
Jesus is not a hater of persons. He is saying hate the way you have become. The Bible is not a document of hate, the central message is of Love. But when we love, we chain each other. When God loves us, He sets us free. So Jesus is saying to hate the way we relate to each other — because our love is not Godly. Love each other just as God the Father has loved you.

We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?

किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?

Especially in the modern world, unfortunately, a degree of constant anxiety has become an almost normalized state for us. A large portion of our mental health problems as a collective is very much about anxiety and fear. Burn-outs, career pressures, problems with self-esteem, fear of others, stress about studies etc.—all…

Research has shown that loneliness is found throughout the society, including among people in marriages along with other strong relationships, and those with successful careers. As a subjective emotion, people experience loneliness even when surrounded by other people.

Love is great. Love is necessary. Love is beautiful.
But what is love?
For most of us, love is the greatest excitement and comfort—and also the greatest suffering. Whether love has become a problem or something you cherish the most in your life, please go deeper into the matter. Know…

Man has always been attracted to the new. But attraction alone is not enough, especially when one is resistant to leaving the old ways. 'New' comes with an opportunity to change, and equally with a responsibility to act upon that change. Bridging this gap between attraction and action, Acharya Prashant guides us with practical resolves that possess the potential to bring real development—if followed honestly!

Spirituality is about belonging to existence. Not belonging to a narrow household, or caste or ideology. All these are boundaries. So, wherever there are boundaries, there is violence. Wherever there are boundaries, there is also the fear of being small, powerless, limited. The really non-violent one is at home, everywhere and in every situation. Non-violence is not about following duties. Non-violence is an action in clarity and love. That alone is non-violence.

Questioner: Would you please be able to explain to us the difference between the mind, the soul, the spirit, and consciousness?
Acharya Prashant: There is just consciousness; that consciousness requires physical support. That consciousness requires a physical support, right? That physical support is called: the man.
When we say consciousness,…

नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं और महिषासुर को बाहर का कोई दैत्य मान लेते हैं। पर दुर्गा सप्तशती का दूसरा चरित्र हमारी अपनी वृत्ति की कथा है। जो मन प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मानता है, जंगल काटता है, नदियाँ दूषित करता है, पशुओं को खाता है और कहता रहता है कि मुझे और चाहिए, वही महिषासुर है। त्यौहार उसी के वध के लिए है, उसे भोग लगाने के लिए नहीं। क्या इस नवरात्रि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानेंगे?

किसी के क्रोध पर चोट करो तो क्रोध पाँच गुना हो जाता है। दो गुटों की लड़ाई में एक मारा जाता है तो बीस और खड़े हो जाते हैं। दुर्गा सप्तशती का रक्तबीज यही है: हर बूँद से एक नया असुर। रक्तबीज कोई ख़ास असुर नहीं, हमारे अहंकार की प्रतिक्रियात्मकता है। उस पर चोट करने से वो और बड़ा होता है, क्योंकि किसी को ‘तुम बुरे हो’ कहना भी उसे ‘तुम हो’ कहना है। काली उसे खा लेती हैं, यानी अहंकार प्रकृति से अलग नहीं रह जाता। तो क्या हम देख सकते हैं कि जिसे हम ‘मैंने किया’ कहते हैं, वो कौन कर रहा है?

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

संसार में तुम जिस भी चीज़ को शांति का,तृप्ति का साधन बनाओगे वो चीज़ बेचारी असफल हो जाएगी। तुम उसे भोगकर के कुछ और कर देते हो। तो फिर कौन है जो तुम्हें सन्तुष्टि दे सकता है? सिर्फ़ वो जो तुम्हारे स्पर्श से कहीं आगे का हो। तुम्हारा स्पर्श उस पर कोई दाग ही न लगा पाये, जो अस्पर्श्य हो। ऐसे किसी को ही सत्य कहा गया है, परमात्मा कहा गया है। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उस पर हावी नहीं हो सकते। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उसे बदल नहीं सकते।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

प्रश्नकर्ता: एक चीज़ होती है मेंटल एजिलिटी (मानसिक चपलता), जैसे कि मैं कहीं बाइक से जा रहा हूँ और अचानक कोई मोड़ आ गया या एक कुत्ता बीच सड़क पर आ गया, तो मुझे एकदम से ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ी। तो ये जो स्किल (कौशल) होती है एकदम से …

प्रश्नकर्ता: अगले प्रश्नकर्ता आपके साथ गोवा शिविर में भी थे और वहीं से ही वे उद्धृत करते हैं। आपने कहा था, ‘आदमी वास्तव में जान जाए उनके ऊपर कौन है। तो आगे लिखते हैं कि आचार्य जी, इस बात को मैं कैसे समझूँ और जान पाऊँ कि ज़िन्दगी निजी भोग…

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

जीवन में जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचे अनुभव हों, उनको एक सीमा से ज़्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। और जो लोग सच्चाई के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं उनको थोड़े अलग तरह के अनुभव होने शुरू हो जाते हैं, इससे मैं सहमत हूँ। और वो अनुभव आपको तभी नहीं होते…

प्रश्नकर्ता: सत श्री अकाल आचार्य जी। आज सुबह से टीवी (दूरदर्शन) पर देख रहा हूंँ कि हमारे सिख भाई अफ़गानिस्तान से जान बचाकर भागने पर मजबूर किये जा रहे हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब जी को सिर पर धारण करके बुरी हालत में उन्हें देखकर मुझे दुख भी है और गुस्सा…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…

प्रश्नकर्ता: स्त्री की सुंदरता से उसकी कोमलता का जो एहसास होता है, क्या वो परमात्मा की कोमलता जैसा होता है?
आचार्य प्रशांत: रोमेंटिक उपन्यास पढ़ रहे हो? हमें तो पता था सत्यम-शिवम्-सुंदरम, स्त्री कब से सुन्दर होने लग गई? सत्य सुन्दर होता है। स्त्री-पुरुष कब से सुन्दर हुए? कोमलता माने…

Acharya Prashant: Hell is a place where you get a lot of sympathy, consolation, condolence, and commiseration. You're told that we agree that you are in a miserable state. Your neighbor comes to you, puts his hand on your shoulder, and with a grave face tells you that you are…

Acharya Prashant: The spiritual soldier, the religious warrior has to be extremely intelligent. You could go to the extent of saying that he has to be cunning in the service of Truth; I’m choosing this word with all deliberation.
He has to be cunning in the service of the Truth;…

प्रश्नकर्ता: सबको प्रणाम। आज की इस धर्म चर्चा में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच में एक ऐसी विभूति या कहें शख्सियत आचार्य प्रशांत जी हैं। आपके बारे में मैं थोड़ा सा बताना चाहूँगा। आप बहुत ही ज्ञानी और पढ़े-लिखे एक आचार्य हैं। इन्होंने आइआइटी से इंजीनियरिंग की, आइआइएम से…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे कर्म में कोई विश्वास नहीं है, भक्ति में कोई श्रद्धा नहीं है। मुझे धर्म की कोई समझ नहीं है, तो परमात्मा की कृपा मुझ पर होगी या नहीं? परमात्मा से मेरा कभी साक्षात्कार होगा?
आचार्य प्रशांत: तो अभी जैसे भी हो तुम, उससे अगर संतुष्ट ही…

प्रश्नकर्ता: जो अभी जिज्ञासा है मेरी आचार्य जी, यूट्यूब पर एक शॉर्ट्स देखा था, उसके सम्बन्ध में है। तो एक बहुत सुप्रसिद्ध व्यक्ति जो श्रीमद्भगवद्गीता पर बोलते हैं उनका वह शॉर्ट्स देखा था; काफ़ी चल रहा है, बार-बार मेरे फीड पर आया। तो वो निष्काम कर्म पर बोल रहे थे…

जिन वज़हों से एक आदमी दुखी है, उन्हीं वज़हों से पूरी दुनिया दुखी है, चाहे कोई भी हो। आदमी हो और आदमी का दर्द अलग-अलग नहीं है। बच्चे और बूढ़े का दर्द अलग-अलग नहीं है। ऊपर-ऊपर से लगेगा कारण अलग हैं, स्थितियाँ अलग हैं, गहराई में दर्द, दर्द एक है। दुख के यही मूल कारण हैं। न जानना ‘अज्ञान’, और न झुकना ‘अविश्वास।’

आचार्य प्रशांत: आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की जो आपसी नोंक-झोंक होती थी, बड़ी दिलचस्प थी — कि ज़िंदगी तुमको बड़ी चाहिए कि लंबी चाहिए। ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी चाहिए या लंबी चाहिए?’
लंबी चाहिए तो खूब नकारात्मकता से भरे रहो। जितना तुम शक्की रहोगे, प्रकृति ने संयोग…

Questioner: I have a question on an excerpt from you.
“Aloneness is not about being free of others and living without others. Aloneness is to live without oneself. Aloneness does not have much to do with the so-called others; aloneness has everything to do with the one called oneself.”
I’d…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ और आपकी अनुकम्पा से ग्रन्थ भी पढ़ने शुरू किये हैं तो अभी प्रतिदिन कुछ नया सीखने को मिलता है, मन बिलकुल लगा रहता है और जैसा पहले चला करता था, उससे बिलकुल बदल गया है जीवन।…

Acharya Prashant: Everybody in his own personal way is seeking fulfillment and that is love. If you are young you may seek fulfillment in somebody's body, if you are middle-aged you may seek fulfillment in wealth and prestige, if you are old you may seek fulfillment in security and property…

प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते। आपसे मैं सर्वप्रथम शास्त्र-कौमुदी नामक कोर्स (पाठ्यक्रम) के जरिए जुड़ा था, तब से मुझे वेदांत और ग्रंथों का मूल्य पता चला। मैंने प्रस्थानत्रयी का पाठ शुरू किया है, तीन महीने हो गए हैं। मुश्किल हो रही है समझने में, पर आनंद आता है। कोरोना के कारण घर…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, मेरा क्वेश्चन (प्रश्न) डर को लेकर है। अभी तीन दिन मैंने यहाँ वालंटियरिंग (स्वयं सेवा) की; दिन अच्छे गुजरे; मज़े में निकल गये। लेकिन अभी ‘मीट द मास्टर’ के लिए यहाँ पर मैसेज (संदेश) रिकॉर्ड करना था।मेरा काफ़ी मन था आगे आकर बोलने का…

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…

Acharya Prashant: Our normal life is our nemesis. And it is our nemesis precisely because it appears normal. It is not normal. It is normal only by comparison. It is normal only relative to your neighbour. It is the life that your neighbour is leading. It is the life that…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि एक ही चीज़ का लम्बे समय तक सॉल्यूशन (हल) नहीं मिल पाता। जैसे मान लीजिए कि कोई मानसिक समस्या है, उसमें काफ़ी समय बीत गया और उस पर मनन-मंथन भी काफ़ी हुआ, लेकिन उससे उबर नहीं पाये हम, उससे…

प्रश्नकर्ता: सत्य और अध्यात्म की बात पर। व्हाट इस द डिफरेंस बिटवीन बींग स्पिरिचुअल एंड हैविंग अ स्पिरिचुअल एक्सपीरिएंस (आध्यात्मिक होने में और आध्यात्मिक अनुभव होने में क्या अंतर है) ?
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक अनुभव जैसा कुछ नहीं होता। आप अगर आध्यात्मिक हैं तो आपके सब अनुभवों में एक सच्चाई…

Acharya Prashant: A quiver full of the best of arrows but no bow, how do you fight the battle of life? Can you imagine the amusing as well as tragic situation of the person who has a great arrow without a bow? He will be sharpening and sharpening his weapon,…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम अंकिता रावत है। सर, जैसे कि मन हमेशा चीज़ों की ओर आकर्षित होता है तो आकर्षित का मतलब होता है कि हमें वहाँ खुशी मिलेगी, हम उसके पीछे भागते हैं और वो और अन्त में हमें दुख ही होता है, मतलब खुशी और दुख का…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मुझे ये समझ में कई बार नहीं आता कि जब मैं किसी माहौल में होती हूँ तो जैसे बार-बार ये बात होती है कि माया को हमें सत्य नहीं समझना चाहिए। लेकिन जैसे मैं आज दशहरा मेले में अपने बच्चों को लेकर गयी तो मैं वहाँ पर…

Questioner (Q): I had been part of the last Delhi Camp, IIT Delhi Camp. During those three days, I have seen that you have spoken to the participants continuously for 6 hours, then later in the evenings, with hostel students, for another two, to three hours till 2 a.m. in…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारतीय दर्शन में वेदों के आधार पर आस्तिक और नास्तिक का विभाजन किया गया। उसमें बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन को नास्तिक बोल दिया गया; जिसमें से मुख्यत: बौद्ध और जैन धर्म ने वेदों की सत्ता को माना नहीं, इस वजह से उसमें वर्गीकरण किया गया।
तो…

Laugh with no care at all. Why take oneself so seriously? What hurt, what wound can be so big? When we fully well know that the only thing that really is the Truth. Can there be two truths? The truth and the wound. The wound has to be a lie. But it will continue to pretend to be the truth as long as you avoid looking at it. The more you look at it, the more you will see that the wound is just some kind of dressing up that has been needlessly done.

आचार्य प्रशांत: खिंचाव है, आकर्षण है, किधर को जाने की इच्छा, बदल जाने का मन; कुछ अनजाना, कुछ नया पा लेने की अभीप्सा। कोई ऐसा है जिसको ये न होता हो? कोई ऐसा है जो किधर को खिंचता न हो? कोई है जिसको कुछ-न-कुछ आकर्षित न करता हो? सब हैं…

प्रश्नकर्ता: जो अद्वैत बोधस्थल में आप लोग बंधनों की बात करते हैं और उनके सॉल्यूशंस (समाधान) की बात करते हैं…
आचार्य प्रशांत: बंधनों की बेटा, बात नहीं करनी पड़ती। बंधन में तो सब हैं ही न! तो जो यथार्थ है उसकी बात होती है। यथार्थ ऐसा नहीं है कि अलग…

धर्म आपके शरीर की रक्षा थोड़ी करेगा। रक्षा शब्द की जब बात आती है तो ये समझना पड़ेगा कि आपको बड़ा ख़तरा क्या होता है। ख़तरे के संदर्भ में ही रक्षा शब्द का कुछ अर्थ है ना। ख़तरा हो तभी रक्षा की बात होती है। ख़तरा ही नहीं तो रक्षा शब्द अर्थहीन है। हाँ तो सबसे पहले तो ये जानना पड़ेगा कि हमें ख़तरा क्या है? एक मनुष्य को सबसे बड़ा ख़तरा क्या है? क्या मृत्यु? क्या किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि उसका शरीर गिर जाएगा, मृत्यु हो जाएगी — ये होता है? किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि मृत्यु आने से पहले वो मुक्त नहीं हो पाएगा। ये होता है ख़तरा।

यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है।