मेडिटेशन "करा" नहीं, "जीया" जाता है। "करने" वाला मेडिटेशन तो झुनझुना है, कि गए और तीस मिनट मेडिटेशन करके आ गए। जो तुम्हारी ज़िंदगी चल रही है, उसी में देखो कि तुम्हारे संदर्भ तथा संबंध में ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य क्या हो सकता है। अपने बंधन पहचानो और देखो कि उनके कारण कितना दुख है। उसे मिटाना ही लक्ष्य बनेगा तुम्हारा। और फिर उसकी प्राप्ति के लिए पूरे जीवन को झोंक दो, यही ध्यान है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हमने आपके द्वारा सिर्फ़ “नेति-नेति” ही की प्रक्रिया सुनी है शिखर तक जाने के लिए। लेकिन बाकी गुरु और आचार्य मेडिटेशन (ध्यान) पर ज़्यादा ध्यान देते हैं कि मेडिटेशन करो, धीमे-धीमे दिमाग बदलेगा, मन बदलेगा, मन खत्म होगा और अपने आप तुम सत्य तक पहुँच जाओगे। तो मेडिटेशन का क्या रोल (भूमिका) है सत्य तक जाने में?
आचार्य प्रशांत: मेडिटेशन माने क्या?
प्रश्नकर्ता: मेडिटेशन माने अब किसी भी चीज़ पर ध्यान न लगाना, शायद नथिंगनेस (अनस्तित्व) पर जाना, अपने माइंड को शांत करना शायद। इतना ही हम जानते हैं।
आचार्य प्रशांत: मेडिटेशन माने क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कि वो ज़्यादा कुछ है ही नहीं, एक शब्द भर है, पर बड़ा पूजनीय शब्द बन गया है। मेडिटेशन माने क्या? कुछ सोचना, कुछ करना। तो इन दो के अलावा तो और कोई क्रिया हो नहीं सकती — या तो तुम कुछ सोचते हो या तुम कुछ करते हो। मेडिटेशन क्या है? ध्यान माने क्या?



