मोह भय में मरे, प्रेम चिंता न करे || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

वक्ता: रोहित ने कहा कि छिन जाने के डरों में एक डर ये भी है कि जो हमारे जो परिवार के लोग हैं, हमारे प्रियजन हैं, उन्हें कुछ हो न जाये, वो न छिन जायें । तो रोहित का सवाल है कि क्यों है ये डर? और आगे फिर निःसंदेह ये भी होगा कि कैसे सामना करें?
रोहित हमने लगाव जाना है; लगाव मतलब ‘लग जाना’, अटैचमेंट । प्रेम हमने जाना नहीं । जिन लोगों के प्रति ये डर है कि उन्हें कहीं कुछ हो न जाये – ये डर हम सबको लगता है – ईमानदारी से पूछो, क्या अभी, ठीक इसी पल, आज उनसे संबंध स्वस्थ हैं ? वही हैं जो होने चाहिए? कल उन्हें कुछ हो न जाये इसकी तो हमें बड़ी चिंता सताती है, सताती है न? कल उन्हें कुछ हो न जाये, कल माने भविष्य । आज क्या चल रहा है कभी ये भी देखा? जीवित क्या है, वर्तमान या भविष्य…?
सभी श्रोतागण: वर्तमान ।
वक्ता: भविष्य की चिंता करना बड़ा सुविधापूर्ण है, “मेरे मरने के बाद मेरे बीवी-बच्चों का क्या होगा, चलो इंश्योरेंस खरीद लेता हूँ ।” बड़ी चिंता लगी, बड़ी फ़िक्र लगी, डर उठा तो मैंने क्या समाधान निकाला…?
सभो श्रोतागण: इंश्योरेंस ।
वक्ता:



