
जो सीखने को तैयार है, उसके लिए तो समूचा अस्तित्व ही गुरू है। पर तुममें पहले सीखने की वो महत् आकांक्षा तो उठे। पहले तुम ये मानो तो, कि जीवन बड़ा सूना है, बड़ा व्यर्थ जा रहा है, तुम्हारे भीतर एक छटपटाहट तो उठे। तुम तो झूठे संतोष में जी रहे हो, तुम तो माने बैठे हो कि ये तो ठीक है, मुझे पता ही है। हाँ! हाँ! ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, सब ठीक है। मस्त रहो! बस ऐसा है, सन्तुष्ट रहो, “संतोषं परमं धनम्।” जिसमें तड़प नहीं है, उसके लिए तो अध्यात्म की शुरुआत ही नहीं हो सकती।

आज्ञाभयसंशयात्मगुणसङ्कल्पो बन्धः ।



यत: सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च| यत्रैवोपशमं यान्ति तस्मै सत्यात्मने नम:|| ~ योगवाशिष्ठ: (वैराग्यप्रकरण श्लोक 1)



प्रश्नकर्ता: अद्वैत ज्ञान में अक्सर बताया जाता है कि प्रयास, प्रयत्न, ये सब सत्य प्राप्ति में बाधक हैं। लेकिन योगवासिष्ठ के अध्याय 'मन का विलीन' में प्रयास पर ख़ास ज़ोर दिया गया है। तो प्रयास करें कि न करें? प्रयास लाभप्रद है या हानिप्रद? आध्यात्मिक खोज में जब सत्य लक्ष्य


जिस प्रकार हवा से पैदा की गई आग उसी हवा से बुझ जाती है, उसी प्रकार जो कल्पना से पैदा हुआ है, वो कल्पना मात्र से ही मिटाया जा सकता है।

हे राघव! अंदरूनी रूप से सभी इच्छाओं को त्याग दो, आसक्तियों और आवृत वृत्तियों से मुक्त हो जाओ, सब कुछ बाहरी रूप से करो। इस प्रकार दुनिया में अपनी भूमिका निभाओ।

मुझमें ब्रह्माण्ड की काल्पनिक तरंगों को उठने या गिरने दो। मैं जो अनंत चेतना का महासागर हूँ, मुझमें कोई वृद्धि या कमी नहीं होती।

हे राम! माया ऐसी है कि अपने नाश से एक अनूठा आनंद उत्पन्न करती है। इसका स्वरुप जाना नहीं जा सकता है और यह ध्यान से देखने मात्र से नष्ट हो जाती है।

स्वज्ञान (आत्मज्ञान) वो आग है जो इच्छारूपी सूखी घास को जला देती है। —योगवासिष्ठ सार




जो मूर्ख तत्व को नहीं जानते, वे ही अपने बालकपन के कारण संभावित अवस्थाओं से दूर भागते हैं। —योगवासिष्ठ सार


अपने प्रयत्न के सिवा और कोई तुम्हें सिद्धि देने वाला नहीं है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कहा जाता है कि आत्मज्ञान केवल विचार से होता है, तो यहाँ विचार से क्या आशय है?



आचार्य प्रशांत: आलोक जी कह रहे है कि आचार्य जी अब कुछ उल्टा होने लगा है। दुनिया महत्वपूर्ण लगने लगी है। मौत का क्यों सोचूं, जीवन भी तो अच्छा ही लगने लगा। आत्मा को खोजने की ज़रूरत ज़रा कम हो गई है, क्योंकि शरीर भी तो बढ़िया चीज़ है। पेड़,


Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts, fear, etc.
~ Niralamba Upanishad, Verse 25
✥ ✥ ✥
Acharya Prashant (AP): “Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts or fear etc. Bondage is to imagine that Ātman has doubt or…
Questioner: You have said that the future is not controlled by God; in reality, various forces are acting simultaneously creating unpredictable future events. When I read Yoga Vasistha, I have found that there are chapters where Guru Vasistha talks about the conversation between Krishna and Arjuna to Rama. How…
Listener (L):
Yog Vasistha Sara, Chapter 3, Verse 18:
“He who does not, like one blind, recognise(lit. leaves far behind) his relatives, who dreads attachment as he would a serpent, who looks upon sense-enjoyments and disease alike, who disregards the company of women as he would a blade of grass…
All the arts acquired by men are lost by lack of practice, but this art of wisdom grows steadily once it rises.
~ Yoga Vasishth Sara, Chapter 1, Verse 13
Questioner: Acharya Ji, what is the litmus test to determine whether one’s wisdom is rising, or is it new clothes…
Acharya Prashant: The…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आज के पाठ से अध्ययन का आनंद हुआ। कैसे हुआ, किसे हुआ, यह नहीं कह सकते, बस आनंद ही था। जब हम केवल ब्रह्म-अनुभूति में रम जाते हैं, मन अमन होता है, तब भी संसार का व्यवहार तो द्वैत में ही होगा, मान्यताएँ भी होंगी, वृत्तियाँ…
मनीषियों का साथ, आवृत वृत्तियों का त्याग, आत्म जिज्ञासा और श्वास का नियंत्रण — ये मनोविजय के साधन हैं। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। श्वास के नियंत्रण से और आवृत वृत्तियों के त्याग से क्या अभिप्राय है?
आचार्य प्रशांत: समझेंगे बात को। आवृत वृत्तियाँ और श्वास का नियंत्रण, इन…
असली सत्य को यदि तुम जान भी गए हो तो भी तुम्हें निरंतर अभ्यास करना पड़ेगा। कटक फल शब्द के उच्चारण से पानी साफ़ नहीं हो जाता। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, निरंतर अभ्यास से क्या अभिप्राय है?
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं जिन्हें ठीक-ठीक समझ लेना बहुत ज़रूरी है।…
आचार्य प्रशांत: चिंगारी को ज़रा हवा देते हैं तो आग भड़क जाती है और चिंगारी को फूँक…
प्रश्नकर्ता: इस स्थिति में कैसे रहें और दुनिया में क्या भूमिका हो?
आचार्य प्रशांत: यह स्थिति…
आचार्य प्रशांत: "अनंत चेतना का महासागर हूँ मैं।” ये जो 'अनंत चेतना' है, इसको थोड़ा समझना पड़ेगा। चेतना में अनंतता दो तरह की होती…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसका भावार्थ बताएँ।
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें कही हैं। पहला, अपने नाश…
शिक्षण की प्रथागत विधि का अनुसरण केवल परम्परा हेतु होता है। विशुद्ध चैतन्य शिष्य की समझ की स्पष्टता से प्रतिफलित होता है। —योगवासिष्ठ सार
आचार्य प्रशांत: तो यहाँ पर उन्होंने विशुद्ध चैतन्य की ज़िम्मेदारी पूरे तरीक़े से शिष्य की समझ पर डाल दी है। एक जगह वो कह रहे हैं:…
जो वासना परमार्थ के लिए की जाए, वो शुभ होती है। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वासना यदि सत्य की ओर उन्मुख हो जाए तो वो सही किस प्रकार है?
आचार्य प्रशांत: राम की ओर दिल भागता है। संत कहेंगे कि अच्छा तो यह होता है कि स्थिर ही हो…
इस विस्तृत संसार से कभी सुख नहीं मिल सकता क्योंकि इसमें जो जीव उत्पन्न होते हैं, वे मरने के लिए ही उत्पन्न होते हैं और जो मरते हैं, वे उत्पन्न होने के लिए ही मरते हैं, उनको कुछ भी सुख नहीं मिलता। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: ‘उत्पन्न होने के लिए ही…
प्रश्नकर्ता: 'बालकपन' कह रहे हैं, अहंकार नहीं कह रहे। ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: अप्रौढ़ता। 'बालकपन' कहना उचित भी है। बालकपन मतलब वैसे जैसे तुम पैदा होते हो। कैसे पैदा होते…
मनुष्य को इतना पुरुषार्थ करना चाहिए कि पूर्व के अशुभ कर्म शांत हो जाएँ। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, (श्लोक के सन्दर्भ में) जो भी हमने किया है, उसको पलटना है या समझकर उसको ध्यान से देखना काफ़ी है?
आचार्य प्रशांत: ‘पूर्व के अशुभ कर्म शांत हो जाएँ।’ आप बहुत…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रयत्न करने का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: प्रयत्न से यही तात्पर्य है जिसकी हम बात कर चुके हैं – उचित कर्म। कोई कितना भी सिखा ले, अंततः जीना तो तुम्हे स्वयं ही…
आज महर्षि वाल्मीकि जयंती का सुअवसर है। इससे बेहतर शायद ही कोई मौका मिले भारत के आदिकवि को जानने के लिए। इसलिए आज हम उनके विषय में कुछ महत्वपूर्ण बातें आपके साथ साझा करना चाहते हैं:
महर्षि वाल्मीकि का योगदान
~ भारत व सनातन धर्म में महर्षि वाल्मीकि का योगदान…
आचार्य प्रशांतः तरुणा कह रही है कि, "दीवाली का जब से माहौल बना है तब से सी.आई.आर. (संस्था के अंतर्गत होने वाले मासिक कोर्स) अटेंड (भाग लेना) करना और मुश्किल हो गया है। कह रहीं हैं कि जब से सीरीज शुरू हुई थी तब से ही कुछ आंतरिक बाधा सी…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। शरीर, मन, बुद्धि, दृश्य व अदृश्य जगत का आधार ब्रह्म हैं और वह ब्रह्म सर्वत्र है, सर्वव्यापी है, विश्वरूप है। उसकी रचना वस्तु में भी ब्रह्म है, तो फिर यह अज्ञान क्यों? क्या हम वह नहीं है या अगला ब्रह्म नहीं है?
दूसरा प्रश्न है, "कुछ…

सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।

स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।

The balance between order and disorder should not be decided by personal likes or dislikes, but by what the task at hand requires. Sometimes a project demands discipline and order; at other times, more important work requires leaving things messy. The right action comes from responding to the actual need, not personal preference. Even sacrifice can be meaningful when it serves something important, but “staying backstage” should never become an excuse to avoid what one cannot tolerate.

लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।

सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।

राम को किसी फ़िल्म, अभिनेता या ऐतिहासिक चरित्र की छवि तक सीमित करना उनके वास्तविक अर्थ को भूलना है। राम कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि अहंकार के विगलन और सत्य की ओर बढ़ने की दिशा हैं। बाहर पर्दे पर राम को खोजने के बजाय अपने भीतर उस तड़प को पहचानना ज़रूरी है, जो अहंकार से मुक्त होना चाहती है। जब राम विषय नहीं, हृदय बनते हैं, तभी रामत्व का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।

True freedom begins when we question the beliefs that make us feel trapped. Most of our suffering comes not from circumstances but from unquestioned assumptions, attachments, and imagined obligations. By suspending our beliefs, even briefly, we allow truth to enter, revealing that life always offers choice. Transformation is born from love for truth, the courage to let go, and the willingness to step beyond the boundaries created by the ego.

The Bhagavad Gita deserves reverence not because of inherited beliefs about its author, but because of its power to dissolve falsehood and reveal Truth. Real devotion is not ritual or blind faith—it is understanding, inquiry, and living the wisdom of the Gita. Through sincere study, one discovers the true meaning of Krishna, making the Gita the most authentic path to knowing and worshipping Him.

सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।

True learning is not built on memorizing answers but on understanding reality. Memory may help in examinations, but life constantly presents new questions that demand clarity, presence, and intelligence. Education becomes meaningful only when knowledge is deeply understood and lived, not merely remembered. Real understanding frees us from dependence on rote learning and enables us to respond wisely to every new situation.

समझ केवल जानकारी इकट्ठा करने या बातों को याद रखने से नहीं आती, बल्कि पूरी सजगता से वर्तमान में जीने और हर अनुभव को स्वयं देखने से आती है। जीवन हर दिन नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटी हुई बातें पर्याप्त नहीं होतीं। वास्तविक सीख तब होती है जब जिज्ञासा, प्रश्न और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती है। स्मृति नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ ही सही निर्णय, सीखने और जीवन को सार्थक दिशा देने का आधार बनती है।

आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।

धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।

लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।

आत्मज्ञान के बिना समाज, पर्यावरण या किसी भी बाहरी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं, क्योंकि हर संकट की जड़ मनुष्य की चेतना में है। बाहरी सुधार, नीतियाँ या अभियानों की अपनी भूमिका है, लेकिन वे मूल कारण को नहीं बदलते। इसलिए सबसे आवश्यक कार्य है स्वयं को बदलना और सत्य के प्रति गंभीर होना। जो व्यक्ति सत्य के प्रति उदासीन है, उससे स्वीकृति या मान्यता की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।

पढ़ना केवल पन्ने पूरे करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। जब किसी विषय को सचमुच समझा जाता है, तो जिज्ञासा स्वयं आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अधूरी किताबें अक्सर रुचि की कमी नहीं, बल्कि बिना समझे आगे बढ़ने का परिणाम होती हैं। इसलिए गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है हर विचार को समझना, क्योंकि वास्तविक सीख वहीं से शुरू होती है।

Real change begins not by changing the world alone but by understanding the one trying to change it. Laws, technology, policies, and scientific progress have value, yet they cannot solve problems rooted in human consciousness and endless desire. Truth remains the same across cultures and disciplines, requiring only a change in language, not in essence. Lasting solutions emerge through honesty, self-inquiry, and inner transformation, because no external system can replace a change in the human mind.

Human beings are born into uncertainty, surrounded by beliefs, identities, and social conditioning that offer ready-made answers to fundamental questions. Real spirituality begins not with accepting collective or personal beliefs, but with honestly examining one’s own suffering, fears, and false identities. The journey is not toward comforting ideas, but toward self-inquiry, where truth is discovered through questioning, observation, and the gradual rejection of illusion.

A society that loses its sense of sacredness begins to see every person and profession as merely transactional. When truth is replaced by the pursuit of happiness and consumption, trust erodes and cynicism becomes the norm. Doctors, teachers, and institutions are no longer respected but viewed with suspicion. The deeper crisis is not medical or social but philosophical: without self-understanding, people become consumers first and human beings second. True respect can return only when truth, integrity, and inner education become more important than personal gain.