ध्यान है मन का स्वरस में डूबना || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

प्रश्नकर्ता: ध्यान में होने का क्या अर्थ है? ध्यान में हम कब होते हैं? कब समझा जाए कि हम ध्यान में हैं?
आचार्य प्रशांत: ध्यान में ना होना अपना एहसास ख़ुद करा देता है। फिर आप उसको नाम किसी भी तरह का दे सकते हो। चाहे विचार बोल लो, चाहे बेचैनी बोल लो, चाहे तलाश बोल लो, पर ये पक्का है कि कुछ रहेगा जिसे नाम देने की ज़रुरत रहेगी। देखिए, मैंने बात करी ध्यान में ‘ना’ होने की। ध्यान में कुछ विशेष नहीं है, ध्यान में कुछ भी ख़ास नहीं है। एहसास हमेशा उन अवस्थाओं का होगा जो ध्यान की नहीं हैं और वो अलग-अलग तरह के एहसास देंगी।
ध्यान तो सहजता है, उसका क्या अनुभव!
कई शब्द प्रयोग किए जा सकते हैं और किए गए हैं, पारम्परिक रूप से। उनका संबंध ध्यान के साथ बैठाया गया है–शांति, मौन, आनंद, मुक्ति–ये सारी बातें। पर ये भी सब इशारे हैं। ध्यान अपने-आप में कुछ है ही नहीं, ये इशारे भी कुछ दूर तक जा कर ख़त्म हो जाते हैं। उसके ऊपर जो कुछ है, वो है। ध्यान एक खाली जगह है। ध्यान का अपना कोई अनुभव नहीं होगा।
ऐसे समझ लीजिए कि जब बेचैनी ना हो, जब अधूरापन ना हो, जब खोज की कोई ज़रुरत ना पड़े, जब पाने की इच्छाएँ बिलकुल हिला ना रही हों, तो ध्यान की अवस्था है। और ध्यान की वो अवस्था, ना बाहर से लाई जाती है, ना वो वस्तुगत रूप से कुछ है कि कहा जा सके कि ‘ये ध्यान है’। वो लगातार मौजूद ही रहती है। जब मन प्रस्तुत होता है उसमें डूबने के लिए, तो मन की बेचैनियाँ हट जाती हैं, बस इतना ही, और उसमें कुछ विशेष नहीं।
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