना कि ये मैं कहाँ आकर पड़ गया हूँ। मैं कौन हूँ, और अपने आप को क्या माने बैठा हूँ? क्या मेरी सच्चाई है, और कैसा मैं जीवन जी रहा हूँ? कितनी दूरी हो गई इन दोनों में? कितना भेद हो गया इन दोनों में? जब यह दिखाई देता है, तो फिर उससे स्वतः ही भजन फूटता है। वह आँसुओं के साथ फूटता है फिर भजन। तो वह असली भजन होता है। ये जो आप आमतौर पर भजन-वजन देखते हैं, ये सब ऐसे ही है। ये तो मनोरंजन है, भजन नहीं है।
प्रश्नकर्ता: अच्छा, ठीक है। आचार्य जी, आपने बहुत सारी बातें सोशल प्रीकंडीशनिंग्स के बारे में भी बोली हैं कि थिंग्स आर वेरी मच प्रीकंडीशन्ड। वी प्रिटेंड द वे पीपल एक्सपेक्ट आन्सर्स फ्रॉम अस। वी बिहेव। द पर्सनैलिटी, इट इज़ ऑल्सो कंडीशन्ड। एवरीथिंग इज़ कंडीशन्ड। डोंट यू थिंक दैट द कंडीशनिंग इज़ सम सॉर्ट ऑफ़ डिसिप्लिन? जैसे मैं कोई क्रिकेट खेल रहा हूँ, मान लीजिए, और मेरे चार बॉल बाक़ी हैं स्कोर करने के लिए। सो मैं उस चार बॉल को ही ऑनर करके मुझे स्कोर करना है। या मैं मार्च के टारगेट में हूँ, मुझे इतना और कमाना है रुपया, व्हॉटएवर काइंड ऑफ़ थिंग्स। देयर इज़ सम सॉर्ट ऑफ़ डिसिप्लिन, इंडायरेक्टली, दिस प्रीकंडीशनिंग।
आचार्य प्रशांत: आप क्रिकेट क्यों खेल रहे हैं? आपने कहानी की शुरुआत ही बीच में से कर दी है। आप खेल ही क्यों रहे हो क्रिकेट? आप बीमार हो, आपको क्रिकेट खेलना ही नहीं चाहिए। आपको कुछ और करना चाहिए। आपको कैसे पता कि आपको क्रिकेट खेलना चाहिए? आप क्यों लगे हुए हो आप मार्च के महीने में अपनी रेवेन्यू पूरी करने में? आपको कहीं और होना चाहिए था। आप जो कर रहे हो, वह आपको करना ही नहीं चाहिए। लेकिन आप जो कर रहे हो, आप इसलिए कर रहे हो क्योंकि आपको पता ही नहीं है कि आप वह हो ही नहीं जो अपने आप को मानते हो।
मैं यूँ ही क्रिकेट खेलने पहुँच गया। क्यों? क्योंकि मुझे दुनिया ने बोल दिया, “तुम्हें क्रिकेट खेलना चाहिए।” क्रिकेट से मेरा वास्तव में कोई नाता नहीं। अब मैं कहूँ कि मैं क्रिकेट खेलने आया हूँ, तो मुझे क्रिकेट के नियमों का पालन तो करना पड़ेगा न। तो यह कोई तर्क हुआ? असली बात तो यह है कि तुम क्रिकेट खेलने आए ही क्यों हो? तुम्हें यहाँ होना ही नहीं था। हर पल जो तुम इस झूठे मैदान में बिता रहे हो, तुम्हारे जीवन की बर्बादी है। तुम आए क्यों हो क्रिकेट? क्यों आए हो? क्योंकि बगल में टिंकू भैया, सामने झुनू भैया, इधर वो, ये सब लोग क्रिकेट खेलते थे। टीवी पर खूब देखते थे क्रिकेट। तो आपके भीतर भी अनजाने में यह बात प्रवेश कर गई कि क्रिकेट तो खेलना ही होता है। तो इसलिए आप क्रिकेट खेलने पहुँच गए। और अब क्रिकेट खेलने के पक्ष में आप तर्क दे रहे हैं कि क्रिकेट खेलना है तो नियम तो मानने पड़ेंगे न।
कंडीशनिंग का मतलब यह नहीं होता कि आपने बाहर के नियम मान लिए। कंडीशनिंग का मतलब होता है कि आपको एक झूठी पहचान दे दी गई।
बाहरी नियम-कायदे तो मानने ही होते हैं। मैं भी क्या सड़क पर चलता हूँ, तो जो ट्रैफिक के कायदे हैं, उनको नहीं मानता? मैं बैंक में अगर कुछ काम करूँगा, तो जो बैंक का नियम, कायदा, अनुशासन होगा, उसका पालन करूँगा। मैं किसी देश में जाऊँगा, तो उनके वीज़ा की और उनके देश की जो सब कायदे होंगे, उनका मुझे भी पालन करना होगा। इसको कंडीशनिंग नहीं बोलते हैं। भारत में हमारे यहाँ पर राइट-हैंड ड्राइव होता है। कहीं जाऊँगा, वहाँ पर लेफ्ट-हैंड ड्राइव है, सड़क के नियम दूसरे हैं, तो पालन करूँगा। इसको कंडीशनिंग नहीं बोलते हैं। कंडीशनिंग होता है जब आपको आपके बारे में ही कुछ ऐसा जता दिया जाए जो एकदम झूठ है। कंडीशनिंग मौलिक झूठ है।
कंडीशनिंग का मतलब है कि आपको बता दिया गया है कि तुम फलाने लिंग के हो, फलाने वर्ग के हो, इसलिए अब तुमको इस हिसाब से काम करना है। कंडीशनिंग का मतलब है कि आपको बता दिया गया है कि तुम्हारे घर में सब लोग पैसा कमाने के लिए ही जीते हैं, तो तुम्हें भी यही करना है। कंडीशनिंग का मतलब है कि आपको बता दिया गया है कि आप स्त्री पैदा हुए हैं और आप फलाने वर्ण में पैदा हुए हैं, तो अब आपको इस-इस तरीके से पूरी ज़िंदगी अपने कर्तव्यों का पालन करना है। यह कंडीशनिंग है।
भाई, मैं रेलवे कोच में घुसा हूँ और वहाँ पर मुझे टिकट दिया गया है, और उसमें मेरी सीट बता दी गई है, तो मैं अपनी सीट पर ही जाकर बैठूँगा। यह कोई कंडीशनिंग नहीं हो गई। यह व्यावहारिक बुद्धि है। इसमें कुछ नहीं हो गया, यह बिल्कुल ठीक है। कंडीशनिंग मतलब आइडेंटिटी कन्फ्यूज़न। कंडीशनिंग मतलब क्रिएशन ऑफ़ अ फ़ॉल्स आइडेंटिटी। आप अपने आप को वह मानने लग जाओ, जो आप कहीं से नहीं हो। यह कंडीशनिंग होती है।
प्रश्नकर्ता: एक सवाल मैं पढ़ रहा था इस किताब में। उस किताब का चैप्टर होगा। बट इंटरेस्टिंग था मेरे लिए। बहुत सारे- सारे चैप्टर्स कि पीपल हैव किल्ड द चाइल्ड इनसाइड अस। वह सब्जेक्ट था, एक्चुअली, 101 का। बड़ा ही इंटरेस्टिंग था वह। और यह जो द सोसाइटी एक्सप्लॉइटेड द चाइल्ड इन अस, एंड इफ़ वी आर कंडीशन्ड, दैट इज़ व्हाइ वी आर सफरिंग, कि आप यह भी लिखते हैं कि जो इट यूज़्ड टू एप्रिशिएट मी येस्टरडे, नाउ इट इज़ क्रिटिसाइज़िंग मी टुडे। सो आइ शुड नॉट बॉदर अबाउट इट।
बट इफ़ आइ वज़ अ गुड बॉय एंड द पीपल हू वर एप्रिशिएटिंग मी, एंड टुडे आइ ऐम अ बैड बॉय बिकॉज़ ऑफ़ सम बैड एडिक्शन, एंड पीपल आर यूज़िंग बैड लेबल्स फ़ॉर मी, डोंट यू थिंक दैट दोज़ काइंड्स ऑफ़, यू नो, प्रीकंडीशन्ड थिंग्स कैन ऑल्सो सेट सम सॉर्ट ऑफ़ डिसिप्लिन इंडायरेक्टली? अदरवाइज़, द मॉरल अकाउंटेबिलिटी एंड रिस्पॉन्सिबिलिटी विल नॉट बी टैम्पर्ड?
आचार्य प्रशांत: आपको कैसे पता चलेगा? आपको कैसे पता चलेगा कि आपसे जो बातें कही जा रही हैं, उनमें क्या स्वीकार करना है, क्या नहीं स्वीकार करना है? कैसे पता चलेगा? पहला सवाल। दूसरा, आपको पता भी चल गया कि क्या सही है, आप उसको क्यों स्वीकार करोगे? तो दो सवाल हैं मेरे आपके लिए, कैसे और क्यों?
आपसे मैं कोई बात बोल रहा हूँ, आपसे दस और दूसरे लोग आकर बोल रहे हैं। हिंदुस्तान में हर दसवाँ आदमी आचार्य है, बाबा जी, बाबा जी चारों तरफ़ तो सब घूम ही रहे हैं। सब आपसे बात कर रहे हैं। आपको कैसे पता चलेगा किसने आपसे सही बात कही? यह पहला सवाल था, कैसे? और दूसरा था, आपको पता चल भी गया कि किसने सही बात कही, तो आप उसे क्यों स्वीकार करोगे?
पहले का उत्तर है, विवेक।
और दूसरे का उत्तर है, प्रेम।
और यह दोनों ही बातें आंतरिक होती हैं। बाहर से किसी की बात सुनने पर कोई मनाही नहीं है। किसी ने बाहर से आपसे कुछ कहा, उसको सुन लेने से आपकी कंडीशनिंग नहीं हो जाती। बाहर से जो कहा जा रहा है, बेशक सुनिए। मैं कितनी किताबें पढ़ता हूँ, आप भी पढ़िए। मैं सबको प्रेरित करता हूँ, और पढ़ो, और देखो। मूवीज़ देखो। घूमो। बाहर के सब प्रभावों को आने दो अपने ऊपर। बाहर से आपने किसी से सुना भी मैं बोल रहा हूँ, तो सब यहाँ पर लोग बैठे हैं। श्रोता सब सुन ही रहे हैं। बाहर से किसी की बात सुन लेने से आप कंडीशंड नहीं हो जाते।
लेकिन सवाल यह है कि बाहर से तो इतनी बातें हम सुन रहे हैं, टीवी, मोबाइल, होर्डिंग। लगातार बाहर ही बाहर से हमारे कानों में पड़ रहा है, आँखों में पड़ रहा है। कैसे पता चले कि उसमें से कौन-सी बात सही है, कौन-सी बात नहीं है? वह पता चलता है तब, जब मुझमें एक ईमानदार जिज्ञासा होती है सच जानने की। ज़्यादातर लोग सच जानने के लिए नहीं सुनते। ज़्यादातर लोग ख़ुद को बचाने के लिए सुनते हैं। जो चीज़ मेरे अहंकार के विरुद्ध जाती है, मेरे कान उसको स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं। जो चीज़ मेरे अहंकार को अनुकूल पड़ती है, वह नहीं भी कही गई, तो मैं सुन लेता हूँ। मनुष्य ने तो धार्मिक ग्रंथों तक को विकृत कर दिया, श्लोक के श्लोक बदल डाले। और अगर श्लोक नहीं बदल पाए, तो उनके अर्थ विकृत कर दिए।
आज इतनी गीताएँ चल रही हैं, प्रचलन में हैं। आप श्लोक को देखिए और नीचे उसकी जो व्याख्या करी गई है, उसको देखिए। आप सिर पकड़ लेंगे। कहेंगे, ये क्या करा है? श्लोक क्या बोल रहा है, और ये क्या अर्थ कर दिया उसका? अहंकार ऐसा है, उसको आप जाकर सच बता दें। आप छोड़िए, गीता भी सच बता दे, श्रीकृष्ण भी जाकर सच बता दें, तो उसका अर्थ उल्टा कर लेगा। तो यह मेरा पहला प्रश्न था, कैसे? उसके लिए चाहिए ईमानदार जिज्ञासा, विवेक।
दूसरी बात, किसी तरीके से आपको आश्वस्त कर भी दिया गया। मान लीजिए, मैं आपको आश्वस्त कर देता हूँ कि मैं आपसे जो बात बोल रहा हूँ, वह बिल्कुल सही है, यथार्थ है। तो भी आप मना कर सकते हो कि नहीं स्वीकारूँगा। और यह खूब होता है। आप बिल्कुल अंत में ही कह सकते हो, “बात तो ठीक है, पर हमें नहीं माननी।” आपने देखे होंगे ऐसे लोग, जो आपसे कह देंगे, “बात होगी ठीक, पर हम नहीं मानते।” तो जो बात आपको ठीक भी लग रही है, उसको जीवन में उतारने के लिए अपने प्रति बड़ा प्रेम चाहिए।
हमारे पास न जिज्ञासा होती है, न प्रेम होता है। और जब तक ज्ञान और प्रेम का यह संगम नहीं होगा, तब तक जीवन में परिवर्तन भी नहीं आएगा।
लोग बात करते हैं ज्ञान मार्ग की, प्रेम मार्ग की, जैसे कि दोनों अलग-अलग हों। एक ही मार्ग है, जिसमें ज्ञान और प्रेम दोनों होते हैं। जहाँ कहीं भी ज्ञान और प्रेम को दो अलग-अलग मार्ग करके बताया जा रहा है, वहाँ बात मूढ़ता की हो रही है। ज्ञान बिना प्रेम के कुछ नहीं कर सकता, और प्रेम बिना ज्ञान के अंधा है बिल्कुल। ज्ञान और प्रेम का संगम जहाँ होता है, वहाँ जीवन-परिवर्तन होता है। विवेक चाहिए और प्रेम चाहिए। विवेक आपको बताएगा किसकी बात सुनें। विवेक आपको बताएगा कौन-सी बात मानने लायक है। और प्रेम आपसे उस बात को जीवन में उतरवाएगा। विवेक बताएगा, “यह बात ठीक है।” और प्रेम कहेगाक् “अब जब बात ठीक है, तो उसको ज़िंदगी बना लो।”
यह दोनों जब होते हैं, तो जीवन में उतर आते हैं। इसे कंडीशनिंग नहीं कहते। बात तो सब बाहर से ही आनी है। पर जब विवेक और प्रेम होता है, तो फिर सिर्फ़ असली बात भीतर जाती है और ज़िंदगी बन जाती है।
प्रश्नकर्ता: ये बहुत अच्छी बात है। अब हम शुरू करते हैं। बट, आपकी जानकारी के लिए, जगन्नाथ मंदिर आप कब आए हैं, मुझे पता नहीं। आए होंगे या नहीं आए होंगे। उसमें बड़ी अच्छी बात होती है कि वी हैव हियर ह्यूमनाइज़्ड द गॉड। गॉड इज़ वॉकिंग अमंग अस। गॉड इज़ स्लीपिंग। गॉड इज़ सफरिंग फ्रॉम फीवर। गॉड इज़ टेकिंग फ़ूड लाइक अस। और स्टार्टेड फ्रॉम अद्वैत, फ्रॉम शंकराचार्य, से लेकर माध्वाचार्य, से लेकर ऑल प्रॉफ़ेट्स इन द लास्ट वन थाउज़न्ड इयर्स।
इफ़ यू आर इनसाइड द टेम्पल, यू विल नॉट फ़ील दैट इट इज़ मोर ऑर लेस इंटरैक्शन विद एनी गॉड। इट इज़ ऑल अबाउट, वी आर लिविंग विद दिस कल्चर। वी आर नॉट मच रिचुअल-ड्रिवन। वी डोंट हैव अ फ़ीलिंग दैट देयर इज़ अ गॉड एंड वी नीड टू गो डाउन एंड प्रे फ़ॉर हिम मोर। वी हैव अ कॉम्बिनेशन ऑफ़ अद्वैत एंड द्वैत, एंड समहाउ इट हैज़ स्प्रेड ओवर द स्टेट टू टेक इट फ़ॉरवर्ड।
आचार्य प्रशांत: वैसे, इस पर मैं एक बात आपको जोड़ूँगा, अगर आप अनुमति देंगे तो।
प्रश्नकर्ता: जी।
आचार्य प्रशांत: अद्वैत और द्वैत का कॉम्बिनेशन जैसा वास्तव में कुछ होता नहीं है, क्योंकि अद्वैत में द्वैत पहले ही समाहित है। देखिए, अद्वैत वास्तविकता के तीन तलों की बात करता है, जिसमें जो नीचे के दो तल हैं, वो तो पहले ही द्वैतात्मक हैं। सबसे निचला तल होता है प्रातिभासिक, जिसको आप काल्पनिक कह सकते हो। वहाँ भी द्वैत है, क्योंकि अहंकार है, द्वैत के लिए अहंकार ज़रूरी है। द्वैत के दो छोर होते हैं न, द्वैत माने दो छोर। एक छोर पर हमेशा अहंकार होता है, तभी तो दूसरे छोर पर कुछ होगा। तो अद्वैत में द्वैत के लिए पूरी जगह है। अद्वैत और द्वैत को दो अलग-अलग मानने की ज़रूरत नहीं है।
अद्वैत तीन तलों की बात करता है, जिसमें नीचे के दो तल हैं, प्रातिभासिक और व्यावहारिक। और इन दो तलों पर द्वैत पहले से ही बैठा हुआ है। हाँ, जो आपकी उच्चतम संभावना है, पारमार्थिक, वहाँ पर द्वैत नहीं होता, वहाँ अद्वैत है। तो द्वैत तो अद्वैत में बैठा है। आपको कॉम्बिनेशन करने की कोई ज़रूरत नहीं होती है, अद्वैत तो द्वैत को पूरी मान्यता देता है। वास्तव में, जितनी विधियाँ हैं, वो द्वैत में ही लागू हो सकती हैं। ये जो हमारी सारी बातें हो रही हैं, ये द्वैत में ही हो सकती हैं। भाषा पूरी द्वैतात्मक होती है।
जब तक खाल है, तब तक तो द्वैत रहेगा, क्योंकि खाल है। मान लीजिए, आप कह भी दो, सैद्धांतिक रूप से, कि भीतरी अहंकार मिट गया; लेकिन अभी भी दूरी तो रहेगी न, क्योंकि यह शरीर इस खाल पर समाप्त हो जाता है। आपका शरीर आपकी खाल पर समाप्त हो जाता है। तो आपकी एक सीमा खिंच गई। मेरी एक सीमा खिंच गई। तो अद्वैत द्वैत को पूरी तरह मान्यता देता है। अद्वैत में अलग से द्वैत को मिलाने की कोई ज़रूरत ही नहीं है, क्योंकि अद्वैत में द्वैत निहित है, समाहित है। एक तरह से समझिए कि वह उसका सबसेट है। और अद्वैत कहता है कि द्वैत के तल पर ही ईमानदारी से जी करके तुम पारमार्थिक तल पर प्रवेश पा सकते हो। हम इसको कहा करते हैं, फ़ैक्ट्स आर द डोर टू ट्रुथ।
अहंकार को तो व्यावहारिक तल पर ही जीना है, और व्यावहारिक तल पर तो सब द्वैतात्मक है। मैं हूँ, आप हैं, दो अलग-अलग हो गए न? हो गया द्वैत। मैं हूँ, यह सोफ़ा है। आप हैं, वह माइक है। मैं हूँ, यह माइक है। ये सब द्वैत है। तो द्वैत की पूरी जगह है। और द्वैत के तल पर ही हमें जिज्ञासा करनी है। जितनी विधियाँ हैं, जितने साधन हैं, साधन-चतुष्टय है, उसमें सब द्वैतात्मक ही तो है। वैराग्य कैसे होगा बिना द्वैत के? जिज्ञासा कैसे होगी बिना द्वैत के? तितिक्षा, उपरति कहाँ से आ जाएँगे बिना द्वैत के? मुमुक्षा भी कैसे होगी, अगर द्वैत नहीं है तो?
तो द्वैत तो अद्वैत द्वारा स्वीकार्य है, क्योंकि अहंकार है तो द्वैत होगा। और अहंकार है, तभी तो वह अपनी मुक्ति के लिए यत्न करेगा न। तो इन दोनों को अलग-अलग धारा समझने की ज़रूरत नहीं है। अद्वैत में द्वैत पहले ही विराजमान है।
प्रश्नकर्ता: कुछ भक्तिवादी सिद्धांत और विद्वान का यह भी कहना है, हमने सुना है, कि अद्वैत जो है, डज़ नॉट बिलीव एनी फ़ॉर्म ऑफ़ गॉड, कि कोई रूप नहीं है, कोई आकार नहीं है; निराकार है, अट्रिब्यूटलेस है, कलरलेस है। अद्वैत डज़ नॉट अलाउ स्क्रिप्चर्स लाइक महापुराण, अदर दैन वेद, उपनिषद एंड गीता। अद्वैत डज़ नॉट अप्रूव ऑर अलाउ एनी अदर स्क्रिप्चर्स।
आचार्य प्रशांत: नहीं, अद्वैत क्या करेगा। जो जितने भी पुराण हैं, सब स्मृति के अंतर्गत आते हैं, स्मृति साहित्य के। और श्रुति और स्मृति, दोनों ख़ुद ही कहते हैं कि स्मृति का जो भी वचन श्रुति के विरुद्ध जाएगा, उसको तत्काल अस्वीकार कर दो। तो पुराणों की बातें, जहाँ तक श्रुति-संगत हैं, उनको स्वीकार किया जाएगा। और पुराण की कोई बात हो, कोई श्लोक हो, कोई कथा हो, अगर वह श्रुति का, माने वेदांत का और उपनिषद् का उल्लंघन करेगी, तो यह नियम है कि उसको आपको अस्वीकार करना पड़ेगा। यह सनातन का नियम है। यह कोई अद्वैत की हठ नहीं है, यह नियम है कि श्रुति अपौरुषेय होती है। स्मृति तो इंसान ने बनाई है। स्मृति में आपके ये सब धर्मशास्त्र आ गए, धर्मग्रंथ आ गए, आपके इतिहास-ग्रंथ आ गए, और आपके पुराण आ गए। यह सब स्मृतियों में गिने जाते हैं। और स्मृतियाँ अस्वीकार करी जा सकती हैं।
स्मृतियों को हम ज़रूर स्वीकार करेंगे, स्मृतियों में भी सौंदर्य हो सकता है यदि वो श्रुति का अनुगमन करती हों। स्मृति श्रुति का अनुगमन करेगी, तो स्वीकार है। पर स्मृति अगर श्रुति का उल्लंघन करेगी, तो श्रुति को ऊपर रखकर स्मृति को तत्काल अस्वीकार करना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता: जी। आचार्य प्रशांत की नज़र से आचार्य प्रशांत क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़रूरत नहीं पड़ती है। प्रश्न अप्रासंगिक है। आपकी नज़र से मैं क्या हूँ? आपके लिए उपयोगी, वह है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। मैं आपसे गीता कार्यक्रम से तीन साल से लगभग जुड़ी हूँ। सर, मेरा क्वेश्चन है TWA (ट्रुथ विदाउट अपॉलजी) चैप्टर 144 से। सर, आप बोलते हैं वहाँ पर, फ़्रीडम फ्रॉम बॉन्डेज़ इज़ व्हॉट वी ऑल हैव टू लिव फ़ॉर, कॉन्शस्ली ऑर अनकॉन्शस्ली। द डिफ़रेंस अमंग पीपल देन लाइज़ इन द पाथ दे टेक फ़ॉर देयर लिबरेशन।
सर, मेरा क्वेश्चन है इसमें। सर, मेरे आसपास के लोग, और जब मैं ख़ुद को देखती हूँ, मैं मुक्ति के बारे में सोचती ही नहीं हूँ। जैसे अपनी सभी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करना, अपनी फैमिली के कुछ कर्तव्यों को पूरा करना, और इसी में लगी रहती हूँ। फिर कैसे कहा जा सकता है कि हम सब किसी-न-किसी तरह आज़ादी के लिए जी रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: नहीं, आज़ादी के लिए ही जी रहे हैं। पर जैसा आपने उद्धृत करा न कि कॉन्शस्ली ऑर अनकॉन्शस्ली। अनफ़ॉर्चुनेटली, इट इज़ मोर अनकॉन्शस्ली दैन कॉन्शस्ली। बात समझ रहे हैं? मोर अनकॉन्शस्ली दैन कॉन्शस्ली।
जैसे अभी बात हो रही थी कि पैसा कमाना है, पैसा कमाना है। इस महीने का या इस क्वार्टर का मुझे रेवेन्यू टारगेट पूरा करना है। जो भी व्यक्ति जो कुछ भी कर रहा है, वह कर तो इसीलिए रहा है क्योंकि उसका अहंकार छटपटा रहा है। लेकिन ज़रूरी नहीं है कि आप जो कर रहे हो, उससे उस छटपटाहट को शांति मिलेगी ही। अगर आपने उस छटपटाहट को सिर्फ़ अनुभव करा है, तो आप जो करोगे, वह छटपटाहट को और बढ़ाएगा। लेकिन आपने अगर अपनी छटपटाहट, अपनी बेचैनी को सिर्फ़ अनुभव ही नहीं करा है, समझा है, तो आप जो करोगे, उससे वह बेचैनी घटेगी। इन दोनों बातों में ज़मीन-आसमान का अंतर है। मैं दोहराता हूँ आपके लिए।
आप बेचैन रहते हो भीतर से? सब रहते हैं। जो पैदा हुआ है, वह बेचैन है। इसीलिए नींद अच्छी लगती है, क्योंकि नींद में, जब सोते हैं, तो कुछ घंटों के लिए चैन मिल जाता है, शांति मिल जाती है। इसीलिए जब सोकर उठते हैं, तो कहते हैं, “बड़ा तरोताज़ा हो रहा है अनुभव।” यह बेचैनी अनुभव तो सबको हो रही है, लेकिन अनुभव करने का मतलब जानना या समझना नहीं होता। ठीक वैसे जैसे आप अपना पेट-दर्द अनुभव करते हो, पर क्या आप जानते हो कि पेट में दर्द क्यों हो रहा है? वह डॉक्टर बताता है। अनुभव तो करते हो, पर जानते नहीं हो कि यह पेट-दर्द चीज़ क्या है।
वैसे ही अहंकार एक बेचैनी का नाम है, जिसको सब अनुभव करते हैं। और अनुभव करने के कारण ही हम पूरी ज़िंदगी वह करते रहते हैं, जो हम करते हैं। कोई इधर को दौड़ रहा है, कोई उधर को दौड़ रहा है, कोई कूद रहा है। कोई किसी रिश्ते में घुस रहा है, कोई किसी नौकरी में घुस रहा है। कोई कहीं जाकर दोस्तियाँ बना रहा है। कोई राजनीति में जा रहा है। कोई मंदिरों की तरफ़ जा रहा है। कोई कह रहा है, “नहीं, अब मैं नास्तिक हो गया।”
यह सब जो तरीके हैं, यह अपनी बेचैनी को अनुभव करने के कारण ही हैं। लेकिन हमें भ्रम यह हो जाता है कि अगर मेरी बेचैनी मुझे अनुभव हो रही है, तो मैं उस बेचैनी को समझता भी हूँ। नहीं, समझते नहीं हैं हम, समझते नहीं हैं। जब आप अपनी बेचैनी को समझोगे, तो उससे बिल्कुल एक अलग तरह का कर्म पैदा होगा, क्योंकि वह एक अलग केंद्र, एक अलग कर्ता से आ रहा है। समझ एक अलग केंद्र होती है। तो सबसे नीचे क्या है? हमारे जीवन का, हमारे कर्मों का जो ड्राइवर है, जो चालक है, वह क्या है? वह तो बेचैनी ही है। बेचैनी ही है। लेकिन बेचैनी को हम दो तरीके का treatment दे सकते हैं। बेचैनी के साथ हमारा दो तरह का रिश्ता हो सकता है।
एक क्या रिश्ता है? मैंने आपसे क्या बोला? कि आप बेचैनी को सिर्फ़ अनुभव करते हो। बेचैनी तो है। एक आदमी है, जो उसे सिर्फ़ अनुभव करता है। दूसरा आदमी है, जो सिर्फ़ अनुभव करने पर रुक नहीं जाता। वह कहता है, “अनुभव हुई है कोई बात, तो उसको समझूँगा भी कि वह बात क्या है।” अब यहीं पर सारा अंतर आ जाता है। जिसने सिर्फ़ अनुभव करा है, वह बिल्कुल एक गलत दिशा में चल देगा। तो जिन से अब आपको एक पागलपन भीतर से उठता है। दर्द हो रहा है, दर्द हो रहा है। दर्द क्यों हो रहा है? किस दिशा जाना है? आपको पता नहीं। पर क्योंकि दर्द हो रहा है, तो आप दौड़ पड़ते हो। यह है अनकॉन्शस ऐक्शन। यह भी आया दर्द से ही है।
पर दूसरा है कि दर्द हो रहा है, और मैं जानता हूँ कि यह दर्द क्या है। क्योंकि मैं इस दर्द को जानता हूँ, तो मैं इसकी दवा भी जानता हूँ। यह है कॉन्शस ऐक्शन।
तो आपको अपने बारे में यह आत्मविश्वास छोड़ना पड़ेगा कि अपने सब अनुभवों को आप जानते भी हो। मान्यताएँ होती हैं न, वो आपको ज्ञान से रोक देती हैं। सिर्फ़ इसलिए कि आप किसी चीज़ से परिचित हो, किसी बात का आपको अभ्यास है, किसी बात का आपको बार-बार अनुभव हो रहा है, आप उस चीज़ को जान नहीं गए। हो सकता है किसी चीज़ का आपको दिन में सत्तर बार अनुभव होता हो। तो आप जान गए क्या? हो सकता है कि आप साँस लेती हैं, लगातार साँस लेती हैं। क्या आप जानती हैं कि किस तरह से फेफड़े इस हवा में से ऑक्सीजन को निकाल लेते हैं और फिर खून तक पहुँचा देते हैं? अनुभव तो लगातार हो रहा है, पर जानते तो कुछ नहीं हैं न।
इसीलिए जब लंग कैंसर होगा, तो आपको पता भी न चले। फिर डॉक्टर ही बताएगा कि, “अरे, लंग कैंसर है, आगे बढ़ गया।” साँस तो आप ले रही थीं रोज़-रोज़। लंग कैंसर डॉक्टर को क्यों बताना पड़ा? क्योंकि अनुभव लेना और जानना एक ही बात नहीं होते। आप बात समझ रहे हैं?
कितने ही शब्द हैं, जिनका आप इस्तेमाल हर समय करती रहती हैं। उदाहरण के लिए, प्रेम। बताइए, प्रेम क्या है? पर आप दिन में सौ बार “प्रेम” शब्द का उपयोग करती होंगी। आप जान नहीं गईं उपयोग करने से। पैसा, कैरियर, जीवन, संबंध, ईश्वर, स्वर्ग, नर्क, मुक्ति, यह सब शब्द हैं, जिनका इस्तेमाल आप दिन भर करते हो। करते हो कि नहीं करते हो? रिलेशनशिप, जॉब, मनी, करियर, रिस्पॉन्सिबिलिटी। रिस्पॉन्सिबिलिटी! बाप रे बाप, कितना भारी शब्द है, रिस्पॉन्सिबिलिटी! इसका इस्तेमाल आप हर समय कर रहे होते हो। पर क्या आप रिस्पॉन्सिबिलिटी का मतलब समझते हो?
तो आप जिस चीज़ के अभ्यस्त हो, जिस चीज़ का आप खूब अनुभव लेकर बैठे हो, ज़रूरी नहीं है कि आप उसे जानते हो। बल्कि ज़्यादा संभावना यह है कि जिस चीज़ का आपको जितना अभ्यास और जितना अनुभव है, आप उसे उतना कम जानते होओगे। और इसीलिए हम सबके ऐक्शन्स अनकॉन्शस होते हैं। अभ्यास और अनुभव हमें यह भ्रम दे देते हैं। हमें इस भुलावे, धोखे में डाल देते हैं कि हमें कुछ पता है, जबकि पता हमें कुछ नहीं है। हमें सिर्फ़ अभ्यास हो गया है। हमें सिर्फ अनुभव हो गया है। अनुभव से आप कुछ जान नहीं गए। अभ्यास से आप ट्रेन्ड हो गए हो, रियलाइज़्ड नहीं हो गए। किसी को किसी चीज़ में ट्रेन कर देना और किसी को किसी चीज़ की अंडरस्टैंडिंग दे देना, दोनों एक ही बात नहीं हैं। इन दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है। ट्रेनिंग देकर आप मैकेनिक बना सकते हो, पर मैकेनिक जिस चीज़ पर काम कर रहा है, वह चीज़ क्या है, यह साइंटिस्ट जानता है। हम लोग ज़्यादातर मैकेनिक की तरह जीते हैं। यह अनकॉन्शस ऐक्शन है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चरण-स्पर्श, प्रणाम। माइसेल्फ़ डॉक्टर श्रीनिवास कटवारे। फ़र्स्ट क्वेश्चन, मैनी पीपल आर सेइंग, “विदाउट डूइंग पूजा, आइ नेवर टेक अ ड्रॉप ऑफ़ वाटर। पूजा करने से पहले मैं एक भी बूँद पानी नहीं लेता हूँ।” यह उनका अहंकार है या समर्पण?
सेकंड क्वेश्चन...
आचार्य प्रशांत: एक-एक करके, एक-एक करके। मैं याद नहीं रख पाऊँगा। आप जो बोलते हो न, उस पर बस उसी समय तात्कालिक मेरी ओर से एक उत्तर आता है। स्मृति में मैं कुछ नहीं रख पाता।
“पूजा करे बिना जल की बूँद भी न लेना,” बड़ा गहरा और बड़ा सुंदर प्रतीक है। दुर्भाग्य की बात यह है कि लोगों ने इसका अर्थ नहीं समझा और इसको बस भौतिक तल पर लागू कर दिया। अहंकार प्यासा होता है। प्यासा कौन है? शरीर नहीं, अहंकार। ठीक है? उसको जो ज़रूरत है, वह सिर्फ़ भौतिक चीज़ों की नहीं है। भौतिक चीज़ों की ज़रूरत किसको होती है? शरीर को होती है। अहंकार को आप कोई भी भौतिक चीज़ दे दो, उसके ख़ज़ाने भर दो, फर्नीचर भर दो, गाड़ियाँ भर दो, इमारतें भर दो, राज्य भर दो, उसको चैन नहीं मिलता। अहंकार प्यासा है।
अहंकार किसके लिए प्यासा है। अहंकार उसके लिए प्यासा है, वह एकमात्र जो सचमुच पूजनीय है। उसको सत्य बोलते हैं। तो जब कहा जाता है कि पूजा करे बिना पानी की बूँद भी मत लेना, तो उससे आशय यह है कि सत्य ही है एकमात्र जो अहंकार की प्यास बुझा सकता है। और सत्य को अगर तुम जीवन में नहीं ला रहे, तो बाक़ी तुम अपने आप को जो कुछ भी दे रहे हो, व्यर्थ है। उसको मत लेना।
इसका मतलब यह नहीं है कि ज़िंदगी झूठ में बिता रहे हो और अगर पानी नहीं पी रहे, पूजा कर रहे हो, तो इससे तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। इससे कोई कल्याण नहीं होगा। उसका जो गहरा संकेत है, वह समझना पड़ेगा। पूजा किसकी हो सकती है? मात्र सत्य की। वही तो पूजनीय है। अहंकार को वही तो चाहिएक् उसी का तो प्रेम है अहंकार को। तो उसको पूजो, और उसको पूजे बिना किसी भौतिक वस्तु की ओर मत भागो। यह है संकेत।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद। कुछ देर से पहले हम लोग यह बात कर रहे थे कि “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति”। एंड यू सेड दैट वी आर ह्यूमन, सो कुमाता कैन बी देयर। कुमाता कैन बी अवेलेबल इन द सोसाइटी। सो कैन वी थिंक दिस, ऐज़ पर द प्रेज़ेंट रिक्वायरमेंट, कैन वी चेंज द रूल्स एंड रेगुलेशन्स ऑफ़ पुराणस एंड वेदस, व्हाट वी आर फ़ॉलोइंग फ्रॉम एजेस?
आचार्य प्रशांत: नहीं, यह जो बात है, यह आज की नहीं है, यह बात सदा की है। ऐसा नहीं है कि प्रेज़ेंट टाइम में ही माता कुमाता होने लगी है। माता सदा कुमाता हो सकती है। और वेद, वेदांत, उपनिषद् आपसे कभी भी नहीं कहेंगे कि माता कुमाता नहीं हो सकती। कभी भी नहीं कहेंगे। यह सब तो बाक़ी बातें जो हैं, ये सब स्मृतियों से आ जाती हैं।
प्रश्नकर्ता: एंड, सर, पर्टिकुलर्ली, कैन वी चेंज द रूल्स एंड रेगुलेशन्स व्हाट वी आर फ़ॉलोइंग फ़ॉर इयर्स एंड इयर्स।
आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं। चेंज की बात नहीं। आपकी पहली बात यह थी कि मॉडर्न कॉन्टेक्स्ट में शायद माता कुमाता होने लगी है।
प्रश्नकर्ता: मैनी रूल्स आर देयर। वी आर फ़ॉलोइंग।
आचार्य प्रशांत: एवरीथिंग। चेंज करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है, क्योंकि मनुष्य आज जैसा है, वैसा ही हमेशा से था। जो नियम हैं, उनके साथ समस्या यह नहीं है कि इंसान बदल गया है, इसलिए नियम बदलो। समस्या यह है कि आपने नियम न आज समझे, न पहले समझे।
जैसे बहुतों को लगेगा कि पहले के लोग बहुत अच्छे होते थे, आज के लोग बहुत ख़राब हैं। खूब सुनते हैं न आप इस तरह की बातें, “अरे, पहले के लोग और होते थे, आज के लोग खराब हैं।” नहीं, मनुष्य पहले भी भ्रष्ट था, मनुष्य आज भी भ्रष्ट है। जैसे आपसे बहुत लोग बोलते हैं कि, “अरे, पहले की यह चीज़ दूसरी होती थी, पहले का यह दूसरा होता था।” नहीं, मनुष्य जैसा रहा है वृत्तियों से अपनी पहले, आज भी वैसा ही है। हाँ, बस आज के विषय बदल गए हैं, बाहरी विषय बदल गए हैं भीतरी वृत्ति नहीं बदल गई है। तो जो सनातन बातें हैं, उन सनातन बातों को आपको समझना है।
नियम बदलने की कोई बात नहीं है, क्योंकि नियम वही बदलना पड़ता है जो काल-सापेक्ष हो। जो काल पर आश्रित नियम हो, उन्हीं को बदलने की ज़रूरत पड़ती है। पर काल पर आश्रित नियम मैं मानूँ ही क्यों? यदि मैं सनातन सत्य में जी रहा हूँ, तो मुझे काल पर आश्रित किसी नियम को मानने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। मुझे करना क्या है? नियम बदलने की कोई बात नहीं है। बात यह है कि जो सनातन तथ्य है, आप उसको समझें। और वह यह है कि अहंकार तो अहंकार ही होता है। इसीलिए माता को कुमाता होना पड़ता है। पिता को कुपिता होना पड़ता है। पुत्र को कुपुत्र होना पड़ता है।
मैं शब्दों को थोड़ा तोड़-मरोड़ रहा हूँ, पर समझाने के लिए। क्योंकि अहंकार कु-अहंकार ही होता है। तो इसीलिए पुत्री को भी कुपुत्री होना पड़ता है, और पति को कुपति होना पड़ता है, और राजा को कुराजा होना पड़ता है। क्योंकि ये जितने भी हमने बोले, ये सब हैं तो मूलतः अहंकार ही न। मनुष्य हैं, तो अहंकार है। तो उसको ठीक कर लीजिए, बाक़ी बाहरी नियम-कायदे बदलने से कोई बहुत लाभ नहीं होने वाला। अहंकार को ठीक कर लीजिए, पूरी दुनिया ठीक हो जाएगी। पहले भी यही बात लागू होती थी, आज भी वही बात लागू होती है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आपको कला, संस्कृति और मंदिरों का राज्य ओडिशा में स्वागत है। जैसे हमारा देश आज एक ऐसी तरफ़ जा रहा है, जब हम एक सीमा तक विकसित भारत के लक्ष्य में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन यह देश विकसित तब तक नहीं हो सकता, जब तक हमारा 60% युवा अपने दम पर कुछ न कर ले। जैसे मैं गाँव से आता हूँ, वहाँ के लोग अभी भी कहते हैं कि यह सरकार ऐसी है, यह सरकार ऐसी है। इसने इतना घोटाला कर दिया है, उसने इतना घोटाला कर दिया है। लेकिन आज का युवा यह समझ सकता है कि जब तक युवाओं ने अपनी हिम्मत से कुछ नहीं किया, तब तक यह देश विकसित नहीं हो सकता।
इसीलिए मेरा सवाल आपको यह है कि क्या आप कुछ ऐसी बात बता सकते हैं, जो आज की हर युवा पीढ़ी फॉलो कर सकती है और भारत के विकसित होने के संदर्भ में अपना कुछ कर सकती है?
धन्यवाद।
आचार्य प्रशांत: तो अभी तक जो सारी बातें हुईं, वह किसके लिए थीं? अभी तक जितनी बातें बोलीं, वह किसके लिए थीं? अब मैं युवाओं के लिए अलग से क्या बताऊँगा? युवा मनुष्य नहीं है क्या? सारी बातें मनुष्यों के लिए कर रहा हूँ, मनुष्य मात्र के लिए कर रहा हूँ। अहंकार उसी में तो होता है। तो युवा कुछ मनुष्य से अलग होता है क्या? जो बात है, वह बच्चे, बूढ़े, जवान, स्त्री, पुरुष, सब पर एक बराबर लागू होती है। युवर के लिए कुछ अलग से नहीं बोला जाता, बेटा। अब क्या करें?
वह बात आज से दो हज़ार साल पहले जितनी लागू थी, वह बात आज भी उतनी ही लागू है। वह बात अफ्रीकी पर जितनी लागू होती है, चीनी पर भी उतनी ही लागू होती है। वह बात पंद्रह साल वाले पर जितनी लागू होती है, पचासी साल वाले पर भी उतनी ही लागू होती है। तो युवाओं के लिए, या भारतीय युवाओं के लिए, या ओडिशा के युवाओं के लिए कुछ अलग से नहीं बोला जाता। हम सब मनुष्य हैं, पहले यह ध्यान रखो। बाक़ी सारे जो भेद हैं, वे सतही हैं, नकली हैं। स्त्री हो, पुरुष हो, या कोई हो, इंसान है, मनुष्य की चेतना है। और उसका एक ही बंधन होता है, अविद्या, अज्ञान, अपने बारे में बड़ा आत्मविश्वास। उसी से मुक्त होना है। यही संदेश है युवाओं को भी।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। काश आप यहाँ पर होते। आपसे मिल पाते, तो फिर शायद...
आचार्य प्रशांत: अरे, हूँ। पूरी तरह हूँ।
प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न यह है, सबके मूल में अहंकार है, और अहंकार को यदि मैं निकाल दूँ, तो मैं रहूँगी क्या?
आचार्य प्रशांत: अहंकार को मैं निकाल दूँ, माने कौन निकाल देगा?
प्रश्नकर्ता: मैं, या हम कोई भी।
आचार्य प्रशांत: कोई भी माने क्या? मैं समझ रहा हूँ बात को। पर अहंकार आपका कोई विषय नहीं है, अहंकार आपका ऑब्जेक्ट नहीं है। “अहंकार को मैं निकाल दूँ” यह प्रश्न ऐसा ही है कि अहंकार को अहंकार निकाल दे। मैं ही तो अहंकार है। “अहंकार को मैं निकाल दूँ,” ऐसा थोड़ी है कि अहंकार कहीं ट्यूमर हो गया, उसको सर्जरी से निकाल देंगे। ये जो बोल रहा है, यही अहंकार है। ये अभी जो ऐसे सिर हिला रहा है, जो नॉडिंग कर रहा है, यही तो अहंकार है। जो मुस्कुरा रहा है।
प्रश्नकर्ता: इसको संभालने की बात आपने की थी।
आचार्य प्रशांत: नहीं, इसको संभालने की नहीं। इसको जानना। मुझे ही जानना है मुझको ही। मुझे ही जानना है मुझको ही। यह नहीं कहना है, “मैं अहंकार को जानना चाहती हूँ।” ऐसा लगता है फिर अहंकार जैसे इस टेबल पर रखा कोई मग है। जैसे कोई बाहर की वस्तु है, जैसे मुझसे अलग कोई विषय है। नहीं, नहीं, नहीं, मैं ही अहंकार हूँ। अहंकार को ऑब्जेक्टिफ़ाई मत करिए, वह सब्जेक्ट है। उसे विषय मत बनाइए। वह विषयता है। उसे दृश्य मत बनाइए, वह दृष्टा है। मैं ही अहंकार हूँ। और मुझे स्वयं को ही जानना है। इसीलिए उसको बोलते हैं आत्मज्ञान। आत्मज्ञान माने आत्मा को जानना नहीं होता। आत्मज्ञान माने अहंकार को जानना ही होता है। और उसकी विधि होती है, आत्म-अवलोकन।
अहंकार को कैसे देखें? सारी अपनी हरकतें देखकर। क्योंकि हमारी सारी हरकतें करने वाला तो अहंकार ही बैठा है। हमारी जो हरकतें होती हैं न, वो कोई प्राकृतिक नहीं होतीं। हमारी हरकतें प्राकृतिक अधिक-से-अधिक बस हो सकती हैं, जब हम सो रहे हैं। आप सो रहे हैं, आपने करवट बदल ली। आप सो रहे हैं, आपका हाथ ऐसे चला गया। तब तो आप कह सकते हो कि आप प्राकृतिक हो। आप जब जगे होते हैं न, तो सक्रिय हो जाता है अहंकार। सारी हरकतें वही कराता है।
तो अहंकार को जानने के लिए उसकी हरकतों को देख लो। देखो कि वह क्या बोल रहा है। देखो, वह क्या सोच रहा है। देखो, किधर को वह अपने कदम बढ़ा रहा है। देखो, किसकी बात मान रहा है। देखो, कहाँ सिर झुका दिया। देखो, कहाँ डर गया। देखो, क्या इच्छाएँ कर रहा है। बस, ऐसे जाना जाता है अहंकार को। और अहंकार को जानना माने स्वयं को जानना। मैं और अहंकार दो अलग-अलग बात नहीं हैं।
अक्सर हम यह भूल कर देते हैं। हम ऐसे ही कहते हैं कि “मैं अपना अहंकार समाप्त करना चाहता हूँ।” “मैं अपना अहंकार...” तो ऐसे ही हो गया जैसे, “मैं अपना पेन उधर रखना चाहता हूँ।” अहंकार आपका पेन नहीं है। अहंकार आपका केंद्र है। अहंकार आपकी हस्ती है। अहंकार ही है जो आपके मुँह से बोल रहा है। अहंकार ही है जो आपकी आँखों से देख रहा है। आप ही अहंकार हैं।
प्रश्नकर्ता: सो, आचार्य जी, फ़ाइनली वी विल ट्राइ टू लिव अ लाइफ़ विदाउट ईगो। कोशिश तो ज़रूर करेंगे। होगा, नहीं होगा पता नहीं।
आचार्य प्रशांत: “वी विल ट्राइ टू लिव अ लाइफ़ विदाउट ईगो” कुछ नहीं होता। क्योंकि आप अभी भी कह रहे हैं, ईगो नहीं होगी, मैं होऊँगा। और “मैं” नहीं होऊँगा, “वी” होगा। “वी” क्या होगा? ईगो के बिना लाइफ़ मात्र होती है। कोई उसे जीने वाला, लिवर, नहीं होता। देयर इज़ लाइफ़, बट नोबडी लिविंग। एंड देन देयर इज़ लाइफ़ टोटल, लाइफ़ होल, लाइफ़ कम्प्लीट, लाइफ़ प्योर एंड लाइफ़ ब्लिस्फ़ुल।
प्रश्नकर्ता: मेरा पर्सनली मानना है कि यह जितनी भी किताबें आचार्य जी ने लिखी हैं, यह हर किसी को सशक्त कर रही हैं। यह जो अंदर का डर है, जो कन्फ्यूज़न है, कहीं-न-कहीं जो लगता है, इट्स द पावर ऑफ़ अद्वैत। और आचार्य जी, आपका जो इंटरप्रिटेशन है, उस इंटरप्रिटेशन में कुछ मैजिक तो है, बिकॉज़ दैट इज़ हाउ मोर दैन सिक्स्टी मिलियन पीपल आर ट्रैकिंग यू टू नो इट। और आज के लिए हम आभारी हैं। ऑब्लाइज़्ड हैं कि आपके साथ इतना बात हो पाया। क्योंकि हम लोगों ने जितनी क्वेरीज़ मिली थीं, हमको यह मंथन कार्यक्रम करने से पहले, हर किसी ने फ़ोन करके आपको ही ढूँढ़ा था।
आचार्य प्रशांत: मैं पूरी कोशिश करूँगा फिर आने की, और सम्मुख बैठ पाऊँ, साथ बात हो पाए पूरी। इस बार भी आने वाला था, कुछ कारण हो गए। लेकिन अभी जनवरी में आया था, कोशिश करूँगा कि फिर से ओडिशा आ पाऊँ। सबसे बात हो पाए, सामने की।
प्रश्नकर्ता: जी, धन्यवाद। धन्यवाद, आचार्य प्रशांत जी।