
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, सर। कुछ दिनों पहले मुझे एक फॉरवर्ड(आगे बढ़ाया हुआ संदेश) आया था व्हाट्सऐप पर तो उसमें लिखा था कि महात्मा गाँधी जी ने हम भारतीयों को एक अधूरी सीख दी थी। तो वहाँ पर लिखा था कि "अहिंसा परमो धर्म:" इस तरह की सीख दी थी और इससे नपुंसकता भर दी थी भारतीयों में। इस तरह का इल्ज़ाम लगाया था। और ये भी बोला था कि जो पूरी बात है वो नहीं बताई थी। तो इसके बाद ही शास्त्रों में जो आता है कि ‘धर्म हिंसा तथैव च,’ ये भी लिखा गया है शास्त्रों में तो ये बात महात्मा गाँधी जी ने नहीं बोली।
और फिर कुछ एग्ज़ाम्पल(उदाहरण) दिए थे उसी व्हाट्सऐप फॉरवर्ड में कि जैसे गीता है तो अर्जुन युद्ध लड़ते हैं तो वो भी धर्म के लिए लड़ते हैं। फिर हमारे जो देवी-देवता हैं उनके हाथों में शस्त्र पाए जाते हैं। तो पढ़ने में वो ठीक लगी बात जो फॉरवर्ड में लिखी है, कि ये दो एग्ज़ाम्पल भी हैं। तो आपसे समझना था कि कितनी सच्चाई है इस बात में।
आचार्य प्रशांत: गाँधी जी ने बचा लिया, वरना आमतौर पर आजकल जब कोई बताता है कि सर व्हाट्सऐप फॉरवर्ड आया है तो आमतौर पर यही बता रहा होता है कि वो मेरे बारे में है। जैसे ही तुमने बोला व्हाट्सऐप फॉर्वर्ड आया था, मुझे लगा बताओगे कि आप ही के बारे में आया था। ये व्हाट्सऐप ने बड़ा बेड़ा गर्क कर रखा है, फॉरवर्ड ही फॉरवर्ड। जय हो गाँधी जी की, इस बार उनके बारे में आया है। तो क्या उनको क्या बता दिया कि कायर बना दिया पूरे देश को?
ये कहीं नहीं लिखा हुआ है, 'धर्म हिंसा तथैव च' कहीं पर भी नहीं लिखा हुआ है। और आप जाओगे ये फेसबुक, ट्विटर वग़ैरह पर वहाँ बहुत लोगों ने अपना वो डीपी और जो कवर पिक होती है वहाँ यही लगा रखी होती है 'धर्म हिंसा तथैव च।'
आपको जानकर के आनंद होगा कि ये किसी भी ग्रंथ में कहीं पर भी नहीं लिखा हुआ है। और इससे आपके रोंगटे भी खड़े हो जाने चाहिए कि ये कौन-सी सेंट्रलाइज़्ड कॉन्स्पिरेसी यूनिट(केन्द्रीकृत साज़िश इकाई) है जो इतनी बड़ी-बड़ी साज़िशें करती है कि जो बात धर्मग्रंथ में लिखी भी नहीं हुई है, उसको संस्कृत में लिख करके उसको चारों तरफ़ व्हाट्सऐप से और दूसरे ज़रियों से फैला देती है। ये कौन लोग हैं और ये कौनसी सेंट्रलाइज़ जगहें हैं जहाँ इस तरह की साज़िशें की जा रही हैं।
यह आपने भी सुना-पढ़ा होगा न ‘धर्म हिंसा तथैव च?' और कहते हैं कि गाँधी जी ने आधी बात बताई कि "हिंसा परमो धर्म:," बाक़ी बात क्यों नहीं बताई। अरे कहीं लिखी होगी तो बताएँगे न। और यह तुम भी जानते हो कहीं लिखी नहीं है। पर तुम्हारा बहुत ही विकृत और हिंसक और अधार्मिक दिमाग है जो कि धर्मग्रंथों से भी छेड़खानी करने में एक पल को नहीं सकुचाता। तुम्हारा अहंकार और तुम्हारा अपना एजेंडा इतना बड़ा है कि उसके लिए तुम धर्मग्रंथों को भी ख़राब कर रहे हो। जो कहीं लिखी ही नहीं है बात वो तुम बता रहे हो।
क्रोध मुझे सब पर आता है पर आमतौर पर मुझे घृणा किसी से भी नहीं होती है। क्रोध आता है थोड़ी देर, चला जाता है। उसके बाद मैं किसी को याद भी नहीं रखता कि इस पर कभी मुझे क्रोध आया। लेकिन ये लोग जो धर्मग्रंथों को ही विकृत कर देते हैं न, इनको लेकर के भीतर एक पीड़ा सी बनी रह जाती है।
ये महाभारत से है — 'अहिंसा परमो धर्म:।' आप महाभारत को नहीं छोड़ रहे हैं। और जब महाभारत की बात आती है तो तत्काल मुझे वो याद आता है जो सबसे प्रिय है – 'भगवद्गीता।' मत करो न वहाँ ये दुराचार!
महाभारत में कुछ नहीं तो एक दर्जन जगह आया होगा 'अहिंसा परमो धर्म:' लेकिन उसमें साथ में आगे कहीं भी नहीं लिखा है कि 'धर्म हिंसा तथैव च।'
एक बार को आप सोचिए वो लोग कौन-से होंगे जो ऐसा दुष्प्रचार कर रहे हैं। इतना बड़ा झूठ पूरी जनसंख्या में फैलाए दे रहे हैं और पूरी जनसंख्या उनके इस झूठ का शिकार, विक्टिम बनी जा रही है। ये कौन लोग हैं और कितने गन्दे लोग हैं! और जब ये इस सीमा तक जाकर दुष्प्रचार कर सकते हैं तो ये किसी को भी छोड़ेंगे क्या? ये श्रीकृष्ण को नहीं छोड़ रहे हैं, महाभारत को नहीं छोड़ रहे हैं, किसको छोड़ेंगे? सीधे-सीधे इन्होंने गीता तक को नहीं छोड़ा है। और बहुत सारी वजह हैं। एक वजह जो एकदम प्रकट है, पहली है, वो ये है कि हमें संस्कृत नहीं आती। चूँकि हमें संस्कृत नहीं आती इसलिए हमें जो खिलाया जाता है हम खा लेते हैं। जो आपको बता दिया जाता है कि ये लिखा हुआ है, वो आपको मानना पड़ जाता है।
गीता में भी वो नहीं लिखा हुआ है जो आपको बताया गया है आज तक। और मेरे ख़िलाफ़ अब बहुत-बहुत लोग खड़े होने वाले हैं। आपको बहुत-बहुत तरह की ख़बरें मिलेंगी। हो सकता है कि बहुत हिंसक ख़बर भी आपको जल्दी ही मिले। वजह सिर्फ़ ये है कि मैं गीता का वो अर्थ सामने ला रहा हूँ जो श्रीकृष्ण ने चाहा था। ऐसे में ऐसों की दुकानें बंद हो रही हैं जिन्होंने गीता को लेकर बड़ा भ्रामक दुष्प्रचार कर रखा है। वो मुझमें सौ खोट निकालेंगे पर उनको जो एक मूल समस्या है मुझसे वो बस एक ही है कि मैंने गीता का सही अर्थ क्यों बता दिया आपको। ये उनकी मूल समस्या है।
इससे आपको ये भी पता चलेगा जो उन्होंने जोड़ा है उन्होंने कुछ यूँही रैंडमली(कुछ भी) नहीं जोड़ दिया; क्या जोड़ा है? 'धर्म हिंसा तथैव च' — अहिंसा तो परम धर्म है लेकिन हिंसा भी धर्म है। इससे आपको ये भी पता चलेगा वो करना क्या चाहते हैं। जो उन्होंने जोड़ा है इसी से उनके मंसूबे पढ़िए। वो क्या करना चाहते हैं? वो हिंसा करना चाहते हैं। और ये मत सोचिएगा कि वो हिंसा वो किसी पराए पर करना चाहते हैं। जानते हैं वो हिंसा किस पर करना चाहते हैं? वो हिंसा आप पर ही करना चाहते हैं। दूसरा तो बहाना है, ग़ुलाम उन्होंने आपको बनाना है दूसरे का हौवा दिखाकर के कि वो लोग हैं, देखो, उन पर हिंसा करनी है। और उन पर हिंसा करनी है तो अब मैं नेता बन गया, चलो सब मेरे पीछे खड़े हो जाओ। अब हम सब मिलकर हिंसा करेंगे।
इस पूरी प्रक्रिया में हुआ क्या है? वो नेता बने और आपको पीछे खड़ा किया गया। हिंसा आपके साथ की गई है। आप से कहा गया है कि सही काम-धंधे छोड़ो, मेरे पीछे लगो और हिंसा करो। दुनिया के किसी भी देश में, दुनिया के किसी भी धर्म में, धर्मग्रंथ के साथ खिलवाड़ स्वीकार किया जाता है? धर्म ग्रंथ में से आप श्लोक या पंक्ति हटाओ, शब्द भी हटाइए, एक अर्ध विराम भी ऊपर से नीचे कर दें, तो क्या स्वीकार किया जाएगा? और यहाँ सीधे-सीधे पूरी खिलवाड़ ही कर दी गई है। और हम ऐसे नासमझ हैं, हमको लगता है कि नहीं बात तो सही बोली गई होगी।
अरे संस्कृत नहीं आती, कोई बात नहीं, महाभारत के इतने तो हिंदी में और सब भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हैं, जाकर के देखते क्यों नहीं हो? पर पढ़ने-लिखने की तो आदत ही नहीं है। व्हाट्सऐप में जो आ गया वही सही लिखा हुआ है। विचार नहीं करते थोड़ा भी? सामने जो दिख रहा है उसके पीछे क्या है, ये समझने की कोशिश नहीं करते। जिसने जो दिखा दिया देख लिया, जिसने जो चटा दिया, चाट लिया।
क़ायदे से तो इन सब बातों पर रोंगटे खड़े हो जाने चाहिए हमारे कि ये क्या किया जा रहा है हमारे साथ, पर कुछ नहीं होता।
कोई आकर के बोल देता है हमारे शास्त्रों में ऐसा लिखा है। अरे पूछो ना, सबसे पहले तो पूछो कि तुम किस किताब को शास्त्र बोल रहे हो? शास्त्र माने क्या? शास्त्र की परिभाषा होती है वो जो हमको मुक्ति की ओर ले जाए, उसको शास्त्र बोलते हैं। जहाँ किस्से-कहानियाँ और ये गप्पेबाज़ियाँ हैं, उसको शास्त्र बोलेंगे क्या? इधर-उधर की कहानियाँ, फ़लाना राजा, उस राजा ने क्या-क्या करा, उस राजा की पूरी वंशावली क्या है इन सब बातों को शास्त्र बोलेंगे क्या?
कौन-से देवता किस दूसरे देवता पर कुपित हो गए, फिर उसने क्या श्राप दिया, फिर श्राप देने से वो जो हिरण था वो ब्राह्मण बन गया। और फिर फ़लाने सरोवर में पानी पीने गया। वहाँ मेंढक ने उसकी गर्दन पकड़ ली। फिर एक अप्सरा निकल कर आई। अप्सरा और मेंढक में प्रेम हो गया, उससे उनके आठ पुत्र पैदा हुए। और जो आठवाँ पुत्र था फिर वो जाकर के ऐसा हो गया। यह शास्त्र है? यह शास्त्र है? और अक्सर इन सब बातों से कुल मिलाकर जो बात निकलती है वो ये कि ब्राह्मण देवता की सेवा ज़रूर करना। कुल मिलाकर के सार यही निकला या फिर पति परमेश्वर की सेवा ज़रूर करना।
फ़लाने देवता बैठे हुए थे और वो अपने राग-रंग में मग्न थे, सोमरस का पान कर रहे थे। तो तभी बहुत बड़े ऋषि सामने से निकले, उन्होंने ऋषि को प्रणाम नहीं किया तो ऋषि ने उनको ऐसे कर के क्या कर दिया मालूम है? कन्या बना दिया। बोले अब तू कन्या बन गई। जैसे ही कन्या बन गई, बोले, ‘अब मुझसे विवाह कर’ और वशीभूत होकर के कन्या ने तुरंत विवाह कर लिया। बोले, ‘देख पहले तूने मुझे प्रणाम नहीं करा। अब मैं तेरा पति परमेश्वर हो गया। अब तू जीवन भर मेरी सेवा करेगी।‘ यह शास्त्र है?
पर कोई आकर कहे फ़लाने शास्त्र में लिखा हुआ है — वहीं टोको, रोको उसे। ये शास्त्र कैसे हो गया? और शास्त्र है तो श्लोक बताओ। श्लोक भी जो आपको बताया जाएगा, उसका अर्थ कुछ और होगा। कई बार उन्हें श्लोक संख्या नहीं पता। कई बार जो आपको श्लोक बता रहे हैं, उसका उनको कुछ अर्थ नहीं पता। पर उन्होंने जो भी अर्थ चिपका दिया, आपने चिपकने दिया। तो इसका परिणाम ये हुआ – ‘धर्म हिंसा तथैव च।‘
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम्। अहिंसा परमो धर्म: स च सत्ये प्रतिष्ठितः। सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तय:।।
अहिंसा और सत्यभाषण — ये समस्त प्राणियों के लिए अत्यंत हितकर हैं। अहिंसा सबसे महान धर्म है, परंतु वह सत्य में ही प्रतिष्ठित है। सत्य के ही आधार पर श्रेष्ठ पुरुष के सभी कार्य आरंभ होते हैं।
~ (207.74, मार्कण्डेयसमस्यापर्व, वानपर्व)
"अहिंसा परमो धर्म: स च सत्ये प्रतिष्ठित:।" ये है महाभारत, वनपर्व से। "अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है और सत्य पर ही टिका होता है। सत्य में निष्ठा रखते हुए सारे काम संपन्न होते हैं।" ये अगली पंक्ति है।
फिर अनुशासन पर्व में आता है। अनुशासन पर्व में तो मुझे जहाँ तक ध्यान है बहुत बार आता है। उसमें से एक यहाँ पर दिखाई पड़ रहा है।
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते।।
अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है और अहिंसा परम सत्य है; क्योंकि उसी से धर्म की प्रवृति होती है।
~ (114.23, दानधर्म पर्व, अनुशासन पर्व)
दानधर्म पर्व। "अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा परम तप है। अहिंसा ही परम सत्य और अहिंसा से ही धर्म की प्रवृत्ति आगे बढ़ती है।"
"अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते।" और भी बहुत बार है। ख़ुद ही देख लीजिएगा।
महाभारत की मूल प्रति आपके पास हो तो उसमें से देख लीजिएगा। न हो तो यहाँ गीताप्रेस से जा करके एक ले लें। पर महाभारत तो बहुत मोटा ग्रंथ है, उतना आपके पास पढ़ने का संयम न हो तो उसकी ईबुक ही पढ़ लें।
अनुशासन पर्व खोलकर के देख लें, आपको पता चल जाएगा। उतना भी न करना हो तो बस गूगल कर लें – 'महाभारत अहिंसा परमो धर्म:।' उसमें भी आ जाएगा कि कहाँ-कहाँ पर ये श्लोक आता है। और फिर उसमें देखें कि 'धर्म हिंसा तथैव च' ये कहाँ लिखा है।
कुछ बहुत हिंसक लोग और अज्ञानी लोग जिन्हें वास्तव में मदद की ज़रूरत है वो मदद तो क्या ही लेंगे, वो बहुत मुखर हो बैठे हैं। वो बहुत ज़ोर-ज़ोर से बोल रहे हैं। और झूठ चूँकि डरा-सहमा होता है इसलिए उसे बहुत ज़ोर-ज़ोर से बोलना पड़ता है। और एक बहुत बड़ा बहुमत है लोगों का जो उस झूठ में शामिल नहीं होना चाहते लेकिन बहुत ज़ोर से बोले जा रहे झूठ का विरोध भी नहीं कर रहे।
उनके विरोध न करने के कारण ये जो चंद लोग हैं जो हर तरह का झूठ, यहाँ तक कि धर्मग्रंथों के प्रति भी असत्य प्रचारित कर रहे हैं, इनको बड़ा बल मिल रहा है।
ये सब जो झूठ फैलाते हैं, जहाँ से भी तुमको ये व्हाट्सऐप फॉर्वर्ड आया होगा, उन लोगों की तादाद बहुत छोटी है। छोटे हैं पर वोकल हैं, बहुत ज़ोर से बोलते हैं और बहुत हिंसात्मक तरीक़े से बोलते हैं; चिल्लाकर, चढ़कर। तो जो शांत बहुमत है वो फिर डरा-सहमा चुप बैठा रहता है; वही जैसे भेड़े होती हैं न, जिधर को हाँक दो उधर पहुँचे जा रहे हैं।
महाभारत से कुछ श्लोक जहाँ 'अहिंसा परमो धर्म:' का ज़िक्र है।
अहिंसा परमो धर्म: सर्वप्राणभृतां वर।
समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ ब्राह्मण! अहिंसा सबसे उत्तम धर्म है।
(11.12, 11.13, पौलोमपर्व, आदिपर्व)
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दम:। अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तप:।
अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम संयम है, अहिंसा परम दान है और अहिंसा परम तपस्या है।
(116.28, दानधर्मपर्व, अनुशासनपर्व)
श्रीमहेश्वर उवाच:
अहिंसा परमो धर्मो ह्यहिंसा परमं सुखम्। अहिंसा धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु परमं पदम्।।
श्रीमहेश्वर ने कहा — अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा परम सुख है। सम्पूर्ण धर्मशास्त्रों में अहिंसा को परमपद बताया गया है।
(245.4, दानधर्मपर्व, अनुशासनपर्व)
अहिंसा परमो धर्मो, हिंसा चाधर्मलक्षणा। प्रकाशलक्षणा देवा मनुष्या: कर्मलक्ष्णा:।
अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है और हिंसा अधर्म का लक्षण (स्वरूप) है।
(43.20 व 43.21, अनुगीतापर्व आश्र्वमेधिकपर्व)
हिंसा की निंदा करते हुए महाभारत से एक प्रासंगिक श्लोक:
अव्यवस्थितमर्यादैर्विमूढ़ैर्नास्तिकैर्नरै:। संशयात्मभिरव्यक्तैर्हिंसा समनुवर्वणिता।
जो धर्म की मर्यादा से भ्रष्ट हो चुके हैं, मूर्ख हैं, नास्तिक हैं तथा जिन्हें आत्मा के विषय में संदेह है एवं जिनकी कहीं प्रसिद्धि नहीं है, ऐसे लोगों ने ही हिंसा का समर्थन किया है।
(265.3, मोक्षधर्मपर्व, शांतिपर्व)
संस्था के कार्यकर्ताओं की ओर से संदेश–
आप तक सही बात पहुँचाने के लिए हमने संपूर्ण महाभारत का अध्ययन किया। लेकिन ‘अहिंसा परमो धर्म, धर्म हिंसा तथैव च’ जैसा कोई श्लोक हमें इस ग्रंथ में नहीं मिला। हो सकता है हमारे अध्ययन में त्रुटि रह गई हो। यदि आपको ये श्लोक महाभारत ग्रंथ में कहीं मिले तो कृपया हमारे साथ साझा करें। पृष्ठ संख्या, अध्याय, पर्व व प्रकाशक का नाम अवश्य लिखें।
पर सावधान रहें; यदि आप गूगल पर इसे ढूँढने का प्रयास करेंगे तो वहाँ कुछ ऐसे सर्च रिजल्ट्स आपके सामने आएँगे। इन्हें खोलने पर आपको कहा जाएगा कि ऐसा कोई श्लोक महाभारत के शांतिपर्व, वनपर्व या अनुशासनपर्व में है। लेकिन कहीं भी स्पष्ट रूप से श्लोक संख्या या अध्याय नहीं बताया गया है। इसलिए हमने स्वयं इसे जाँचने का प्रयास किया और ऐसा कोई श्लोक ग्रंथ में नहीं पाया। आप भी स्वयं माहभारत पढ़ें और ऐसे भ्रामक लेखों के चक्कर में ना फँसे।