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राष्ट्रवाद: वेदांत के ज्ञान से सेना के सम्मान तक || आचार्य प्रशांत, सैनिकों को श्रद्धांजलि (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मैं मूलतः बिहार से हूँ, पर पिछले पंद्रह वर्ष से दिल्ली में हूँ। मेरे छोटे बेटे ने अपनी अधिकांश शिक्षा दिल्ली से ली है, और अब वो दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहा है। हमारे पिताजी सेना में थे, युद्ध भी लड़े थे, और हमारे घर में फ़ौज और सेना की बड़ी इज़्ज़त रही है। पर अब पिछले कुछ साल से बेटा कहता है कि, "सरकारी या प्राइवेट नौकरी करने वाला एक आम कर्मचारी भी तो तनख़्वाह लेकर अपना काम करता है, और सैनिक भी तनख़्वाह लेकर अपना काम करता है, फिर सैनिक को अधिक सम्मान देने की क्या ज़रूरत है?"

बेटा कहता है कि, "सेना और राष्ट्र को लेकर लोग बेकार ही भावुक होते रहते हैं।" और वो मुझसे बहस करता है कि काम और काम में कोई अंतर नहीं होता, तो किसी एक काम को करने वाले को ख़ास महत्व या इज़्ज़त देना आवश्यक नहीं है। मुझे उसकी बातें बुरी तो लगती हैं, पर उसे समझाने के लिए मेरे पास कोई सटीक तर्क नहीं होता। कृपया मदद करें।

आचार्य प्रशांत: पहली बात तो ये जो प्रचलित मुहावरा है कि "काम और काम में कोई अंतर नहीं होता," ये बहुत उथला है, बिल्कुल भी ठीक नहीं है। इसको समझने की बहुत ज़रूरत है।

करने वाले के सामने हमेशा दो रास्ते होते हैं: सही काम करना और ग़लत काम करना। ऐसा काम करना जो बहुतों की मदद करेगा, और ऐसा काम करना जो सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिए हो। ऐसा काम करना जो ख़ुद को और दूसरों को मुक्ति की ओर, होश की तरफ़ ले जाता हो, और ऐसा काम करना जो ख़ुद को और दूसरों को बंधनों की ओर और बेहोशी की ओर ले जाता हो। तो काम और काम में अंतर तो होता ही है क्योंकि कर्ता की एक अवस्था और दूसरी अवस्था में अंतर तो होता ही है। आप प्रेम के भाव से एक काम कर रहे हैं, आप घृणा के भाव से एक काम कर रहे हैं, आपके मन की इन दोनों अवस्थाओं में अंतर है ना या एक ही हैं?

आपके दिमाग़ पर ईर्ष्या, द्वेष, किसी किस्म की हिंसा चढ़ी हुई है। इस समय आपका उद्देश्य ही एक है कि किसी तरह सामने वाले को नीचा दिखा दूँ, उसका नुक़सान कर दूँ—ये मन की एक हालत है। इस हालत में एक काम होता है। और मन की दूसरी हालत है जिसमें समझदारी है, करुणा है, दूसरे के हित का कुछ ख़याल है—ये मन की बिल्कुल दूसरी हालत है। इस दूसरी हालत में आप आदमी ही समझिए दूसरे हैं। तो मन की इन दो अवस्थाओं से निकलने वाले काम तो अलग-अलग होंगे ही।

इसी तरीक़े से एक आदमी जीवनभर करने के लिए जो भी काम चुनता है—जीवनभर करने के लिए या साल-दो-साल करने के लिए, एक क्षण ही करने के लिए, चुनाव तो चुनाव है। आप कोई काम चुनें दो मिनट करने के लिए, चाहे दो साल करने के लिए, चाहे बीस साल करने के लिए, तो ये जो आप काम का चुनाव करते हैं, ये भी मन की दो अवस्थाओं से हो सकता है ना? एक अवस्था ये होती है कि — "मैं क्यों ख़याल करूँ कि मैं करने क्या जा रहा हूँ और उसका पूरी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा? मुझे तो बस अपना उल्लू सीधा करना है, मुझे तो बस अपना स्वार्थ नापना है।" तो नौकरी का चयन आप ऐसे भी कर सकते हैं। और नौकरी का, अपने काम का, अपने पेशे का चयन ऐसे भी करा जा सकता है कि आपके सामने ज़्यादा बड़ा विस्तृत आदर्श हो, और उस आदर्श की सेवा करने के लिए आपने वो काम चुना हो।

तो इसलिए ये ठीक नहीं है कि आप कह दें कि सब काम एक होते हैं, और किसी प्राइवेट कंपनी में कोई यूँ ही नौकरी कर रहा है, या कोई सरकारी नौकरी कर रहा है, या कुछ अपना काम-धंधा कर रहा है, और एक सैनिक है, इन सब के काम में कोई अंतर नहीं है, तो सैनिक को किसी सम्मान वगैरह की कोई ज़रूरत नहीं है। देखिए, सम्मान सभी का करा जाना चाहिए। लेकिन जैसे आदमी और आदमी में फ़र्क़ होता है, वैसे ही काम और काम, पेशे और पेशे में फ़र्क़ होता है। कुछ पेशे होते हैं इस क़ाबिल कि अगर उनको करने वाला ईमानदार है, तो वो एक विशेष सम्मान का पात्र होता है।

तो पहली चर्चा करी हमने इस बात पर कि काम और काम में भेद होता है। दूसरी चर्चा अब हम इस बात पर करते हैं कि क्या एक सैनिक तनख़्वाह लेता है, तो तनख़्वाह लेने की वजह से वो किसी भी अन्य पेशेवर के ही स्तर पर आ गया? लोगों का अक्सर तर्क ये होता है कि कोई भी आदमी है—कोई आदमी सरकारी दफ़्तर में काम कर रहा है, कोई प्राइवेट कंपनी में सेल्स की नौकरी कर रहा है, कुछ भी कर रहा है—वो भी पैसे लेता है और पैसे लेकर काम करता है, और सैनिक भी पैसे लेता है और पैसे लेकर काम करता है। चलिए ज़रा इस बात का गहराई से अन्वेषण करें।

आप पैसे लेते ही किसके लिए हो? पैसा माने धन, ठीक? वो क्या ख़रीद सकता है आपके लिए? को आपके लिए कोई सुदूर सत्य तो ख़रीद कर ला नहीं सकता। पैसे से आप क्या ख़रीदते हो? चीज़ें। पैसे से गुड्स एंड सर्विसेज़ (वस्तुऍं और सेवाऍं) ही ख़रीदी जा सकती हैं ना? और तो आप कुछ ख़रीद नहीं सकते।

सब वस्तुओं का और सेवाओं का उपभोक्ता कौन होता है? आप पैसा लेकर गए बाज़ार, उस पैसे से आपने आलू ख़रीदा और बाल कटवाए—आलू ख़रीदा माने आपने चीज़ों का क्रय किया, और बाल कटवाए माने आपने सेवाओं का क्रय किया, ठीक है ना? गुड्स एंड सर्विसेज़ (वस्तुऍं और सेवाऍं) दोनों आ गए। ये जो आलू ख़रीदा है, ये कहाँ जाना है? शरीर में। और ये जो बाल थे, ये कहाँ थे? शरीर में। तो आप जो भी काम करते हो, जिसके लिए आप तनख़्वाह लेते हो, वो आप काम करते ही किसके लिए हो? शरीर के लिए।

आपको जो धन मिल रहा है—चलिए आप काम किसी और वजह से करते होंगे, आपका दावा होगा, अभी मैं उसमें नहीं जा रहा—आपको जो पैसा मिलता है, उससे आप अधिकांशतः जो भी लाभ उठाते हो वो लाभ शरीर के लिए ही होता है ना? आप उस पैसे से घर बनवा लोगे, घर में कौन रहेगा? आपका शरीर ही रहेगा। उस पैसे से आप कपड़े ख़रीद लोगे, कपड़े कौन पहनेगा? शरीर पहनेगा कपड़ों को। आप उस पैसे से गाड़ी ख़रीद लोगे, गाड़ी में कौन चलता है? शरीर चलता है। यहाँ तक कि आप ये कहो कि "नहीं साहब, उस पैसे से मैं इज़्ज़त कमाता हूँ, उस पैसे से मुझे समाज में मान-सम्मान मिलता है,” तो उस मान-सम्मान का भी अनुभव करने वाला आपका मस्तिष्क ही है ना? मस्तिष्क ना हो, तो क्या आपको सम्मान या अपमान किसी का भी अनुभव होगा? मस्तिष्क भी कहाँ है? शरीर में। तो पैसे से आप शारीरिक लाभ या सुख ही तो उठाते हो; पैसा शरीर के लिए होता है।

जो भी आदमी नौकरी करने निकलता है, अगर वो उस नौकरी से पैसा पाता है, तो पैसा होता है शरीर के लिए। लेकिन जो सैनिक है, उसके साथ एक बहुत उल्टी या आगे की चीज़ हो जाती है। वो शरीर के लिए आपसे तनख़्वाह तो ले रहा है, लेकिन बहुत मौके ऐसे आते हैं जब वो शरीर को ही दाँव पर लगा देता है। तो सैनिक की और किसी आम कर्मचारी की स्थिति का अंतर समझिएगा: आम कर्मचारी शरीर के लिए पैसा कमा रहा है। वो शरीर को ऊपर रख रहा है। वो कह रहा है कि शरीर ऊपर है, उसके लिए पैसा आएगा, शरीर को सुख मिलेगा, शरीर का काम-धंधा चलेगा। लेकिन सैनिक के साथ ऐसी स्थिति आ जाती है जब उसे शरीर को ही दाँव पर लगाना पड़ता है। अब ये काम और कोई भी पेशेवर नहीं करता।

आप कहेंगे, "लेकिन साहब, जो लोग फ़ौज में जाते हैं, उन्हें तो पहले से ही पता होता है ना?” ऐसे तर्क अक्सर दिए जाते हैं कि "ये तो प्रोफेशनल रिस्क है। जब आप फ़ौज में जा रहे हो, तो आपको पहले ही पता होता है कि गोली खाने की नौबत आ सकती है, तो आपको तनख़्वाह भी उसी मुताबिक दी जाती है।" साहब, आपको मैं कितने पैसे दे दूँ कि आप मुझे अपनी जान दे देंगे? तो ये बेतुके तर्क मत करिए।

तर्क ये है कि जब आदमी फ़ौज में जा रहा है, तो उसको पहले ही पता है कि गोली खाने की नौबत आ सकती है। तो वो तो जानबूझकर जा रहा है, तो उसे सम्मान देने की क्या ज़रूरत है? और वो गोली खा भी लेता है, तो इसमें भावुक होने की क्या ज़रूरत है?

तो जो लोग ऐसा तर्क देते हैं, मैं उनसे कह रहा हूँ, बताइए, आपको कितने पैसे दूँ, तो आप आपकी जान मुझे दे देंगे? आप कह रहे हैं कि एक छोटी-सी तनख़्वाह की ख़ातिर सैनिक अगर सीमा पर गोली खा रहा है, तो इसमें विशेष बात क्या है, ठीक? और सैनिक को कितनी तनख़्वाह मिलती है? कोई लाखों-करोड़ों तो मिलते नहीं; साधारण-सी उसकी तनख़्वाह है।

आप कह रहे हैं कि "उसने सीमा पर गोली खाई है क्या हुआ? वो पैसे भी तो लेता था।" तो मैं कह रहा हूँ, पैसे जितने सैनिक को मिलते थे मैं उससे दस गुने दिए देता हूँ। कहिए, आप देंगे मुझे अपनी जान? मुझे मत दीजिए, आप सीमा पर भी जान देंगे अपनी? तब भी नहीं देना चाहेंगे।

तो लोग कहते हैं कि "हम नहीं देंगे, पर सैनिक भी कौन-सा जानबूझकर देता है? वो कौन-सा मरना चाहता था? वो तो गोली लग गई।" नहीं, ऐसा नहीं होता है। उसे पता होता है कि वो जो काम कर रहा है, जिस मिशन में जा रहा है, जिस अभियान पर निकला है, उसमें निश्चित रूप से ख़तरा है। तो आप कितने भी तर्क दे लें, अगर आप थोड़ी सद्बुद्धि लगाऍंगे, तो आपको मानना पड़ेगा कि आदमी का जो गहरे से गहरा तादात्म्य होता है वो होता तो शरीर से ही है ना? और जो आदमी ऐसा पेशा चुने जिसमें शरीर को ही गँवाने का ख़तरा हो, उस आदमी को कुछ तो मूल्य मिलना चाहिए।

अध्यात्म भी क्या सिखाता है? आदमी का बड़े से बड़ा अहंकार—अहंकार माने किसी चीज़ से जुड़ाव या तादात्म्य—क्या होता है? देहाभिमान। अध्यात्म यही सिखाता है ना, "नाहं देहास्मि"? क्योंकि बच्चा पैदा होते ही अपने-आपको क्या मानना शुरू कर देता है? देह। हम सब जीवनभर ख़ुद को क्या मानते हैं? देह। एक ज़रा-सी खरोंच लग जाती है, तो हम उसका ख़याल करने लगते हैं। थोड़ी-सी चोट लग जाती है, तो दिनभर हमारे सिर पर नाचती है, और अगर आप उनमें से हैं जो अपने शरीर को आकर्षक वगैरह बनाकर रखना चाहें, तो आपके मुँह पर ज़रा-सा दाग-धब्बा आ जाए, फोड़ा-फुंसी आ जाए, देखिए आपको कितना बुरा लगता है, लगता है कि नहीं लगता है? क्योंकि हमारा जो मूल तादात्म्य है, हमारी जो प्रारंभिक ही पहचान है, वो शरीर से है— आई एम द बॉडी (मैं शरीर हूँ)।

तो किसी के लिए भी कुछ भी खोना फिर भी आसान है; शरीर खोना सबसे मुश्किल, सबसे ज़्यादा कलेजे का, सबसे ज़्यादा वीरता का काम है। आप और चीज़ें खोते हो, तो कम-से-कम आपके पास वो तो बचा रह गया ना जो उन चीज़ों का भोग करता या अनुभव करता? वो चीज़ें कभी दोबारा आ जाऍंगी। लेकिन शरीर को खोने का मतलब होता है कि आपने अपना वो उपकरण ही खो दिया जो कि किसी भी चीज़ का कभी-भी भोग करता, माने कि अब आपके लिए संसार ही नष्ट हो गया। तो धन गँवाना, प्रतिष्ठा गँवाना, ज्ञान गँवाना, परिवार गँवाना, इन सब से कहीं ज़्यादा मुश्किल होता है देह गँवाना। जो देह गँवाने के लिए जानते-बूझते तैयार हो रहा हो, उस आदमी में थोड़ी तो ख़ासियत होगी।

बेटे को ये बातें सिखाइए। दिल्ली की हवा में आकर कुछ मूलभूत चीज़ें वो भूल गया है। बिहार में लोग ये चीज़ें नहीं भूलते हैं। पूरब में जो ज़मीनी बातें होती हैं, वो लोगों को पता होती हैं। भले ही आसमानी सुख-सुविधाऍं और पैसा लोगों के पास ना हो, लेकिन ज़मीनी बुद्धि ज़रूर होती है। दिल्ली का मामला थोड़ा अलग है।

पहली बात, काम और काम में क्या अंतर है, हमने उसको समझा। दूसरा, सेना की क्या बात है, इसे समझा। तीसरा, आपका बेटा कहता है कि राष्ट्र को भी लेकर आप लोग बेकार ही भावुक होते रहते हैं। देखिए, देश कोई कंपनी नहीं होता कि आप कहें कि एक आदमी एक कंपनी के लिए काम कर रहा है और एक आदमी देश सेवा कर रहा है, तो दोनों एक बराबर हैं। कंपनी होती है कुछ गिने-चुने लोगों के शेयर्स की क़ीमत को बढ़ाने के लिए, शेयरहोल्डर वैल्यू (शेयर-धारक मूल्य) को उच्चतम स्तर पर पहुँचाने के लिए। यही कंपनी की हस्ती का कुल उद्देश्य होता है।

एक कंपनी होती ही किसलिए है? ताकि जिन लोगों के पास उसके शेयर हैं उनको अधिकाधिक मुनाफ़ा होता रहे। ये कंपनी के होने का उद्देश्य है। तो आप एक कंपनी के लिए काम कर रहे हैं, तो आप कुल मिलाकर क्या कर रहे हैं? आप कुछ मुट्ठीभर लोगों की जेबें गर्म कर रहे हैं और अपना हित साध रहे हैं। आप उन लोगों की जेबें गर्म कर रहे हैं, तो बदले में वो भी आपको कुछ दे देते हैं। हाँ, आप उसमें पाँच बातें और जोड़ सकते हैं समाज के लोग करते हैं। ठीक है, मैं उन बातों को मानता हूँ, लेकिन ले-देकर कंपनी चीज़ें सिर्फ़ वही बनाएगी जिससे कि शेयर-होल्डर्स की जेबें भरती रहें।

अगर आप कहेंगे कि आपकी कंपनी जो चीज़ें बनाती है उससे समाज को भी फ़ायदा होता है, तो एक बात बताइए, अगर समाज को फ़ायदा हो रहा हो लेकिन शेयर-होल्डर को मुनाफ़ा नहीं हो रहा हो, तो क्या आपकी कंपनी वो चीज़ें बनाती रहेगी? माने आप समाज को मुनाफ़ा भी कराते हैं अगर, तो भी सिर्फ़ इसलिए ताकि समाज को जो मुनाफ़ा हो रहा है उसके एवज में आपके शेयर-होल्डर्स को, मालिकों को, आकाओं को दोगुना, तिगुना, चौगुना फ़ायदा होता रहे, ठीक है ना?

तो ये हुआ एक कंपनी का कुल आधार कि कंपनी किस बुनियाद पर खड़ी है? शेयर-होल्डर्स को मुनाफ़ा होता रहे, इस बुनियाद पर खड़ी है। देश किस बुनियाद पर खड़ा होता है? देश कंपनी नहीं होता। लोग तर्क देते हैं, कहते हैं, "देखो तुम एक कंपनी से कोई समान ख़रीदते हो, उसको पैसा देते हो, बात ख़त्म। भावुक होने की तो कोई बात नहीं। इसी तरीक़े से तुम सरकार को टैक्स देते हो और सरकार तुम्हारे लिए सड़क बनवा देती है, अस्पताल बनवा देती है, तुम्हें पुलिस की सेवा दी देती है, फ़ौज की सेवा दे देती है, इसमें भावुक होने की कोई बात नहीं।" वो सरकार की तुलना करते हैं एक कंपनी से। वो कहते हैं कि "कंपनी को भी तुम पैसा देते हो, सरकार को भी तुम टैक्स देते हो; कंपनी भी तुम्हें कुछ सुख-सुविधाऍं देती हैं, सरकार भी तुम्हें सेवाऍं वगैरह देती है, तो तुम क्यों इतने भावुक होते हो?” वो लोग कुछ मूलभूत बातें नहीं समझते।

मूलभूत बातें ये है कि देश जिस बुनियाद पर खड़ा है, वो उससे बहुत भिन्न है जिस बुनियाद पर कंपनी खड़ी है। देश की आधारशिला होता है कोई बड़ा आदर्श; कंपनी की बुनियाद में कोई बड़ा आदर्श नहीं होता। कंपनी की बुनियाद किस पर है? मुनाफ़े पर। और देश की बुनियाद होती है बहुत बड़े आदर्शों पर। किसी कंपनी का तुमने कोई संविधान देखा है? भारत का संविधान है, और भारत के संविधान में बहुत उच्चतर मूल्य संग्रहित हैं। कोई कंपनी कहती है कि मैं इसलिए हूँ ताकि सब लोगों को समान अधिकार मिल सकें, शिक्षा मिल सके, लोगों में स्वस्थ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आ सके? कहो, कोई कंपनी कहती है क्या ऐसा? देश कहता है!

देश यूँ ही नहीं बन जाता। देश सिर्फ़ कोई राजनैतिक इकाई नहीं होती। ये अभी मैं कुछ दिन पहले भी कह रहा था कि देश के केंद्र में होता है राष्ट्र। देश ऐसे ही नहीं बन गया कि चार-पाँच इधर-उधर के राज्य आए और उन्होंने आपस में समझौता किया, फिर वो एक देश कहलाने लग गए। ऐसे नहीं होता है; कोई उथली राजनैतिक प्रक्रियाभर का परिणाम नहीं होता है एक राष्ट्र।

देश के केंद्र में राष्ट्र होता है, राष्ट्र के केंद्र में होता है राष्ट्रीय मूल्य।

कोई साझा आदर्श होता है, कोई साझा उच्च लक्ष्य होता है जिसके कारण लोग आपस में संबंधित होते हैं, गुथे होते हैं, उसके आधार पर देश बनता है। नहीं तो मुझे बताओ, इतना लंबा चौड़ा भारत है, और भी दुनिया में देश हैं जो बहुत लंबे चौड़े हैं, वो एक रह कैसे सकते हैं? सिर्फ़ राजनैतिक तौर पर एक रह लेंगे क्या? कैसे रह लेंगे? नहीं, राजनैतिक तौर पर नहीं रह सकते; कोई और बात होनी चाहिए, कोई उच्चतर मूल्य होना चाहिए, कोई उदीप्त भावना होनी चाहिए, तब जाकर एक देश एक साथ रहता है।

भारत भी ऐसे ही थोड़ी है, अंग्रेज़ों से आज़ादी मिले भी सत्तर से ऊपर बरस हो गए, और हम कहते हैं कि भारत विविधताओं का देश है। इतनी विविधताऍं होते हुए भी क्या है जो सब लोगों को एक सूत्र में पिरोकर रखता है? ज़रूर कोई शेयर्ड आइडियल (साझा आदर्श) है, ज़रूर कुछ साझी मान्यताऍं हैं, कुछ साझे मूल्य हैं। बात समझ में आ रही है? और वो ऊँचे-से-ऊँचे मूल्य होते हैं—या होने चाहिए कम-से-कम। किसी राष्ट्र की बुनियाद में अगर ऊँचे मूल्य नहीं होंगे, तो वो राष्ट्र बहुत दिन फिर चलेगा भी नहीं, विखंडित हो जाएगा, कुछ और हो जाएगा उसके साथ। समझ रहे हो बात को?

भारत के बारे में कहते हैं ना कि, "कुछ बात तो है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।" वो क्या बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी? राजनैतिक स्तर पर तो भारत ना जाने कितनी बार टूटा-फूटा। तो देश तो यहाँ पर कोई एक स्थायी रह ही नहीं पाया, रह पाया क्या? भारत का नक़्शा लगातार बदलता रहा है, हर पचास साल में बदलता रहा है, बदलता रहा है कि नहीं राजनैतिक नक़्शा? लेकिन एक राष्ट्र के तौर पर भारत लगभग अक्षुण्ण रहा है, अखण्ड रहा है। उसकी वजह है। यहाँ के सब लोगों के निश्चित रूप से कुछ साझे और ऊँचे मूल्य हैं।

ये दोनों शर्तें पूरी होनी चाहिए: मूल्य साझे होने चाहिए और मूल्य ऊँचे होने चाहिए। वो जो साझे और ऊँचे मूल्य हैं, जो भारत को एक राष्ट्र के तौर पर एक रखते हैं, वो मूल्य वास्तव में आध्यात्मिक हैं, ठीक है? तो जो ये भारत देश है, फिर मुझे बताओ कि ये क्या है? ये उन आध्यात्मिक मूल्यों की राजनैतिक अभिव्यक्ति है। भारत राष्ट्र है और उसके केंद्र में क्या है? आध्यात्मिक मूल्य।

आध्यात्मिक मूल्य हैं तभी तो वो चले आ रहे हैं पिछली बीस शताब्दियों से। नहीं तो मैं कह रहा हूँ कि भारत कब का अपने मूल्य खो चुका होता, पर भारतीयों की एक अलग पहचान है। वो बात भारतीयों को भले ही कम समझ में आती है किंतु विदेशियों से पूछोगे तो वो बता देंगे। वो जानते हैं कि राष्ट्र के तौर पर, कंट्री (देश) नहीं, नेशन (राष्ट्र) के तौर पर भारत की क्या पहचान है। वो जानते हैं कि भारत की जो केंद्रीय पहचान है, उसमें बोध आता है, उसमें गहराई आती है, उसमें सत्य आता है, उसमें करुणा आती है, मतलब कि उसमें अध्यात्म आता है।

अध्यात्म ही है जो भारत को एक राष्ट्र के तौर पर पिछली बीस-पच्चीस शताब्दियों से एक रखे हुए है। राष्ट के तौर पर एक रहे हैं, देश के तौर पर बनते-बिगड़ते रहे हैं।

अभी सत्तर-पिछत्तर साल पहले तक पाकिस्तान, बांग्लादेश भी राजनैतिक तौर से सब भारत का ही हिस्सा थे, ब्रिटिश इंडिया का, थे कि नहीं? और इतना ही नहीं, पाँच-सौ राजे-रजवाड़े थे जो अपनी-अपनी अलग सत्ता चला रहे थे। तो राजनैतिक तौर पर तो बहुत उथल-पुथल चलती ही रहती है, राष्ट्रीयता लगातार कायम रहती है। अब 1947 के बाद से एक अभिनव प्रयोग हुआ है। वो अभिनव प्रयोग ये है कि वो जो भारत राष्ट्र था, वो भारत देश बनकर सामने आया है। बात समझ रहे हो? राष्ट्रीय मूल्यों को राजनैतिक अभिव्यक्ति मिली है। तो ये देश कोई हल्की-फुल्की चीज़ नहीं है।

भारत को यूँ ही कोई एक पॉलिटिकल एंटिटी (राजनैतिक इकाई) मत मान लेना; एक राजनैतिक इकाई नहीं है भारत।

भारत, फिर से कह रहा हूँ, चौथी-पाँचवीं बार दोहरा रहा हूँ, जो ये भारत देश भी है, द कंट्री कॉल्ड इंडिया, ये गहरे आध्यात्मिक मूल्यों की राजनैतिक अभिव्यक्ति है, तो ये पूजनीय है। ये पूजनीय किसलिए है? क्योंकि ये भारत देश रहेगा, तो वो आध्यात्मिक मूल्य भी कायम रहेंगे। उन आध्यात्मिक मूल्यों के कायम रहने के लिए आवश्यक है कि ये भारत देश रहे, एक राजनैतिक सत्ता रहे। वो राजनैतिक सत्ता जब रहती है, तो वो फिर देश में इस तरह का माहौल तैयार कर सकती है, इस तरह का नियम-कायदा-कानून रख सकती है कि वहाँ बसने वालों, वहाँ पैदा होने वालों, वहाँ पलने और बढ़ने वालों में एक ख़ास तरह की मानसिकता रहे, मूल्य उनके ऊँचे रहें, संस्कार उनके शुद्ध रहें।

देश का मतलब ये ही नहीं होता कि सरकार है, और सरकार बिजली-पानी-सड़क का काम कर देगी। ये तो आपने बहुत ही अटपटी बात कर दी। कम-से-कम भारत देश तो ऐसा नहीं है जिसमें राज्य का काम बस ये है कि वो आपके लिए सड़क, पानी और बिजली की, कानून की व्यवस्था का इंतज़ाम देखता रहे। नहीं! नहीं! भारत देश इसलिए है ताकि भारत राष्ट्र सुरक्षित रहे। राष्ट्रों के पास फ़ौजें नहीं होती, राष्ट्रों के पास बस एक भावना होती है, एक आदर्श होता है। अगर सामान्य भाषा में कहूँ, तो राष्ट्रों के पास फ़ौजें नहीं होती, राष्ट्रों के पास आत्मा होती है। फ़ौजें देश के पास ही हो सकती हैं।

तो जो भारत देश है वो शरीर है, और जो भारत राष्ट्र है, ऊँचे मूल्यों वाला, वो उस शरीर की आत्मा है। अब एक बात बताओ, शरीर नहीं रहेगा, तो बेचारी आत्मा करेगी क्या?

कोई संत हों, कोई ऋषि हों, कृष्ण हों, बुद्ध हों, इनके शरीर की कोई क़ीमत है या नहीं है? या ये कहोगे कि सत्य तो आत्मा मात्र है, शरीर रहे ना रहे? कोई पूजनीय आदमी हो, कोई ऊँचा आदमी हो, उसके शरीर की क़ीमत कुछ है या नहीं है? शरीर की क़ीमत है, क्योंकि शरीर नहीं रहेगा तो फिर आत्मा को अभिव्यक्ति कौन देगा? कबीर साहब याद हैं ना?

सब घट मेरा साइयाँ सूनी सेज न कोय ।

बलिहारी वा-घट्ट की जा-घट पर-गट होय ।।

~ कबीर साहब

‘घट’ माने शरीर। आत्मा तो सर्वत्र है—संतजन कह गए हैं कि आत्मा तो सर्वत्र है। कौन-सी ऐसी जगह है जहाँ आत्मा ना हो? आत्मा के अलावा तो कुछ है नहीं। लेकिन वो शरीर अद्भुत होता है, विरल होता है, जिसमें वो आत्मा अभिव्यक्ति लेती है। ऐसा बस किसी-किसी का शरीर होता है—कभी किसी कृष्ण का, कभी किसी कबीर का—जहाँ पर वो शरीर वाहन बन गया हो आत्मा की अभिव्यक्ति का।

तो जो भारत देश की परिकल्पना करी गयी थी, वो इसी आधार पर थी कि वो उच्चतर मूल्यों का वाहक बनेगा। इसीलिए उस देश की रक्षा की जानी बहुत आवश्यक है। आप ये नहीं कह सकते कि, "देश तो एक राजनैतिक इकाई है, टूटती है तो टूट जाने दो।" ये बात किसी भी देश पर लागू नहीं होती, भारत पर तो बिल्कुल भी लागू नहीं होती। भारत देश बस एक राजनैतिक इकाई नहीं है; भारत देश अपने आप में रोशनी है।

भारत देश के पीछे बहुत ऊँचे सिद्धांत हैं। अगर ये देश नहीं रहेगा, तो उन सिद्धांतों को भी ताक़त और अभिव्यक्ति देने वाला कौन रहेगा? सिद्धांत बच जाऍंगे पर उन सिद्धांतों की अभिव्यक्ति नहीं बचेगी। सिद्धांत तो बच जाऍंगे पर उन सिद्धांतों के आधार पर चलने वाली कानून व्यवस्था नहीं बचेगी; सिद्धांत तुम लेकर बैठे रहना। तो अगर भारत देश, भारत राष्ट्र की अभिव्यक्ति है, और इसीलिए भारत देश पूजनीय है—और देश से मेरा मतलब है एक बाहरी व्यवस्था, एक शरीर, एक राजनैतिक व्यवस्था, एक ज़मीनी व्यवस्था—तो उस ज़मीन की सीमाओं का फिर जो प्रहरी है, उसको भी कुछ इज़्ज़त दोगे या नहीं दोगे, बोलो?

और भारत देश किसी आसान माहौल में तो रहता नहीं है। हमारा मौहल्ला जानते हो ना कैसा है? पड़ोसी हमारे देखे हैं ना कैसे हैं? छोटे-बड़े सब आँख दिखाते हैं। कोई इधर से नोचने को तैयार है, कोई उधर से खसोटने को तैयार है, कोई नीचे से परेशान कर रहा है, कोई दाएँ से कील चुभो रहा है, कोई बाएँ से।

तो इसलिए इस माहौल में जो व्यवहारिक बात है वो ये है कि सेना और सैनिकों का महत्त्व निश्चित रूप से है। अगर ये देश महत्वपूर्ण है, अगर ये देश किन्हीं मूल्यों, सिद्धांतों, आदर्शों का प्रतिनिधि है, तो इस देश की जो रक्षा करने वाला है वो निश्चित रूप से विशेष है, वो सम्मान का अधिकारी है

ये बात दिल्ली इंटरनेशनल स्कूल वाले और दिल्ली के आज़ाद ख़्याल विश्वविद्यालयों के लोग शायद नहीं समझते पर उन्हें समझनी चाहिए। थोड़ा अगर वो बुद्धि लगाऍंगे, थोड़ा अगर गहराई से देखेंगे, तो कुछ बातें उन्हें ज़रूर समझ में आऍंगी।

प्र१: आचार्य जी, जिन विद्यालयों में हम पढ़ें हैं उनमें राष्ट्रवाद को बहुत नकारात्मकता के साथ प्रस्तुत किया जाता है कि विश्व में जितनी भी बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ हुई हैं, वो जिन आधारों पर हुई हैं, उनमें राष्ट्रवाद भी एक जगह रखता है। तो इस संकोच के साथ खुद को राष्ट्रवादी बोलने में आज की युवा पीढ़ी बड़ा डर महसूस करती है।

आचार्य जी: राष्ट्रवाद बुरा है, राष्ट्रवाद जिसको है वो बुरा नहीं है। ईर्ष्या बुरी है, ईर्ष्या जिसको है वो बुरा नहीं है। तुम कर दो राष्ट्रवाद को प्रतिबंधित; ईर्ष्या को भी करो, द्वेष को भी करो। भाई, द्वेष के कारण ही तो लड़ाइयाँ होती हैं। ये क्यों कह रहे हो कि राष्ट्रवाद के कारण लड़ाइयाँ होती हैं? राष्ट्र और राष्ट्र यूँ ही तो आपस में नहीं लड़ जाते; उनके बीच में जब क्या होता है? द्वेष, तब वो आपस में लड़ते हैं ना; द्वेष माने एक-दूसरे के प्रति शत्रुता की भावना। एक राष्ट्र है और दूसरा राष्ट्र है, क्या वो ऐसे ही उठ कर लड़ना चालू कर देते हैं? उनके बीच में क्या होता है तो लड़ते हैं? द्वेष। तो द्वेष पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाते?

मूल बात नहीं करेंगे। हम ये नहीं कहेंगे कि हमारे मन के भीतर अहंकार भरा हुआ है, हिंसा भरी हुई है, उसकी बात नहीं करेंगे, कहेंगे "राष्ट्र बुरा है।" अच्छा, चाकू बुरा है क्योंकि चाकू का इस्तेमाल करके किसी की गर्दन कट गई। नहीं, चाकू भी नहीं, लोहा बुरा है। आज से लोहे पर प्रतिबंध लगा देते हैं। ईंट बुरी है क्योंकि किसी ने किसी के सिर पर ईंट दे मारी। वो हाथ बुरा नहीं है, वो मन बुरा नहीं है जो ईंट का ग़लत इस्तेमाल कर रहा है। ईंट पर प्रतिबंध लगाओ; आज से कोई भी मकान खड़ा नहीं होगा। राष्ट्र क्या खड़ा करना है? राष्ट्र तो गिरा ही दो, सारे मकान गिरा दो क्योंकि मकान में ईंट होती है और ईंट का इस्तेमाल करके लोग एक-दूसरे का सिर फोड़ रहे हैं। बस उस मन पर प्रतिबंध मत लगाओ जिसपर हिंसा का, द्वेष का, अहंता का, काम का, क्रोध का, भय का कब्ज़ा है। उस मन की बात मत करना। उस मन की बात क्योंकि करते हो, तो हमारे अहंकार को बहुत ठेस लगती है, और देखो, हम बुद्धिजीवी आदमी हैं। हम तो अहंकार पर ही जीते हैं।

अगर तुमने ये कह दिया कि "कुछ भी बुरा नहीं है; हमारे ही मन का अंधेरा बुरा है,” तो हमें बड़ी चोट लग जाती है। तो हम दुनियाभर की चीज़ों को बुरा ठहरा देंगे, उन्हें प्रतिबंधित करने की बात कर देंगे, कभी ये नहीं कहेंगे कि “जो मन देखा आपना, मुझसे बुरा ना कोय”।

हर चीज़ बुरी है: ईश्वर बुरा है, धर्म बुरा है, प्रथा बुरी है, परंपरा बुरी है, अध्यात्म बुरा है क्योंकि इनके सबके नाम पर लड़ाइयाँ हुई हैं। राष्ट्र बुरा है क्योंकि राष्ट्र के नाम पर लड़ाइयाँ हुई हैं। बस इंसान बुरा नहीं है, क्योंकि अगर तुमने मान लिया कि इंसान अच्छा हो सकता है और इंसान बुरा भी हो सकता है, तो तुम्हें मानना पड़ेगा कि सब इंसान बराबर नहीं होते, और तुमने अगर ये मान लिया, तो तुम्हारे मूल सिद्धांत को चोट पहुँचती है।

तुम्हारा मूल सिद्धांत बुरा है जो कहता है कि हर इंसान दूसरे इंसान के बराबर है। तुम्हारा मूल सिद्धांत ग़लत है जो कहता है कि ऊँची और नीची चेतना होती नहीं। क्योंकि अगर तुमने मान लिया कि चेतना ऊँची भी हो सकती है और नीची भी हो सकती है, तो तुम्हें ये भी मानना पड़ेगा कि चेतना जो ऊँची है वो अपनी ऊँचाई बढ़ाकर अनंत ऊँचाई भी हासिल कर लेती है, और जो चेतना की अनंत ऊँचाई होती है उसे ही 'परमात्मा' बोलते हैं।

लेकिन तुम तो परमात्मा नाम से ही घबराने वाले लोग हो ना? बुद्धिजीवी हो।

अगर तुमने इतना भी मान लिया कि एक आदमी और दूसरे आदमी की चेतना में इंचभर भी ऊँचाई का अंतर होता है, तो अगर इंच की ऊँचाई अंतर हो सकता है, तो दो इंच का भी अंतर हो सकता है, पाँच इंच का भी अंतर हो सकता है, अनंत अंतर भी हो सकता है। अनंत अंतर हुआ नहीं कि तुम्हें मानना पड़ेगा कि लोग होते हैं जो अनंत ऊँचाइयों पर बैठे होते हैं, और लोग होते हैं जो अनंत नीचाई पर बैठे होते हैं। और यदि लोग अनंत ऊँचाई और अनंत नीचाई का फ़ासला रखते हैं अपने मध्य, तो तुम क्या व्यर्थ प्रचार करते रहते हो कि सब आदमी एक बराबर हैं? और जब तुम कहते हो कि सब आदमी एक बराबर हैं, तो ये कहकर तुम लोगों  की मदद नहीं कर रहे; ये कहकर तुम गिरे हुए आदमी को ना उठने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हो। तुम उससे कह रहे हो कि तुम गिरे हुए भी हो, तो भी क्या फ़र्क़ पड़ता है, तुम अभी भी बुद्ध के बराबर हो। तुम और बुद्ध एक समान हो; सब इंसान बराबर हैं एक दूसरे के। अपनी खोट नहीं देखनी है, क्योंकि अपनी खोट देखी, तो अपनी नीचाई माननी पड़ेगी।

जिस आदमी को अपनी खोट नहीं देखनी, उसे दुनिया में सर्वत्र बस साज़िश नज़र आती है। वो कहेगा कि वो साज़िश  कर रहा है मेरे खिलाफ़, वो ग़लत है, उसने ऐसा कर दिया, फ़लानी ताक़तें, फ़लाने वर्ग के लोग। पुरुष वर्ग है, वो स्त्री का शोषण कर रहा है—पहले तो ये प्रचार चला ज़बरदस्त तरीक़े से। अब पुरुषों में भी वर्ग निकल आए हैं जो कह रहे हैं कि "नहीं, स्त्रियाँ हमारा पलट कर शोषण कर रही हैं, कानून स्त्रियों के साथ है वगैरह-वगैरह।" ये मत मानना बस कि इंसान का मन ऐसा है जो उसका शोषण कर रहा है। ये मत मानना कि बस हर आदमी को अपने भीतर झाँकने की ज़रूरत है; अपना दुश्मन उसे वहीं नज़र आ जाएगा।

पर अपने दुश्मन के साथ तो हमने अपनी पहचान जोड़ ली है, और तकलीफ़ में हम ख़ूब हैं। तो जो हमारा असली दुश्मन है भीतर, उसका नाम हम ले नहीं सकते, तो हमारी मजबूरी हो जाती है कि हम दुनियाभर में नकली दुश्मन ढूँढ़ते फिरें। तो हम कहते हैं, "वो फ़लाना वर्ग, फ़लानी क्लास हमारा दुश्मन है, फ़लानी ताक़तें हमारी दुश्मन हैं, फ़लानी तरह का आर्थिक दर्शन हमारा दुश्मन है, पूंजीवाद हमारा दुश्मन है, जातिवाद हमारा दुश्मन है, नाज़ीवाद हमारा दुश्मन है, फ़ासीवाद हमारा दुश्मन है।" तमाम तरह के दुश्मन तुम खोज लो। मैं नहीं कह रहा हूँ कि नाज़ीवाद, फासीवाद, पूंजीवाद दूध के धुले हैं। उनमें होंगे लाख दुर्गुण—जो हैं हीं उनमें—लेकिन उनके दुर्गुण गिनाने से आदमी के मन का अंधेरा थोड़े ही कम हो जाएगा।

जो वो बात करते हैं कि राष्ट्रवाद बहुत बड़ी बीमारी है, वो मुझे ये बताऍं कि -जहाँ राष्ट्रवाद की भावना कम रही है, उन जगहों पर कितनी सुख-शांति रही है? तुम राष्ट्रवाद हटा दो, आदमी अपने-आपको परेशान रखने के लिए और तरीक़े इजाद कर लेगा, क्योंकि ये काम है अहंकार का; उसे अपने आप को परेशान रखना ही रखना है। हाँ, उसे ये कभी नहीं कहना कि, "मैं अहंकारी हूँ, मैं कभी पूछना नहीं चाहता—'कोहम?' आध्यात्मिक किताबों को मैं खोलना नहीं चाहता, सत्य के सामने मैं समर्पण करके सर झुकाना नहीं चाहता, इसलिए मेरे सारे दुख हैं।"

दुनिया की सारी लड़ाइयाँ हम क्या सोच रहे हैं कि सिद्धांतों और उसूलों के कारण होती हैं? क्या पागलपन है! दुनिया की लड़ाइयाँ इसीलिए होती हैं क्योंकि आदमी ताक़त का भूखा है, रक्तपिपासु है। आदमी के भीतर जो अहंकार बैठा है, वो बहुत ज़्यादा असुरक्षित महसूस करता है जब तक उसको ताक़त ना मिल जाए। और उसे कितनी भी ताक़त दे दो, असुरक्षा उसकी बनी ही रहती है।

तो ऊपर से, बाहर से देखने पर तुम कह सकते हो कि लड़ाई इसीलिए हो रही है क्योंकि अमेरिका पूंजीवादी है, रूस साम्यवादी है। ये बेकार की बात है, ये पूंजीवाद और साम्यवाद की लड़ाई थोड़े ही है; ये तो अहंकार की लड़ाई है अहंकार से। और जो भी दो लोग लड़ रहे हैं वो कभी ये थोड़े ही कहेंगे कि हम इसीलिए लड़ रहे हैं क्योंकि हम महाअहंकारी हैं। वो हमेशा अपनी लड़ाई को कोई न कोई मुखौटा पहना देंगे। वो कहेंगे कि, "देखिए साहब ये उत्तर और दक्षिण की लड़ाई है, ये काले-गोरे की, श्वेत-अश्वेत की लड़ाई है, ये स्त्री-पुरूष की लड़ाई है, ये हिन्दू-मुसलमान की लड़ाई है, ये ऊँची जाति और निचली जाति की लड़ाई है।" जो भी दो लोग लड़ रहे होंगे वो हमेशा अपनी लड़ाई को सुसज्जित नाम ज़रूर देंगे। उन नामों से बहक मत जाना।

लड़ाइयाँ सिर्फ़ एक आधार पर होती हैं: आदमी के भीतर हिंसा है, वैमनस्य है, द्वेष है; प्रेम नहीं है, करूणा नहीं है, समझदारी नहीं है, शान्ति नहीं है। लड़ाइयाँ इसलिए होती हैं। और लड़ाइयों को रोकने का भी ये तरीक़ा नहीं है कि तुम किसी एक सिद्धांत को गिरा दो या प्रतिबंधित कर दो और दूसरे किसी सिद्धांत को बढ़ा दो या गौरवान्वित कर दो; लड़ाइयाँ रोकने का तरीक़ा है आदमी के अहंकार को चैन दे दो, शांति दे दो। उसके अलावा कोई तरीक़ा नहीं है।

जब तक तुम वो काम नहीं करोगे तब तक हर स्तर पर क्लेश, कलह और युद्ध होते ही रहेंगे। जब किसी बड़े स्तर पर फ़ौजें लड़ जाती हैं, तो तुम बोलते हो कि, "युद्ध हो गया।" और जो घर में मियाँ-बीवी लड़ जाते हैं, वो युद्ध नहीं है क्या? और एक आदमी के भीतर ही जो अंतरकलह चलती रहती है, जो आदमी अपने ही भीतर बुरी तरह से बँटा हुआ है, वो युद्ध नहीं है क्या? वो बताओ किस राष्ट्रवाद के कारण हो रहा है? बोलो।

मियाँ ने बीवी को ज़ोर का थप्पड़ मारा, बीवी ने मियाँ को पलटकर बेलन मारा, उसका सिर फोड़ दिया। ये राष्ट्रवाद के कारण हो रहा है? ये भी तो युद्ध है, युद्ध है कि नहीं है? कहो। शर्मा जी रोज़ चुपके-चुपके अपने घर का कचरा सुबह-सुबह वर्मा जी के घर पर डाल देते हैं क्योंकि उन्हें वर्मा जी से बड़ी जलन है। बताओ, ये किस राष्ट्रवाद के कारण हो रहा है? दफ़्तर में जो काम कर रहा है उसने कसम खा रखी है कि बिना घूस लिए काम नहीं करूँगा। एक जवान आदमी है, वो पीछे पड़ा हुआ है कि फ़लानी लड़की मुझे हासिल करनी ही करनी है। ये सब राष्ट्रवाद के कारण हो रहा है? ये आदमी के भीतर का अंधेरा है जो उससे तमाम तरह के कुकर्म कराता है। लेकिन तुम आदमी के अंधेरे की बात नहीं करना चाहते, क्योंकि आदमी का अंधेरा ही आदमी का अहंकार है। अंधेरे की बात करो, तो अहंकार को चोट लगती है। समझ में आ रही है बात?

अगर राष्ट्र बेवकूफ़ी के आधारों पर खड़ा हुआ है, तो राष्ट्रवाद बिल्कुल ग़लत है। लेकिन अगर राष्ट्र की बुनियाद में सनातन मूल्य हैं, तो ये राष्ट्र पूजनीय है। कोई ना कहे फिर कि राष्ट्रवाद ख़राब चीज़ है।

प्र२: जो राष्ट्रवाद आप बता रहें हैं, उसमें राष्ट्रवादी के केंद्र में वो उच्चतम मूल्य होता है जिसकी ओर वो सतत बढ़ रहा होता है अपने जीवन में। जो राष्ट्रवाद हमें समान रूप से समाज में दिखता है, उसमें कोई उच्चतम मूल्य तो नहीं होता।

आचार्य जी: और यही बात धर्म पर, यही बात अध्यात्म पर, और यही बात किसी उच्चतर आदर्श पर लागू होती है। तो तुम आदर्श को गुनाहगार बनाओगे या लोगों को सुधारोगे और उनको शिक्षा दोगे? धर्म की और अध्यात्म की मूल शिक्षा बहुत ऊँची है, पर लोगों ने उसे बिगाड़ रखा है, विकृत कर रखा है। लोग धर्म का इस्तेमाल नाजायज़ कामों के लिए कर रहे हैं। तो क्या करें? धर्म को प्रतिबंधित कर दें, या लोगों को शिक्षित करें?

ये कौन-सा कुतर्क है कि धर्म को गाली दो और कहो कि धर्म ही सब समस्याओं का कारण है। इसी तरीक़े से राष्ट्र के ऊँचे सिद्धांत को अगर लोगों ने हथियाकर अपने स्वार्थों के लिए दुर्पयुक्त कर लिया, तो राष्ट्रवाद बुरा है या लोगों को सही शिक्षा और सही नेतृत्व की ज़रूरत है? बोलो।

लोग तो कुछ भी कर सकते हैं। तुम जा करके गंगा को गंदा कर सकते हो, तो इसका क्या मतलब कि गंगा को प्रतिबंधित कर दें, या गंगा में जो नाले आ रहे हैं उनको रोकें? ये अजीब तर्क है। गंगा शुद्ध हैं, बह रही हैं, उनमें पहले तो तुम नाले बहा-बहा कर दूषित कर दो, फिर कहो, "ये गंगा बहुत दूषित है। चलो गंगा पर ही प्रतिबंध लगा देते हैं।" नाले नहीं रोकेंगे, गंगा को गरियाऍंगे। ये तर्क कैसा है?

प्र२: आचार्य जी, ये परिभाषा एकदम नई मालूम होती है। जो परिभाषा हमें पढ़ाई गई है राष्ट्रवाद की या जो जन-जन में हमें बिखरी हुई मिलती है, वो यही है कि आप तब तक राष्ट्रवादी नहीं हो सकते जब तक आपका कोई दुश्मन ना हो। उदाहरण के तौर पर, एक भारतीय राष्ट्रवादी तब हुआ जब उसकी चीन से या पाकिस्तान से दुश्मनी हो गयी।

आचार्य जी: मुझे नहीं मालूम ये बात किस किताब में लिखी हुई है कि एक राष्ट्र को आगे बढ़ने के लिए पड़ोसी देश से शत्रुता ज़रूरी है। राष्ट्र के आधार में मैंने कहा बहुत ऊँचे सिद्धांत होते हैं। ये तुम्हें ऊँचा सिद्धांत लग रहा है कि जाकर पड़ोसी देश की गर्दन दबा दो? ये ऊँचा सिद्धांत तो नहीं है ना? भारत के संविधान में भी जो मूल्य उल्लिखित हैं, उनमें ये लिखा हुआ है क्या कि जितने भी अड़ोसी-पड़ोसी देश हैं, इनसे भिड़ जाओ? जबकि भारत का संविधान तो भारत की राष्ट्रीयता को पूरे तरीक़े से प्रतिबिम्बित भी नहीं करता। वास्तव में भारत के जो राष्ट्रीय मूल्य हैं, वो सनातन हैं। तो भारत का संविधान अच्छा ज़रूर है पर वो पूरे तरीक़े से उन सनातन मूल्यों का प्रतिनिधि भी नहीं है। फिर भी भारत का संविधान ऐसी कोई बात नही करता कि इधर लड़ जाओ, उधर भिड़ जाओ, उसका दमन करो, उसका शोषण करो। तो ये बात कहाँ से आ रही है कि आप राष्ट्रवादी नहीं हैं अगर आप दूसरे देशों से लड़ाई नहीं कर रहे हैं?

जो मूल्य ऊँचे से ऊँचा होगा ना, उसकी पहचान बता देता हूँ: जितनी ऊँचाई पाता जाएगा तुम्हारा मूल्य, उतनी आन्तरिकता पाता जाएगा, उतना ज़्यादा वो अंतर्मुखी होता जाएगा, अपनी ओर देखेगा—"मुझे बेहतर होना है"। आदमी की ऊँचाई की पहचान ही ये होती है —निचला आदमी दूसरों से लड़ता है, और ऊँचा आदमी स्वयं पर विजय प्राप्त करता है।

तो इसी तरीक़े से घटिया राष्ट्रीय मूल्य वो होंगे जो कहेंगे कि, "जाओ दूसरे देशों से लड़ जाओ," और उच्चतर राष्ट्रीय मूल्य वो होंगे जो कहेंगे कि, "इस देश का नागरिक ऐसा हो, जो अपने आप में एक मिसाल हो। जिसने अपने अहम को जीत रखा हो, अपनी बुराइयों को जीत रखा हो, अपनी कमज़ोरियों को जीत रखा हो।"

ये ऊँचे राष्ट्रीय मूल्य हुए।

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