कुछ ऐसा भी नहीं है कि अचानक से मैंने बोलना शुरू कर दिया है, ‘’बोलते बोलते भी अब पंद्रह बीस मिनट हो रहे हैं|’’ तुम ज़रा भी अगर अपने मित्र हो, तुम ज़रा सा अगर अपने आप को समर्थन दो तो तुम वहाँ छुपोगे थोड़ी पीछे और मैं दोहरा रहा हूँ: माया बोल के नहीं आएगी कि, ‘’मैं माया हूँ|’’ वो तो ऐसे ही रहेगी छोटी-छोटी बातों में इधर-उधर, छुप जाओ| ‘माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय, भागता के पाछे पड़े, सम्मुख भागे सोये’| माया है उसका प्रमाण ही ये है कि वो सत्य से भागेगी| उसकी पीठ के पीछे रहेगी हमेशा और जो मिल नहीं रहा है, जो छगम है, जो भागा जा रहा उसके पीछे-पीछे भागेगी| किसी तरह उसको हासिल कर लूँ, ये हासिल कर लूँ, वो हासिल कर लूँ तरक्की-पैसा, ये, वो, खुशियाँ उनको हासिल कर लूँ| ‘भगता के पीछे पड़े सम्मुख भागे सोये|’ जो सम्मुख है, उससे बचेगी, उससे भागेगी ‘माया छाया एक सी’, माया और छाया दोनों की प्रक्रति एक जैसी है| छाया हमेशा सूरज से विपरीत चलती है, छाया कभी सूरज की तरफ़ नहीं देखोगे| जहाँ प्रकाश है, छाया उससे उल्टी भागेगी| ‘माया-छाया एक सी’, इन्हीं जरा-जरा सी बातों में तो सतर्क रहना होता है ना| जिंदगी कोई बड़ी बातों का नाम नहीं होती है, ये हम कितनी बार चर्चा कर चुके हैं|