प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ध्यान में रहना और वैसे ही अपनी ज़िंदगी बिताना अगर सही तरीका है, तो हम लोग अपने तरीके से, जितना भी हमलोगों को पता है उस हिसाब से या आपको जैसे सुनते हैं, तो कोशिश करते हैं। पर लगता है कि कुछ हो नहीं रहा या हमसे कहीं-न-कहीं बहुत गलतियाँ हो रही हैं, जिसकी वजह से हम कर नहीं पा रहे हैं उस चीज़ को। तो अगर रास्ते की तरफ़ बढ़ने की चाह है, पर हो नहीं पा रहा है; तो उसको कैसे सही करें या क्या करें? क्योंकि जो भुगत रहे हैं, वो पता है कि ध्यान न होने की वजह से, सही होश में न होने की वजह से है। पर उसकी तरफ़ सही से बढ़ भी नहीं पा रहे है; तो उसको कैसे सही करें?
आचार्य प्रशांत: ध्यान माने क्या?
प्र: जो खुद कर रहे हैं, उसको ऑब्ज़र्व (निरीक्षण) करें कि कहाँ गलत कर रहे हैं, क्या सही कर रहे हैं। और उसको ठीक करने की अपने से ही कोशिश करें!
आचार्य: जैसे किसी को पत्थर मार रहे हो, उसको लग नहीं रहा है पत्थर। तो ध्यान माने कि गौर से देखो कि जिसको पत्थर मार रहे हो, उसका सिर क्यों नहीं फूट रहा। ध्यान माने कि गौर से देखो कि चूक कैसे जा रहा है निशाना और ध्यान का फल फिर तुम्हें ये मिलेगा कि अगली बार जब तुम पत्थर मारोगे, तो भेजा बिलकुल तरबूजे की तरह फटेगा, है न? क्यों?
ध्यान माने जो भी कुछ तुम कर रहे हो, उसमें गलती क्यों हो रही है। यह तुम्हारी परिभाषा हैं कि गलती क्यों हो रही है मेरे काम में, यह परिभाषा है ध्यान की?
जब बोध मात्र ध्येय हो, तब मन की हालत को ध्यान कहते हैं।



