आचार्य प्रशांत: कमलेश ने अभी रूमी से कुछ पढ़ा और कह रहे हैं कि एक स्थान पर रूमी कहते हैं कि बुद्धि, श्रद्धा और विनय, विनम्रता में से श्रेष्ठ है बुद्धि। कहीं से इन्होंने अनुवाद पढ़ा होगा, रीज़न (बुद्धि) फेथ (श्रद्धा) ह्यूमिलिटी (विनम्रता) लिखा हुआ है। तो इनको शंका उठी है, कहते हैं, 'सत्य तो अज्ञेय है, कोई कारण उसे समझा नहीं सकता। तो फिर सत्य कैसे सर्वोच्च—बुद्धि कैसे सर्वोच्च हुई? बुद्धि के पीछे-पीछे कैसे श्रद्धा चली आएगी?'
कमलेश, अभी मेरी ज़बान फिसली थी, है न? मैं क्या बोल गया था?
प्र: 'सत्य सबसे सर्वोच्च है।'
आचार्य: वही है, जब बाप के साथ होते हो तो फिसलते भी तुम शुभ कारणों से ही हो। जो मैंने बोला वही बात है, फिसलकर सच बोल गया।
न बुद्धि श्रेष्ठ है, न श्रद्धा श्रेष्ठ है और न विनय अथवा भक्ति श्रेष्ठ है। श्रेष्ठ तो एक ही होता है, उसको सत्य कहते हैं। वो नहीं है तो तुम्हारी विनम्रता झूठी होगी, वो नहीं है तो तुम्हारी बुद्धि और भक्ति झूठी होंगी, वो नहीं है तो तुम्हारा तर्क झूठा होगा, वो नहीं है तो तुम्हारी श्रद्धा झूठी होगी। और बहुत आसान है, बहुत सम्भव है कि तुम खोखली श्रद्धा लेकर घूमो, बहुत आसान है कि तुम्हारी बुद्धि चलती तो खूब हो पर वो कुबुद्धि हो और बहुत सम्भव है कि तुम भक्ति अथवा विनम्रता के नाम पर बस अपने अहंकार के ही सामने झुक रहे हो।
ये सब-के-सब आचरण की वस्तुएँ बन सकते हैं, ये सब-के-सब तुम्हारा सहारा बन सकते हैं सच्चाई की ख़िलाफ़त करने में। एक-से-एक लोग मिल जाएँगे तुम्हें जिन्हें देखोगे तो कहोगे, ‘वाह! कितनी विनम्रता है इनमें, क्या अदब से बात करते हैं, बड़े झुके हुए रहते हैं।’ और भीतर उनके खड़ा होगा पहाड़ जैसा अहंकार। यह उन्होंने बस साध लिया है विनय को, विनय उनके लिए सिर्फ़ एक व्यवहारगत बात है। यह विनम्रता ऊपर से थोपी हुई है, भीतर के किसी स्रोत से झरने की तरह नहीं बह रही। यह सींची हुई विनम्रता है कि ऊपर से सींच दिया, धरती के भीतर से रस नहीं फूटा है।







