नैहरवा हमका न भावे हमका न भावे, नैहरवा… नैहरवा नैहरवा, नैहरवा नैहरवा
साईं की नगरी… परम अति सुन्दर जहाँ कोई आवे न जावे चाँद सूरज जहाँ पवन न पानी कौ संदेसा पहुँचावे दरद यह साईं को सुनावे नैहरवा…
आगे चले पंथ नहीं सूझे पीछे दोष लगावे केहि बिधि ससुरे जाऊँ मोरी सजनी बिरहा जोर जरावे विषय रस नाच नचावे दरद यह साईं को सुनावे नैहरवा…
बिन सतगुरु अपनों नहीं कोई जो यह राह बतावे कहत कबीरा सुनो भाई साधो सपने न प्रीतम आवे तपन यह जिया की बुझावै नैहरवा…
मुझे मायके के घर में कोई दिलचस्पी नहीं है। मेरे प्यारे का शहर सबसे खूबसूरत है, जहाँ कोई आता-जाता नहीं है। वहाँ चाँद, धूप, हवा या पानी भी नहीं है। वहाँ मेरा सन्देश कौन ले जाएगा? फिर मेरा दर्द मेरे प्रियतम को कौन बताएगा? मुझे मायके के घर में कोई दिलचस्पी नहीं है।







