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तुम युद्ध में हो, तुम्हें समर्पण नहीं संघर्ष चाहिए || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कह रहे हैं, जैसे श्रीमद्भगवद्गीता भी कहती हैं कि आपको डिटैच्ड (अनासक्त) होकर जीवन बिताना होता है। तो क्या मोह से परे होकर जीवन जीना होता है?

आचार्य प्रशांत: देखो, डिटैचमेंट (अनासक्ति) थोड़ा आगे की बात है। जिस हालत में हम सब जी रहे होते हैं, हमें संघर्ष चाहिए। हमें विरक्ति या वैराग्य नहीं चाहिए, वो थोड़ा और आगे आएगा अभी। अभी तो हमें संघर्ष चाहिए। तुम क़ैद में हो, तुम्हें बेड़ियाँ पड़ी हुई हैं और तुम कहो, ‘मैं विरक्त हूँ’, कोई अर्थ हुआ इस बात का? तुम्हें अभी बैराग नहीं चाहिए, तुम्हें तो हथियार चाहिए।

प्र: आचार्य जी, मैं शायद यही जानना चाह रहा हूँ वो हथियार क्या हैं? अगर हमें मोह को काटना है तो उसका ज़रिया क्या है?

आचार्य: जब मोह बनाया था तब ज़रिया कहाँ से ढूँढा था?

प्र: वो तो प्रकृति है आचार्य जी, हमारा नेचर (प्रकृति) है।

आचार्य: नहीं, तब जुगाड़ करा था। जैसे तब करा था वैसे ही अब करो। पहले मिलने के बहाने ढूँढ लेते थे न? (मुस्कुराते हुए) अब समझ लो आगे।

(श्रोतागण हँसते हुए)

जब आपको लिप्त और आसक्त होना होता है, मोहित होना होता है तो अपनी सारी शक्तियाँ, सारे संसाधन लिप्तता की दिशा में लगा लेते हो या नहीं? बोलो। तब जल्दी से टिकट हो न हो, ट्रेन में भी चढ़ जाते हो कि पहुँचना तो है ही आज की रात वहाँ पर। तब पूछने आते हो, ‘आचार्य जी, मोहित कैसे होऊँ।’

अब मैं कह रहा हूँ ट्रेन से उतर जाओ बेटा, तो कह रहे हो कैसे उतरें। चढ़े कैसे थे? जैसे चढ़े थे वैसे ही उतर भी जाओ। जैसे तब येन-केन-प्रकारेण समस्त जुगाड़ लगाकर अपना खेल ख़राब करा था, अब वैसे ही अपनी सारी शक्तियाँ केन्द्रित करके बिगड़ा हुआ खेल ठीक भी करो न।

ये बात आप थोड़ा साफ़ समझ लीजिएगा — मुक्ति का रास्ता युक्ति का रास्ता है। युक्ति माने? उपाय, जुगाड़। ये मत कर लीजिएगा कि जुगाड़ पर सारा अधिकार आप आम संसारी लोगों को ही सौंप दें। कहें, ‘जुगाड़, तो ये करते हैं, मैं तो आध्यात्मिक आदमी हूँ, मैं तो सीधी राह चलूँगा।’ मुक्ति के लिए भी युक्ति चाहिए। जो सब सांसारिक उपाय, उपद्रव सीखे हैं, अब उनको सद-प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करो।

अगर कहीं फँसने के लिए बहुत टेढ़े-टाढ़े रास्ते से गये थे, तो वहाँ से जब वापस लौटोगे तो भी उसी टेढ़े-टाढ़े रास्ते से ही लौटोगे न। अब अपने टेढ़ेपन का सीधा इस्तेमाल करना सीखो। ये मत कर देना कि अब तो मैं आध्यात्मिक हो गया हूँ तो अब मैं अपना सारा टेढ़ापन त्याग रहा हूँ। उस टेढ़ेपन की, उस युक्ति की बहुत अभी ज़रूरत है।

इन अठारह दिनों में श्रीकृष्ण कौन-कौन सी युक्तियाँ नहीं लगाते, बताओ न? इतना जोड़-तोड़, इतना जुगाड़! जयद्रथ को क्या बोला था अर्जुन ने? ‘सूरज ढलने से पहले मारूँगा।’ उसको उन्होंने घेरकर रख लिया, क्योंकि अर्जुन ने कह दिया था, अगर नहीं मारूँगा तो मैं ख़ुद ही जल मरूँगा।

दुर्योधन ने कहा, ‘यही सही मौक़ा है, आज ही युद्ध ख़त्म हुआ जाता है। जयद्रथ को बचा लो अर्जुन ख़ुद ही जल मरेगा।’ और जयद्रथ को पूरा अच्छे से घेरकर रख लिया। अर्जुन पहुँच ही न पायें, इतने योद्धाओं ने घेर रखा है जयद्रथ को। क्या युक्ति करी श्रीकृष्ण ने? क्या करी?

उन्होंने, अब ये प्रतीक है, कुछ करा होगा, पर कहानी कहती है कि उन्होंने सूरज को ही छुपा दिया। सूरज को छुपा दिया तो जयद्रथ बावला हो गया। उसको लगा, बच गये और अब अर्जुन मरेगा और बड़ा मज़ा आएगा। वो जिस सुरक्षा घेरे में था वहाँ से उतरकर बाहर आकर लगा नाचने — ‘मज़ा आ गया, मज़ा आ गया, अब अर्जुन मरेगा।' जहाँ वो बाहर आया तहाँ उन्होंने सूरज को कहा, 'बाहर आ' और अर्जुन से कहा, 'अभी मार!' गया जयद्रथ।

इतनी युक्ति चाहिए होती है, इस सीमा तक जाना होता है। भोन्दू बनकर अध्यात्म नहीं होता। यहाँ आपको नैतिकता सिखाने के लिए नहीं बैठाया गया है। अच्छे बच्चे बनकर मत निकल जाना बाहर, जो बीच में से माँग काढ़ते हैं, सरसों का तेल लगाते हैं। 'सदा सच बोलो, चोरी मत करो, अंकल जी को नमस्ते बोलो' — ऐसों के बस की नहीं है महाभारत जीतना। ये सरसों का तेल डालना बन्द करो। भोन्दू रहोगे तो फँसे रहोगे। अपनी सारी बुद्धिमानी लगा दो। हर युक्ति का इस्तेमाल करो। मुक्ति इतनी बड़ी चीज़ है कि उसके लिए जो करो ठीक है, कम है, जायज़ है।

बात समझ रहे हो?

अध्यात्म की दुनिया को वास्तव में इस वक़्त तेज़ लोगों की बहुत ज़रूरत है। होता उल्टा है, जितने भोन्दू होते हैं, सब वहाँ आ जाते हैं। जितने भी जगत से परित्यक्त लोग होते हैं, क्योंकि वो दुनिया के किसी काम ही के नहीं, दुनिया में उन्हें कुछ करना ही नहीं आता, निपट भोन्दू, वो सब-के-सब आध्यात्मिक हो जाते हैं।

उनको इतना बोल दो कि बाज़ार जाकर सिंघाड़ा ख़रीद लाओ, वो कर नहीं पाएँगे, इतना नहीं होगा उनसे। वो घोर आध्यात्मिक हैं। सिंघाड़ा लाने भेजा था, वो कद्दू खाकर आ गये। आकर ज़ोर से डकार मारी, बोले जय श्री राम। ये अध्यात्म है इनका!

हमें तेज़ लोग चाहिए, हमें युक्तिवान लोग चाहिए। हमें ऐसे लोग नहीं चाहिए जिन्हें कोई राह चलते लूट ले, जिन्हें दो और दो चार करना भी नहीं आता। हमें दुनिया की सबसे पैनी प्रतिभाएँ चाहिए। अच्छे वैज्ञानिक, अच्छे डॉक्टर, अच्छे इंजीनियर, अच्छे वकील, हमें ये चाहिए कि ये आध्यात्मिक बनें। भोन्दुओं का मेला थोड़ी लगाना है। पहले तो सारे भोन्दू इकट्ठा कर लो, उसके बाद ख़ुद उन्हीं को पालो-पोसो।

प्र: आचार्य जी, प्रणाम। आपने जो अभी श्रीकृष्ण के लिए शब्द इस्तेमाल किया कि महानता, जीवटता, तो क्या इसमें उनकी विवशता को भी शामिल करना चाहिए?

आचार्य: बिलकुल। बहुत बढ़िया, बहुत अच्छा! क्योंकि जब तक नहीं देखोगे कि उनके सामने शर्तें कितनी कड़ी थीं और स्थितियाँ कितनी प्रतिकूल थीं तब तक तुम उनकी महानता का भी अनुमान कैसे लगा पाओगे? क्योंकि महानता तो प्रतिकूलता के सन्दर्भ में ही प्रकाशित होती है न। प्रतिकूलताएँ न दिखाई दें, विवशताएँ न दिखाई दें, अड़चनें न दिखाई दें, समस्याएँ न दिखाई दें, तो तुम्हें ये भी कैसे दिखाई देगा कि उनसे जूझने वाला व्यक्ति कितना महान है? बोलो।

अगर तुम्हें ये नहीं दिख रहा कि श्रीकृष्ण विवश भी हैं, तो फिर ये भी कैसे दिखेगा कि उस विवशता को जीतने के कारण ही तो उनकी महानता है। कितना चाहते हैं वो कि धर्मयुद्ध लड़ा जाए और पूरे प्राण से लड़ा जाए। जानते हो, आरम्भ से कुछ दिनों में तो अर्जुन ने पूरे मन से युद्ध करा ही नहीं, अठारह अध्याय हो गये हैं गीता के लेकिन उसके बाद भी।

वास्तव में, महाभारत के युद्ध के बाद का एक प्रसंग है जिसमें श्रीकृष्ण और अर्जुन मिलते हैं और अर्जुन कहते हैं, ‘आपने जो गीता बतायी थी वो तो सब मैं भूल गया।’ और श्रीकृष्ण वहाँ बहुत डाँटते हैं अर्जुन को। पर अर्जुन का वो वक्तव्य ईमानदारी का था। अर्जुन भूल ही भर नहीं गये, इन अठारह अध्यायों के बाद भी अर्जुन पूरे तरीक़े से समझ ही नहीं पाये थे।

तो आरम्भ में जो लड़ाई होती है, पहले कुछ दिनों में, तो सामने भीष्म हैं। भीष्म सेनापति थे शुरू में, अर्जुन लड़े ही नहीं ठीक से। अब श्रीकृष्ण तो सब समझ ही रहे हैं न, वो स्वयं भी योद्धा हैं, उनको दिख ही रहा है कि तुम आधे मन से लड़ाई कर रहे हो। सोचो, कैसी बेबसी का अनुभव करते होंगे वो! जिसके सारथी हैं, वो योद्धा आधे मन से लड़ रहा है। जिसके गुरु हैं, वो शिष्य उनकी सीख पर अमल नहीं कर रहा है, कैसा लगता होगा?

और फिर एक दिन जब बिलकुल अति हो गयी, लगने लगा कि ये शिष्य तो कुपात्र है बिलकुल, कितना भी इसको समझा लो इसको समझ में नहीं आएगा, तो बोले, ‘तुझे नहीं लड़ना है तो मैं लड़ूँगा। मैं अपना वचन तोड़ता हूँ, मैं शस्त्र उठाता हूँ।’ बोले, ‘मैं ही मारे देता हूँ भीष्म को, तू नहीं मार सकता तो।’

अब वो भी उन्होंने किसी दिव्य-शक्ति का उपयोग करके नहीं मार दिया भीष्म को। एक साधारण व्यक्ति की तरह — अब निहत्थे थे, उन्होंने तो कह दिया था कि हथियार लेकर तो आऊँगा नहीं — एक साधारण व्यक्ति की तरह दौड़े भीष्म की ओर और कुछ नहीं मिला तो एक रथ का टूटा पहिया पड़ा था वही उठा लिया। क्योंकि चक्र चलाते थे, चक्र चलाने का अनुभव था, तो वो पहिया ही उठा लिया। बोले, ‘अब इस पहिये से ही मार दूँगा।’

इस आदमी की विवशता देख पा रहे हो? कुछ भीतर सन्वेदना उठ रही है? और इतनी विवशता गीताकार को झेलनी पड़ रही है। ये जगत ज्ञानियों के साथ ऐसा ही करता है। कितना भी ज्ञान समझा लो इस संसार को, ये समझना नहीं चाहता। ये ज्ञानी को भी बेबस कर डालता है।

ये शुरुआत थी, जब अर्जुन लड़ने से इनकार कर रहे हैं और अन्त भी कैसा हो रहा है? अन्त में बड़े भाईसाहब खड़े हो गये, युधिष्ठिर। वो दुर्योधन को बोल रहे हैं, ‘हम पाँच हैं, तुम हम पाँच में से किसी एक का चयन कर सकते हो। दुर्योधन, तुम किसी एक से भी लड़कर उसको हरा दो तो ये युद्ध तुम्हारा हुआ।’ श्रीकृष्ण ने सुना, भौंचक्के रह गये। बोले, ‘इतनी मूर्खतापूर्ण बात, युधिष्ठिर, आप कैसे कर सकते हो, जानते हो वो कौन है? वो सर्वश्रेष्ठ गदाधारी है, दुर्योधन। वो भीम से ज़्यादा बड़ा गदा का योद्धा है। आप इतनी बहकी हुई बात कैसे बोल सकते हो?’

उन्होंने दुर्योधन को तब तक वचन दे दिया था। ‘दुर्योधन तुम यहाँ सरोवर में छुपे हो, बाहर आओ और हम पाँच खड़े हैं, किसी एक से भी लड़ लो।’ और उसने चुन लिया होता सहदेव को तो? दो मिनट में खेल ख़त्म। ये तो दुर्योधन का कलेजा था और दुर्योधन की गरिमा थी और दुर्योधन जैसा योद्धा चाहिए कि दुर्योधन ने इस बात पर बहुत कान नहीं धरा — ‘किसी को भी चुन लो!’ दुर्योधन ने कहा, ‘मेरे स्तर का सिर्फ़ भीम है। तुम पाँचों में से मुझसे लड़ने लायक़ सिर्फ़ भीम है। भीम को भेजो भीम को, इसको हराऊँगा मैं।’

और दुर्योधन ने भीम को लगभग हरा ही दिया था। वहाँ भी फिर श्रीकृष्ण को बीच में आकर हस्तक्षेप करना पड़ा, नहीं तो भीम भी गये थे।

कुछ अनुभव कर पा रहे हो कि कैसा लग रहा होगा श्रीकृष्ण को कि कैसे तो पाँच हैं ये — एक शुरू में लड़ने को तैयार नहीं था, दूसरे ने अन्त में आकर खेल पूरा ख़राब कर दिया। जब ये सब देखोगे न, तब लगेगा कि प्यार कर सकते हैं इनसे। फिर श्रीकृष्ण के प्रति वास्तविक भावना उठेगी, क्योंकि तब श्रीकृष्ण से कोई सम्बन्ध बना पाओगे।

छूटते ही भगवान बोल देते हो तो सम्बन्ध ही ख़राब कर देते हो, क्योंकि बहुत दूर की चीज़ बना दिया न, आकाश की। आसमानों में बैठे हैं कहीं, भगवान हैं कोई। पता नहीं भगवान माने क्या। अब क्या रिश्ता बनेगा आपका उनसे?

आप ही के जैसे होते हैं, सब व्यक्ति ही होते हैं। बस कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो तय कर लेते हैं कि अपने व्यक्तित्व की सीमाओं और बन्धनों के आगे जाना है। इस आगे जाने को, इस परागमन को, इस अतिक्रमण को कृष्णत्व कहते हैं। आगे जाना है।

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