आचार्य प्रशांत: आत्मा है, और आत्मा का विस्तार है। आत्मा बिंदु-मात्र है, सूक्ष्मतम; और जैसे-जैसे विस्तार हो जाता है उस बिंदु का, वैसे-वैसे स्थूलता बढ़ती जाती है।
तो जिसको हम शरीर कहते हैं और जिसको हम मन कहते हैं, वो वास्तव में एक ही विस्तार के दो नाम हैं; वो एक ही विस्तार की दो सीमाएँ हैं, दो हदें हैं, डिग्रीज़ हैं। विस्तार अगर कम हुआ है, न्यून हुआ है, तो हम शरीर को नाम दे देते हैं मन, और विस्तार अधिक हो गया है तो हम नाम दे देते हैं शरीर; और विस्तार जब अतिशय हो जाता है तो हम नाम दे देते हैं संसार।
इन तीनों को एक साझा नाम दिया जा सकता है - देह, शरीर। मन, शरीर, संसार - तीनों को एक साझा नाम दिया जा सकता है। और वो साझा नाम बहुत जगह पर दिया भी जाता है; कभी वो साझा नाम होता है शरीर, और कभी वो साझा नाम होता है मन। चाहो तो कह दो कि दो ही हैं - मन और आत्मा; और चाहो तो कह दो कि दो ही हैं - शरीर और आत्मा।
तो शरीर की स्थूलता का कम होना अब देखो क्या अर्थ ले लेता है। दो ही हैं, शरीर और आत्मा, और शरीर सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भी हो सकता है और अतिशय स्थूल भी हो सकता है। तुम्हारे लिए क्या अच्छा है, शरीर कैसा रहे? सूक्ष्म-से-सूक्ष्म। क्योंकि शरीर जितना सूक्ष्म होता जाएगा, उतना तुम कहाँ पहुँचते जाओगे? आत्मा के निकट।
(हाथ की तर्जनी उँगली की ओर इशारा करते हुए) आत्मा को ऐसे अगर एक केंद्र-बिंदु मानो, अब यहाँ से विस्तार होना ऐसे शुरू हुआ है। जितना तुम दूर हो इस केंद्रीय बिंदु से, उतना ज़्यादा विस्तार कैसा हो गया है? स्थूल।
जैसे तुम किसी शांत, स्थिर तालाब में एक पत्थर डाल दो तो लहरें उठती हैं न? और लहर जितनी दूर जाती जाती है, उतना ही घेरा बढ़ता जा रहा है, केंद्र से दूरी भी बढ़ती जा रही है; और जो उसमें उतार-चढ़ाव हैं, तमाम तरह के विक्षेप हैं, वो भी बढ़ते जा रहे हैं। और एक बिंदु तो ऐसा आता है जब दूर जाते-जाते जो लहर है गोल, वो विलुप्त ही हो जाती है; वो किसमें मिल जाती है? पूरे तालाब में मिल जाती है।







