आत्मा क्या, जीवात्मा क्या? क्या आत्मा का पुनर्जन्म होता है? || (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भगवान कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर नए शरीरों को प्राप्त होता है। तो ये जीवात्मा कौन है? सूक्ष्मशरीर है, मन है? और सूक्ष्मशरीर को अहम्-वृत्ति और तादात्म्य के सम्बन्ध में कैसे समझें? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: जिसे जीवात्मा कह रहे हैं कृष्ण वो वही है जिसे जीव आत्मा समझता है। आत्मा माने? 'मैं', जो तुम वास्तव में हो। तुम्हारा असली नाम, तुम्हारी असली पहचान, उसका नाम है आत्मा। पर जीव आत्मा में तो जीता नहीं, जीव का केंद्र क्या होता है?
प्र: वासना।
आचार्य: वासना, अहम्। तो जीव जिसे आत्मा समझे वो हुआ जीवात्मा, अहम्। तो आत्मा और जीवात्मा बहुत दूर-दूर की बातें हैं। आत्मा और जीवात्मा को एक मत समझ लेना। आत्मा परम सत्य है और जीवात्मा परम भ्रम है। और चूँकि जीव अहम् को ही आत्मा का नाम देता रहता है; कहता रहता है न "मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ।" तो उसने तो 'मैं' के साथ न जाने क्या-क्या जोड़ दिया; अहम् को ही आत्मा बना डाला।
तो इसीलिए फिर महात्मा बुद्ध को कहना पड़ा था कि, "आत्मा झूठी बात है।" वो वास्तव में यह कह रहे थे कि जिसको तुम आत्मा समझते हो वो झूठी बात है क्योंकि तुम तो अहम् को ही आत्मा समझते हो। तुम तो अहम् को ही पकड़े बैठे हो और यही सोच रहे हो कि यही तो आत्मा है मेरी, यही तो सच्चाई है मेरी।
तो जीवात्मा जब आत्मा बनने लग गई तो बुद्ध को कहना पड़ा 'अनात्मा' और यही दुनिया का सबसे बड़ा भ्रम है। जीवात्मा बनी बैठी है आत्मा। देखा नहीं है हम किस तरह के मुहावरे, अभिव्यक्तियाँ इस्तेमाल करते हैं? हम कहते हैं, "मेरी आत्मा रो रही है, मैं तुमको आत्मा से प्यार करता हूँ।" कोई मर जाएँ तो कहेंगे, "उसकी आत्मा की शांति के लिए सभा रखी गई है।" आत्मा की शांति के लिए! आत्मा अशांत कैसे हुई भई? और आत्मा तो निर्वैयक्तिक है, किसी की व्यक्तिगत कैसे हो गई आत्मा, कि उसकी आत्मा, मेरी आत्मा, तेरी आत्मा। आत्मा तो एक है, न तेरी है न तेरी है।



