प्रश्नकर्ता: मैं एक सर्जन (शल्य चिकित्सक) हूँ। क्या ध्यान में होने से सर्जरी सफल हो सकती है?
आचार्य प्रशांत: ध्यान में होने पर ही सर्जरी सफल हो सकती है। नहीं तो ध्यान का फ़ायदा क्या? ध्यान का अर्थ ही होता है कि मन के पास भटकने के लिए कोई ठिकाना, कोई आकर्षण, कोई विषय है ही नहीं। मन जमकर बैठ गया। और मन जमकर एक ही जगह बैठ सकता है।
जिस एक जगह मन जमकर बैठ सकता है, उसी को एक नाम दे दिया जाता है। उसे कभी आत्मा कह देते हैं, कभी सत्य कह देते हैं, कभी शांति कह देते हैं, कभी मौन, कभी विगलन, कभी समर्पण। बहुत सारे नाम दे दिए जाते हैं, नामों की बात नहीं है। असली बात ये है कि मन जमकर बैठ गया है। और जमकर तभी बैठेगा जब सही जगह बैठा हो।
आप जमकर बैठ सकते हो अगर जहाँ बैठे हो, वहाँ नीचे गीला हो? आप जमकर बैठ सकते हो अगर जहाँ बैठे हो, वहाँ नीचे कीला हो? गीला हो तो भी जमकर नहीं बैठ पाओगे और कीला हो तो भी नहीं।
जमकर बैठने का मतलब ही है — मिल गया। यहीं पर होना था। आइ बिलॉन्ग हियर (मैं यहीं का हूँ)। आसन मिल गया।
अब जब मन को इधर-उधर होना नहीं, तो मन अब जो भी करेगा, पहली बात तो सही करेगा — व्यर्थ का कोई कर्म करेगा नहीं — और जो भी करेगा, उसमें डूबकर करेगा; क्योंकि उसके पास कहीं भी भटकने का कोई विकल्प ही नहीं है। असली ध्यान यही होता है कि जो भी कर रहे हो चौबीस घंटे, वो कर ही सही रहे हो। तो इधर-उधर मन जाना ही क्यों है! भटकेंगे तो तब न जब जो चीज़ हाथ में हो, उसके प्रति कुछ संदेह हो।



