बिन देखे बिन सोचे बिन जाने, सब जानते हो तुम || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2014)

नाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः।
न कल्पते न जाति न शृणोति न पश्यति।।
अष्टावक्र गीता (अध्याय १८, श्लोक २७)
(जो धीर पुरुष अनेक विचारों से थककर अपने स्वरूप में विश्राम पा चुका है,
वह न कल्पना करता है, न जानता है, न सुनता है और न देखता ही है)
आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति तो स्पष्ट ही है कि ये जो दिखाई देता है, ये सिर्फ़ भाव है; इसमें परमार्थ कहीं नहीं है। मानसिक है, मानस है, उससे अर्थ यही है कि आख़िरी नहीं है। ये चीज़ जो है ये आख़िरी नहीं है, इसके पीछे भी कुछ है। जैसा दिखता है, उस दिखने को ही आख़िरी मत मान लेना। जो दिखाई देता है, उससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण कुछ है, उससे कहीं ज़्यादा कुछ आगे का, ऐसा है जो दिखाई नहीं देता, पर है ज़रूर। जो दिख रहा है वो नकली है, ये नहीं कहा जा रहा; ये कहा जा रहा है कि सिर्फ़ उतना ही नहीं है जितना दिखाई देता है। जो दिखाई देता है वो बात आख़िरी नहीं है; पारमार्थिक नहीं है।
इसमें कहा गया है: “न किन्चित परमार्थतः”, देखिए, तीन तल हैं जिनपर हमको प्रतीतियाँ होती हैं, पारमार्थिक उसमें से आख़िरी तल होता है। उससे पहले दो तल और भी होते हैं — प्रातिभासिक (इमेजिनेशन) और आधिभौतिक (फैक्ट)। तो बस यही कहा जा रहा है कि जो दिखाई दे रहा है, वो आधिभौतिक है, पारमार्थिक (ट्रुथ) नहीं है।




