
आज महर्षि वाल्मीकि जयंती का सुअवसर है। इससे बेहतर शायद ही कोई मौका मिले भारत के आदिकवि को जानने के लिए। इसलिए आज हम उनके विषय में कुछ महत्वपूर्ण बातें आपके साथ साझा करना चाहते हैं:
महर्षि वाल्मीकि का योगदान
~ भारत व सनातन धर्म में महर्षि वाल्मीकि का योगदान…



यत: सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च| यत्रैवोपशमं यान्ति तस्मै सत्यात्मने नम:|| ~ योगवाशिष्ठ: (वैराग्यप्रकरण श्लोक 1)


जिस प्रकार हवा से पैदा की गई आग उसी हवा से बुझ जाती है, उसी प्रकार जो कल्पना से पैदा हुआ है, वो कल्पना मात्र से ही मिटाया जा सकता है।

हे राघव! अंदरूनी रूप से सभी इच्छाओं को त्याग दो, आसक्तियों और आवृत वृत्तियों से मुक्त हो जाओ, सब कुछ बाहरी रूप से करो। इस प्रकार दुनिया में अपनी भूमिका निभाओ।

मुझमें ब्रह्माण्ड की काल्पनिक तरंगों को उठने या गिरने दो। मैं जो अनंत चेतना का महासागर हूँ, मुझमें कोई वृद्धि या कमी नहीं होती।

हे राम! माया ऐसी है कि अपने नाश से एक अनूठा आनंद उत्पन्न करती है। इसका स्वरुप जाना नहीं जा सकता है और यह ध्यान से देखने मात्र से नष्ट हो जाती है।


जो मूर्ख तत्व को नहीं जानते, वे ही अपने बालकपन के कारण संभावित अवस्थाओं से दूर भागते हैं।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कहा जाता है कि आत्मज्ञान केवल विचार से होता है, तो यहाँ विचार से क्या आशय है?


आचार्य प्रशांत: आलोक जी कह रहे है कि आचार्य जी अब कुछ उल्टा होने लगा है। दुनिया महत्वपूर्ण लगने लगी है। मौत का क्यों सोचूं, जीवन भी तो अच्छा ही लगने लगा। आत्मा को खोजने की ज़रूरत ज़रा कम हो गई है, क्योंकि शरीर भी तो बढ़िया चीज़ है। पेड़,


ājñābhayasaṁśayātmaguṇasaṅkalpō bandhaḥ
Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts, fear, etc.
~ Niralamba Upanishad, Verse 25
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Acharya Prashant (AP): “Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts or fear etc. Bondage is to imagine that Ātman has doubt or…
जो सीखने को तैयार है, उसके लिए तो समूचा अस्तित्व ही गुरू है। पर तुममें पहले सीखने की वो महत् आकांक्षा तो उठे। पहले तुम ये मानो तो, कि जीवन बड़ा सूना है, बड़ा व्यर्थ जा रहा है, तुम्हारे भीतर एक छटपटाहट तो उठे। तुम तो झूठे संतोष में जी रहे हो, तुम तो माने बैठे हो कि ये तो ठीक है, मुझे पता ही है। हाँ! हाँ! ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, सब ठीक है। मस्त रहो! बस ऐसा है, सन्तुष्ट रहो, “संतोषं परमं धनम्।” जिसमें तड़प नहीं है, उसके लिए तो अध्यात्म की शुरुआत ही नहीं हो सकती।
Questioner: You have said that the future is not controlled by God; in reality, various forces are acting simultaneously creating unpredictable future events. When I read Yoga Vasistha, I have found that there are chapters where Guru Vasistha talks about the conversation between Krishna and Arjuna to Rama. How…
Listener (L):
Yog Vasistha Sara, Chapter 3, Verse 18:
“He who does not, like one blind, recognise(lit. leaves far behind) his relatives, who dreads attachment as he would a serpent, who looks upon sense-enjoyments and disease alike, who disregards the company of women as he would a blade of grass…
All the arts acquired by men are lost by lack of practice, but this art of wisdom grows steadily once it rises.
~ Yoga Vasishth Sara, Chapter 1, Verse 13
Questioner: Acharya Ji, what is the litmus test to determine whether one’s wisdom is rising, or is it new clothes…
Translation: Salutations to that calm effulgence which is endless and unlimited by space, time, etc., the pure consciousness which can be known by experience only. ~ Yogvashishtha Vairagya Prakaran Verse 1
Acharya Prashant: The…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आज के पाठ से अध्ययन का आनंद हुआ। कैसे हुआ, किसे हुआ, यह नहीं कह सकते, बस आनंद ही था। जब हम केवल ब्रह्म-अनुभूति में रम जाते हैं, मन अमन होता है, तब भी संसार का व्यवहार तो द्वैत में ही होगा, मान्यताएँ भी होंगी, वृत्तियाँ…
मनीषियों का साथ, आवृत वृत्तियों का त्याग, आत्म जिज्ञासा और श्वास का नियंत्रण — ये मनोविजय के साधन हैं। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। श्वास के नियंत्रण से और आवृत वृत्तियों के त्याग से क्या अभिप्राय है?
आचार्य प्रशांत: समझेंगे बात को। आवृत वृत्तियाँ और श्वास का नियंत्रण, इन…
असली सत्य को यदि तुम जान भी गए हो तो भी तुम्हें निरंतर अभ्यास करना पड़ेगा। कटक फल शब्द के उच्चारण से पानी साफ़ नहीं हो जाता। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, निरंतर अभ्यास से क्या अभिप्राय है?
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं जिन्हें ठीक-ठीक समझ लेना बहुत ज़रूरी है।…
आचार्य प्रशांत: चिंगारी को ज़रा हवा देते हैं तो आग भड़क जाती है और चिंगारी को फूँक…
प्रश्नकर्ता: इस स्थिति में कैसे रहें और दुनिया में क्या भूमिका हो?
आचार्य प्रशांत: यह स्थिति…
आचार्य प्रशांत: "अनंत चेतना का महासागर हूँ मैं।” ये जो 'अनंत चेतना' है, इसको थोड़ा समझना पड़ेगा। चेतना में अनंतता दो तरह की होती…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसका भावार्थ बताएँ।
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें कही हैं। पहला, अपने नाश…
आचार्य प्रशांत: इच्छा को सूखी घास क्यों कहा है, समझेंगे। इच्छाओं का एक पूरा अन्तर्सम्बन्धित जाल होता है, *नेटवर्क*। कोई इच्छा अकेली नहीं खड़ी होती, वो अपने पीछे भी दस इच्छाएँ लेकर आई होती है,…
शिक्षण की प्रथागत विधि का अनुसरण केवल परम्परा हेतु होता है। विशुद्ध चैतन्य शिष्य की समझ की स्पष्टता से प्रतिफलित होता है। —योगवासिष्ठ सार
आचार्य प्रशांत: तो यहाँ पर उन्होंने विशुद्ध चैतन्य की ज़िम्मेदारी पूरे तरीक़े से शिष्य की समझ पर डाल दी है। एक जगह वो कह रहे हैं:…
जो वासना परमार्थ के लिए की जाए, वो शुभ होती है। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वासना यदि सत्य की ओर उन्मुख हो जाए तो वो सही किस प्रकार है?
आचार्य प्रशांत: राम की ओर दिल भागता है। संत कहेंगे कि अच्छा तो यह होता है कि स्थिर ही हो…
इस विस्तृत संसार से कभी सुख नहीं मिल सकता क्योंकि इसमें जो जीव उत्पन्न होते हैं, वे मरने के लिए ही उत्पन्न होते हैं और जो मरते हैं, वे उत्पन्न होने के लिए ही मरते हैं, उनको कुछ भी सुख नहीं मिलता। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: ‘उत्पन्न होने के लिए ही…
प्रश्नकर्ता: 'बालकपन' कह रहे हैं, अहंकार नहीं कह रहे। ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: अप्रौढ़ता। 'बालकपन' कहना उचित भी है। बालकपन मतलब वैसे जैसे तुम पैदा होते हो। कैसे पैदा होते…
मनुष्य को इतना पुरुषार्थ करना चाहिए कि पूर्व के अशुभ कर्म शांत हो जाएँ। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, (श्लोक के सन्दर्भ में) जो भी हमने किया है, उसको पलटना है या समझकर उसको ध्यान से देखना काफ़ी है?
आचार्य प्रशांत: ‘पूर्व के अशुभ कर्म शांत हो जाएँ।’ आप बहुत…
—योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रयत्न करने का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: प्रयत्न से यही तात्पर्य है जिसकी हम बात कर चुके हैं – उचित कर्म। कोई कितना भी सिखा ले, अंततः जीना तो तुम्हे स्वयं ही…
आचार्य प्रशांत: आत्मविचार। रमण महर्षि भी विचार की उपयोगिता पर बड़ा महत्व देते थे। पर वशिष्ठ या रमण अगर विचार कहें, तो जो हमारा साधारण, विक्षिप्त विचार है, उसकी बात…
आचार्य प्रशांतः तरुणा कह रही है कि, "दीवाली का जब से माहौल बना है तब से सी.आई.आर. (संस्था के अंतर्गत होने वाले मासिक कोर्स) अटेंड (भाग लेना) करना और मुश्किल हो गया है। कह रहीं हैं कि जब से सीरीज शुरू हुई थी तब से ही कुछ आंतरिक बाधा सी…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। शरीर, मन, बुद्धि, दृश्य व अदृश्य जगत का आधार ब्रह्म हैं और वह ब्रह्म सर्वत्र है, सर्वव्यापी है, विश्वरूप है। उसकी रचना वस्तु में भी ब्रह्म है, तो फिर यह अज्ञान क्यों? क्या हम वह नहीं है या अगला ब्रह्म नहीं है?
दूसरा प्रश्न है, "कुछ…

We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?

किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?


How many hours do you spend meditating each day?
This is a trick question!
Whether you are “meditating” one hour per day or six, you are not truly meditating. This is because meditation is not something you do to escape life. Meditation is a way of life.
Meditation is to…

Spirituality is about belonging to existence. Not belonging to a narrow household, or caste or ideology. All these are boundaries. So, wherever there are boundaries, there is violence. Wherever there are boundaries, there is also the fear of being small, powerless, limited. The really non-violent one is at home, everywhere and in every situation. Non-violence is not about following duties. Non-violence is an action in clarity and love. That alone is non-violence.

अलग-अलग नहीं हैं दोनों! बाहर से अलग हैं, अंदर से एक हैं। जिसको हम आध्यात्मिक ज्ञान भी कहते हैं, वह बस मन की खोजबीन, जाँच-पड़ताल का नाम है। हमें दोनों चाहिए, विज्ञान भी, अध्यात्म भी। विज्ञान इसीलिए ताकि तुम्हें जगत की हक़ीक़त पता रहे, और अध्यात्म ताकि तुम्हें मन का ज्ञान रहे, तुम्हें पता हो कि ये मन चीज़ क्या है? इन दोनों का ही पता होना चाहिए, जैसे तुम्हारे मन के पखेरू को दो पंख मिल जाएँ, अब वो मुक्ति के आकाश में उड़ जाएगा।

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

Man has certain desires. He is seeking the company of the highest, so that his lowest desires can be fulfilled. The highest is just a means, a method and that is the case with all means and methods. Whether the highest is the means, whether the highest is even the end, the real end is always the gratification of the lowly self. Man is such that even if he wants the company or proximity of Gods, it is for the fulfilment of his own personal objectives.

You’re conditioned to think you can only exist with social approval. What holds you back is the fear that something devastating will happen if you don’t conform. Challenge that belief. One must have a healthy contempt for the world, which is possible only when one has deep love for what’s real. Otherwise, you'll keep bowing your head.

संसार में तुम जिस भी चीज़ को शांति का,तृप्ति का साधन बनाओगे वो चीज़ बेचारी असफल हो जाएगी। तुम उसे भोगकर के कुछ और कर देते हो। तो फिर कौन है जो तुम्हें सन्तुष्टि दे सकता है? सिर्फ़ वो जो तुम्हारे स्पर्श से कहीं आगे का हो। तुम्हारा स्पर्श उस पर कोई दाग ही न लगा पाये, जो अस्पर्श्य हो। ऐसे किसी को ही सत्य कहा गया है, परमात्मा कहा गया है। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उस पर हावी नहीं हो सकते। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उसे बदल नहीं सकते।

Questioner: When I do something my parents don’t approve of, they scold me. But sometimes the matter goes too far and I get offended, and then I refrain from talking back to them; I fear that if I say something, I will end up hurting them. But then, if I…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न युग के बारे में है। जैसे हम पढ़ते हैं, चार युग होते हैं– सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। और जो एक युग होता है उसको लगभग लाखों वर्षों का मानते हैं। जबकि एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) के अनुसार जो स्टार्स (तारों) की पोजीशन (स्थिति) है,…

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

Questioner: Sir, as a law student, Every student has a concern about whether it is about environmental concerns, there is a lot of environmental pollution etc. Also, it is about poverty concern or corruption or any other social issue but then when we get out of college we get start…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र कहते हैं कि ध्यान की विधियाँ बंधन हैं। मेरी जिज्ञासा यह है कि इतनी सारी ध्यान की विधियाँ क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: विधियाँ उनके लिए हैं जिन्हें सत्य को तो पाना है और अपनी ज़िद को भी बचाना है। ख़ुदा को भी पाना है ख़ुद को…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं पिछले दो-तीन महीने से अध्यात्म में हूँ। थोड़े समय से बिलकुल सही चल रहा था, जब तक मन और बुद्धि पर काम हो रहा था तो ज़्यादा डर नहीं था, पिछले हफ़्ते कुछ ऐसा हुआ कि बहुत ज़्यादा डर लगने लगा। मैं जिनसे सीख रही…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मेरा सवाल मेरे बच्चों के बारे में था, आचार्य जी। मेरे नौ साल के और ग्यारह साल के दो बच्चे हैं लेकिन उनका लगाव आध्यात्मिक साहित्य में नहीं हो पा रहा है। वो लोग पंजाबी रैपिंग सॉन्ग सुनते हैं; बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग सुनते हैंl उसमें…

Acharya Prashant: The world overpowers us in a thousand ways, and don’t we agree to that? You go to the markets and the markets attract you; that’s kind of an attack, an invasion. And don’t you agree to that? Or do you just say that “This is an invasion upon…

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! डू वी नीड टू क्रिएट गॉड्स ऑर वी हैव ऑलरेडी (क्या हमें भगवान बनाने होंगे या वो पहले से हमारे पास हैं)? जैसे हम कुछ अच्छी क्वालिटीज़ हम जो पढ़ते हैं शास्त्रों में, कई बार हमारे पास नहीं होती है, या वो हमारे पास है, हम अनदेखा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: एक चीज़ होती है मेंटल एजिलिटी (मानसिक चपलता), जैसे कि मैं कहीं बाइक से जा रहा हूँ और अचानक कोई मोड़ आ गया या एक कुत्ता बीच सड़क पर आ गया, तो मुझे एकदम से ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ी। तो ये जो स्किल (कौशल) होती है एकदम से …